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'विजयी विश्व तिरंगा' गीत से हुए फेमस, मिला पद्म श्री सम्मान, फिर ऐसी दर्दनाक मौत

Sat, 12 Aug 2017 08:33 AM IST
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर Updated Sat, 12 Aug 2017 08:33 AM IST
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vijayi vishwa tiranga pyara song writer shyam lal gupta story
डेमो
'विजयी विश्व तिरंगा प्यारा...' इस गाने के बोल आज भी आपके जहन में होंगे। जब कहीं ये गीत सुनाई पड़ता होगा तो जरूर आपके लबों पर ये गीत आया होगा। इस गीत में है ही ऐसा जादू के हिंद का प्रत्येकवासी इसे बुदबुदाने लगता है। लेकिन क्या आप जानते हैं इस जादूई गीत के रचयिता कौन थे और वे कहां के रहने वाले थे..? चलिए अमर उजाला आपको उस महान शख्सियत से रूबरू कराता है जिनके इस गीत को खुद पंडित नेहरू के आग्रह पर 15 अगस्त 1952 को लालकिला पर गाया गया था.... 
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2 रातें जागकर लिखा था झंडागीत...

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कानपुर के जनरल गंज इलाके में अपने जीवन की अंतिम सांस लेने वाले श्यामलाल गुप्त पार्षद का जन्म 9 सितंबर 1896 को कानपुर के नरवल गांव में हुआ था। इनका घर आज भी पार्षद जी के मकान के नाम से मशहूर है। जीवन की महान उपलब्धियों को देखते हुए सरकार ने 15 अगस्त 1973 को पद्म श्री से सम्मानित किया।

 

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यहां से शुरू हुआ सफर...

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श्याम लाल गुप्त ने स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले पर गाया था गीत

1923 में फतेहपुर जिला में हुए कांग्रेस के अधिवेशन के समय 'तिरंगा झंडा' तय कर लिया गया था। लेकिन लोगों को 'जन-मन' की तरह प्रेरित करने वाला कोई झंडा गीत नहीं था। पार्षद जी को लिखने का बहुत शौक था, वो कविता-कहानी लिखते रहते थे। साल 1924 में जब कानपुर में कांग्रेस का अधिवेशन होना तय हुआ तब वे कुछ दिन तक बहुत परेशान रहे। मगर वो अपनी परेशानी कभी घर में नहीं बताते थे। अधिवेशन के 2 दिन पहले से उन्होंने घर से निकलना बंद कर दिया और 2 दिन सोए भी नहीं। रात-दिन लगकर उन्होंने झंडा गीत लिखा। उन्होंने 13 अप्रैल 1924 को कानपुर के फूलबाग मैदान में हजारों लोगों के सामने ये गीत गाया। जवाहर लाल नेहरू भी इस सभा में मौजूद थे। नेहरू जी को उनका ये गीत बेहद पसंद आया। उन्होंने उस वक्त कहा भले ही लोग श्याम लाल गुप्त को नहीं जानते होंगे, मगर आने वाले दिनों में पूरा देश राष्ट्रीय ध्वज पर लिखे उनके गीत से उन्हें पहचानेगा। और ऐसा ही हुआ। उनके इस गीत ने उन्हें विशेष पहचान दिलाई।

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खाने में दाल थी दिल अजीज....

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श्याम लाल गुप्त पद्म श्री सम्मान स्वीकार करते वक्त

देश आजाद कराने के लिए श्यामलाल महीनों घर से गायब रहते थे। वे बेहद शांत स्वभाव के थे। उन्हें किसी चीज का शौक नहीं था। लेकिन उनके जीवन की सबसे जरूरी चीज खाने में दाल थी। उनको सब्जी मिले ना मिले लेकिन दाल जरूर चाहिए थी। एकबार श्यामलाल बिना बताए घर से 3 दिन गायब रहे, अचानक घर आने के बाद उन्होंने खाना मांगा। सब्जी-रोटी देख उन्होंने दाल मांगी, मगर घर में दाल नहीं होने से उस दिन दाल नहीं बनी थी, सो वो बिना खाना खाए उठ गए, और घर से बाहर चले गए। वो एक हफ्ते के बाद घर लौटे थे।
 

उधार के पैसे से धोती, कुर्ता और जूता खरीदकर गए पद्मश्री अवार्ड लेने

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पद्म श्री से सम्मानित किए गए थे श्याम लाल गुप्त 'पार्षद'
झंडा गीत को लेकर पद्मश्री अवार्ड देने के लिए दिल्ली प्रधानमंत्री कार्यालय से जब उन्हें बुलावा आया था तो उस समय उनके पास न तो ढंग का धोती-कुर्ता था, ना ही जूता। तब उनके बेटे ने दोस्त से रुपए उधार लेकर उनके लिए धोती-कुर्ता और जूते का इंतजाम किया। जिसे पहनकर वो दिल्ली गए थे।

 

धोती-कुर्ता के थे शौकीन, कहते थे ज्यादा धोने फट जाएगा कपड़ा 

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परिवार के साथ श्याम लाल गुप्त
उन्हें कपडे की भी सुध नहीं रहती थी। सिर्फ धोती-कुर्ता ही पहनते थे। उनके पास सिर्फ 2 धोती और दो कुर्ता थे। उसे वो 3-4 दिन के अंतराल पर धोते थे। उन्हें लगता था ज्यादा धोने पर कपड़ा जल्दी फट जाएगा।

मिली दर्दनाक मौत

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श्याम लाल गुप्त (फाइल फोटो)
उनका जीवन साधारण नहीं था। बेहद कठिनाइयों में उन्होंने दिन गुजारे थे। नंगे पांव घूमने की वजह से उनके दाहिने पैर में कांटा चुभ गया था। बाद में बड़ा घाव बन गया। उन दिनों घर की माली हालत खराब होने के कारण अच्छे से इलाज भी नहीं कराया जा सका।जिंदगी के आखिरी दिनों में इन्हें उर्सला हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था। डॉ. ने उनको एडमिट करने में 4 घंटे लगा दिए थे। भर्ती होने के बाद उनका इलाज भी ढंग से नहीं हुआ। 11 अगस्त 1977 को इनकी मौत हो गई। मौत के बाद डॉक्टरों ने उनकी डेडबॉडी को वार्ड से बाहर निकाल कर कैंपस में एक किनारे जमीन पर डाल दिया था। बॉडी को घर ले जाने की कोई व्यवस्था नहीं कराई गई।




 
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