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Kasganj News: प्रशासनिक पाबंदी से गायब हुई दनदान मिठाई की मिठास
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फोटो 01 - कासगंज का सोरों गेट बाजार जहां हरियाली तीज का मेला लगता है। स्रोत : संवाद
कासगंज। शहर के सोरों गेट बाजार में पिछले करीब 80 वर्षों से हरियाली तीज पर लगने वाला पारंपरिक मेला प्रशासनिक पाबंदियों के कारण पिछले दो सालों से नहीं लग पा रहा है। कांवड़ यात्रा के दौरान सुरक्षा और यातायात व्यवस्था का हवाला देकर प्रशासन द्वारा अनुमति निरस्त किए जाने से शहर की इस पुरानी सांस्कृतिक विरासत पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं।
महज चार घंटे (शाम 5 से रात्रि 9 बजे तक) लगने वाला यह मेला स्थानीय निवासियों के लिए केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि उनकी सांस्कृतिक पहचान का एक अहम हिस्सा रहा है। मेले की सबसे बड़ी खासियत यहां मिलने वाली खास दनदान मिठाई थी, जिसे केवल साल में एक बार इसी अवसर पर चीनी से तैयार किया जाता था।
आम दिनों में न मिलने वाली इस मिठाई का स्वाद चखने के लिए बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक को पूरे साल का इंतजार रहता था। स्थानीय लोगों के मुताबिक, इस पारंपरिक आयोजन के लिए पहले अलग से अनुमति की आवश्यकता नहीं पड़ती थी, लेकिन पिछले दो वर्षों से अनुमति न मिलने के कारण बाजार से तीज की पारंपरिक रौनक पूरी तरह गायब हो चुकी है।
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निवासियों का मानना है कि मेला बेहद कम समय के लिए लगता था और इसे आपसी समन्वय व सुगम यातायात व्यवस्था के साथ सुनियोजित ढंग से आयोजित किया जा सकता है। उन्होंने जिला प्रशासन से आग्रह किया है कि सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करते हुए इस दशकों पुरानी लोक-संस्कृति और परंपरा को पुनर्जीवित करने का कोई रास्ता निकाला जाए।
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विरासत बचाने की मांग
स्थानीय लोगों का कहना है कि धार्मिक यात्राओं और सुरक्षा व्यवस्था का अपना महत्व है, लेकिन वर्षों पुरानी स्थानीय सांस्कृतिक परंपराओं को भी संरक्षित किया जाना चाहिए। लोगों ने प्रशासन से मांग की है कि कांवड़ यात्रा की व्यवस्थाओं को ध्यान में रखते हुए हरियाली तीज मेला को यदि पुराने एसडीएम कार्यालय या फिर डाक रोड पर लगा दिया जाए। ताकि 80 साल पुरानी यह परंपरा आगे भी जारी रह सके।
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खत्म हो रही परंपरा
हमारे बुजुर्ग बताते थे कि सोरों गेट का यह मेला बहुत पुराना है। बचपन से हम भी जाते रहे हैं। दो साल से मेला नहीं लगा तो ऐसा लगता है जैसे शहर की एक पुरानी परंपरा ही खत्म हो रही है। - मयंक अग्रवाल
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मेला सिर्फ चार घंटे का होता था शाम 5 से रात 9 बजे तक। इतनी देर में बाजार में अच्छी खासी रौनक हो जाती थी। इससे छोटे दुकानदारों को भी फायदा मिलता था। - पवन गोयल
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हरियाली तीज पर बच्चों को मेले का इंतजार रहता था। दनदान मिठाई तो साल में एक बार ही बनती थी। मेला नहीं लगने से बच्चों का उत्साह भी खत्म हो गया है। - राहुल वार्ष्णेय, मिठाई विक्रेता
