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148 साल बाद संयोग: सूर्य ग्रहण और शनि जयंती एक साथ, भारत में कहीं नहीं दिखाई देगा ग्रहण का असर
Thu, 10 Jun 2021 11:29 AM IST
शिखा पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
Published by: शिखा पांडेय
Updated Thu, 10 Jun 2021 11:29 AM IST
सार
सूर्यदेव और शनिदेव पिता-पुत्र हैं, और दोनों के बीच में बैर भाव रहता है। इससे पहले 26 मई 1873 में इस तरह का संयोग बना था।
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सूर्य ग्रहण और शनि जयंती
- फोटो : सोशल मीडिया
विस्तार
साल का पहला सूर्य ग्रहण 10 जून को पड़ेगा। गुरुवार को ही शनि जयंती भी मनाई जाएगी। यह योग 148 साल बाद पड़ेगा। पंडित केए दुबे पद्मेश ने बताया कि सूर्य ग्रहण दोपहर 1:42 से शाम 6:41 बजे तक पड़ेगा। वृष राशि और मृगशिरा नक्षत्र में पड़ने वाला सूर्य ग्रहण भारत के किसी भी हिस्से में दिखाई नहीं देगा।
इस कारण सूतक नहीं होगा। मंदिरों के पट बंद नहीं होंगे। फिर भी मेष, वृष, सिंह, तुला व धनु राशि के जातकों को मानसिक तनाव से बचना चाहिए। सूर्यग्रहण के दिन ही सूर्य पुत्र शनि का जन्मदिन है। शनि स्वतंत्र भारत का भाग्येश है। इसलिए अच्छे कर्म करें।
पं. पवन तिवारी ने बताया कि सूर्यदेव और शनिदेव पिता-पुत्र हैं, और दोनों के बीच में बैर भाव रहता है। इससे पहले 26 मई 1873 में इस तरह का संयोग बना था। जिन जातकों पर शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या या महादशा चल रही है उन्हें हनुमान चालीसा का पाठ और शनि से संबंधित चीजों का दान करना फलदायी हो सकता है।
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पंडित स्वाति सक्सेना ने बताया कि न्याय के देवता शनि देव व्यक्ति को उनके कर्मों के आधार पर फल देते हैं। न्याय संगत आचरण करने वालों को कभी भी शनि देव की कुदृष्टि और प्रकोप का भागी नहीं होना पड़ता। पहले शनिदेव के इष्ट भगवान शिव का ‘’ऊँ नम: शिवाय’ बोलते हुए गंगाजल, कच्चा दूध तथा काले तिल से अभिषेक करें।
अगर घर में पारद शिवलिंग है, तो उनका अभिषेक करें। फिर सरसों के तेल का दीपक प्रज्वलित करें तथा कस्तूरी अथवा चन्दन की धूप अर्पित करें। जरूरतमंद लोगों को तेल, काली उड़द व आवश्यक वस्तुओं का दान करें। जरूरतमंदों की मदद और बीमारों की सेवा से शनिदेव प्रसन्न होते हैं।
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इस कारण सूतक नहीं होगा। मंदिरों के पट बंद नहीं होंगे। फिर भी मेष, वृष, सिंह, तुला व धनु राशि के जातकों को मानसिक तनाव से बचना चाहिए। सूर्यग्रहण के दिन ही सूर्य पुत्र शनि का जन्मदिन है। शनि स्वतंत्र भारत का भाग्येश है। इसलिए अच्छे कर्म करें।
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पं. पवन तिवारी ने बताया कि सूर्यदेव और शनिदेव पिता-पुत्र हैं, और दोनों के बीच में बैर भाव रहता है। इससे पहले 26 मई 1873 में इस तरह का संयोग बना था। जिन जातकों पर शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या या महादशा चल रही है उन्हें हनुमान चालीसा का पाठ और शनि से संबंधित चीजों का दान करना फलदायी हो सकता है।
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पंडित स्वाति सक्सेना ने बताया कि न्याय के देवता शनि देव व्यक्ति को उनके कर्मों के आधार पर फल देते हैं। न्याय संगत आचरण करने वालों को कभी भी शनि देव की कुदृष्टि और प्रकोप का भागी नहीं होना पड़ता। पहले शनिदेव के इष्ट भगवान शिव का ‘’ऊँ नम: शिवाय’ बोलते हुए गंगाजल, कच्चा दूध तथा काले तिल से अभिषेक करें।
अगर घर में पारद शिवलिंग है, तो उनका अभिषेक करें। फिर सरसों के तेल का दीपक प्रज्वलित करें तथा कस्तूरी अथवा चन्दन की धूप अर्पित करें। जरूरतमंद लोगों को तेल, काली उड़द व आवश्यक वस्तुओं का दान करें। जरूरतमंदों की मदद और बीमारों की सेवा से शनिदेव प्रसन्न होते हैं।