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Kanpur News: मां-बेटी के बीच दो पीढि़यों की सोच देख दर्शक भावुक
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कानपुर। अनुकृति रंगमंडल के 38वें स्थापना दिवस पर शास्त्री भवन खलासी लाइन में शनिवार को कोई एक रात नाटक का मंचन किया गया। मां-बेटी के दो पीढि़यों के बीच सोच देख दर्शक भावुक हो गए। नाटक की दो मुख्य पात्र मां पूर्वा (संध्या सिंह) और बेटी सुमि (दीपिका सिंह) दो पीढि़यों की सोच और संघर्ष को दर्शाती हैं। बेटी थिएटर से जुड़कर आत्मसम्मान को प्राथमिकता देती है। एक रात के संवाद में दोनों के वर्षों के गिले-शिकवे दर्द और प्यार सामने आते हैं।
मां ने फिल्मों में काम पाने के लिए अनगिनत समझौते किए। पहले काम के लिए फिर इंडस्ट्री में बने रहने के लिए फिर स्टेटस और जीवनशैली को बनाए रखने के लिए मां मानती है कि यह दुनिया तभी कुछ देती है जब तुम बदले में कुछ देने को तैयार हो।
वहीं, बेटी थिएटर से जुड़ी है। वह आदर्शों पर विश्वास करती है। अपने आत्मसम्मान को सर्वोपरि मानती है। वह मां जैसे समझौते नहीं करती। थिएटर कभी उससे उसकी आत्मा नहीं मांगता और न ही इज्जत की कीमत पर कुछ चाहता है। यह टकराव सिर्फ दो सोच का नहीं, दो जिंदगियों का है।
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नाटक तब मोड़ लेता है जब बेटी बताती है कि थिएटर में मिले 22 साल बड़े पेंटर से वह प्यार करती है। यह सुन मां-बेटी दोनों की जिंदगी में भूचाल सा आ जाता है। इस नाटक में कहीं न कहीं बेपनाह प्यार और अपनापन भी है। मां की तबीयत खराब होती है तो बेटी उसका सिर अपनी गोद में रख उसे दिलासा देती है। सुमि की गोद में पूर्वा वह ममता महसूस करती है जो उसे कभी हासिल नहीं हुई। यह नाटक सिर्फ एक रात का संवाद नहीं बल्कि सालों अधूरे रिश्तों, और पीढि़यों के बीच के फासलों को उजागर करता है। दोनों कलाकारों संध्या और दीपिका ने अपने सशक्त अभिनय से दर्शकों को अंत तक बांधे रखा।
अशोक सिंह द्वारा लिखित और डॉ. ओमेंद्र कुमार द्वारा निर्देशित इस नाटक में मां-बेटी के रिश्ते की गहराई, टूटन और समझौतों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया। इस मौके पर डॉ. इंद्रमोहन रोहतगी, संस्थापक अध्यक्ष दीपक सोलोमन एवं बड़ी संख्या में कला प्रेमी मौजूद रहे।
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मां ने फिल्मों में काम पाने के लिए अनगिनत समझौते किए। पहले काम के लिए फिर इंडस्ट्री में बने रहने के लिए फिर स्टेटस और जीवनशैली को बनाए रखने के लिए मां मानती है कि यह दुनिया तभी कुछ देती है जब तुम बदले में कुछ देने को तैयार हो।
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वहीं, बेटी थिएटर से जुड़ी है। वह आदर्शों पर विश्वास करती है। अपने आत्मसम्मान को सर्वोपरि मानती है। वह मां जैसे समझौते नहीं करती। थिएटर कभी उससे उसकी आत्मा नहीं मांगता और न ही इज्जत की कीमत पर कुछ चाहता है। यह टकराव सिर्फ दो सोच का नहीं, दो जिंदगियों का है।
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नाटक तब मोड़ लेता है जब बेटी बताती है कि थिएटर में मिले 22 साल बड़े पेंटर से वह प्यार करती है। यह सुन मां-बेटी दोनों की जिंदगी में भूचाल सा आ जाता है। इस नाटक में कहीं न कहीं बेपनाह प्यार और अपनापन भी है। मां की तबीयत खराब होती है तो बेटी उसका सिर अपनी गोद में रख उसे दिलासा देती है। सुमि की गोद में पूर्वा वह ममता महसूस करती है जो उसे कभी हासिल नहीं हुई। यह नाटक सिर्फ एक रात का संवाद नहीं बल्कि सालों अधूरे रिश्तों, और पीढि़यों के बीच के फासलों को उजागर करता है। दोनों कलाकारों संध्या और दीपिका ने अपने सशक्त अभिनय से दर्शकों को अंत तक बांधे रखा।
अशोक सिंह द्वारा लिखित और डॉ. ओमेंद्र कुमार द्वारा निर्देशित इस नाटक में मां-बेटी के रिश्ते की गहराई, टूटन और समझौतों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया। इस मौके पर डॉ. इंद्रमोहन रोहतगी, संस्थापक अध्यक्ष दीपक सोलोमन एवं बड़ी संख्या में कला प्रेमी मौजूद रहे।