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करीब 80 साल से यह परंपरा चली आ रही है। कांवड़ यात्रा के कारण अगर व्यवस्था प्रभावित होती है तो प्रशासन को सुरक्षा के साथ कोई ऐसा रास्ता निकालना चाहिए। - सुनील
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महज चार घंटे (शाम 5 से रात्रि 9 बजे तक) लगने वाला यह मेला स्थानीय निवासियों के लिए केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि उनकी सांस्कृतिक पहचान का एक अहम हिस्सा रहा है। मेले की सबसे बड़ी खासियत यहां मिलने वाली खास दनदान मिठाई थी, जिसे केवल साल में एक बार इसी अवसर पर चीनी से तैयार किया जाता था।
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आम दिनों में न मिलने वाली इस मिठाई का स्वाद चखने के लिए बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक को पूरे साल का इंतजार रहता था। स्थानीय लोगों के मुताबिक, इस पारंपरिक आयोजन के लिए पहले अलग से अनुमति की आवश्यकता नहीं पड़ती थी, लेकिन पिछले दो वर्षों से अनुमति न मिलने के कारण बाजार से तीज की पारंपरिक रौनक पूरी तरह गायब हो चुकी है।
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निवासियों का मानना है कि मेला बेहद कम समय के लिए लगता था और इसे आपसी समन्वय व सुगम यातायात व्यवस्था के साथ सुनियोजित ढंग से आयोजित किया जा सकता है। उन्होंने जिला प्रशासन से आग्रह किया है कि सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करते हुए इस दशकों पुरानी लोक-संस्कृति और परंपरा को पुनर्जीवित करने का कोई रास्ता निकाला जाए।
विरासत बचाने की मांग
स्थानीय लोगों का कहना है कि धार्मिक यात्राओं और सुरक्षा व्यवस्था का अपना महत्व है, लेकिन वर्षों पुरानी स्थानीय सांस्कृतिक परंपराओं को भी संरक्षित किया जाना चाहिए। लोगों ने प्रशासन से मांग की है कि कांवड़ यात्रा की व्यवस्थाओं को ध्यान में रखते हुए हरियाली तीज मेला को यदि पुराने एसडीएम कार्यालय या फिर डाक रोड पर लगा दिया जाए। ताकि 80 साल पुरानी यह परंपरा आगे भी जारी रह सके।
खत्म हो रही परंपरा
हमारे बुजुर्ग बताते थे कि सोरों गेट का यह मेला बहुत पुराना है। बचपन से हम भी जाते रहे हैं। दो साल से मेला नहीं लगा तो ऐसा लगता है जैसे शहर की एक पुरानी परंपरा ही खत्म हो रही है। - मयंक अग्रवाल
मेला सिर्फ चार घंटे का होता था शाम 5 से रात 9 बजे तक। इतनी देर में बाजार में अच्छी खासी रौनक हो जाती थी। इससे छोटे दुकानदारों को भी फायदा मिलता था। - पवन गोयल
हरियाली तीज पर बच्चों को मेले का इंतजार रहता था। दनदान मिठाई तो साल में एक बार ही बनती थी। मेला नहीं लगने से बच्चों का उत्साह भी खत्म हो गया है। - राहुल वार्ष्णेय, मिठाई विक्रेता
करीब 80 साल से यह परंपरा चली आ रही है। कांवड़ यात्रा के कारण अगर व्यवस्था प्रभावित होती है तो प्रशासन को सुरक्षा के साथ कोई ऐसा रास्ता निकालना चाहिए। - सुनील

फोटो 01 - कासगंज का सोरों गेट बाजार जहां हरियाली तीज का मेला लगता है। स्रोत : संवाद

फोटो 01 - कासगंज का सोरों गेट बाजार जहां हरियाली तीज का मेला लगता है। स्रोत : संवाद

फोटो 01 - कासगंज का सोरों गेट बाजार जहां हरियाली तीज का मेला लगता है। स्रोत : संवाद

फोटो 01 - कासगंज का सोरों गेट बाजार जहां हरियाली तीज का मेला लगता है। स्रोत : संवाद