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सीनियर डॉक्टरों को शर्म नहीं आई

Mon, 04 Apr 2016 01:44 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो Updated Mon, 04 Apr 2016 01:44 AM IST
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Senior doctors did not shy
घ्‍टटना स्‍थ्‍ाल पर पहुंचे डीएम - फोटो : amar ujala

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कानपुर। जिसको बचाने के लिए पूरे दिन सेना ने अभियान चलाया, सुबह से अफसर चीखते-दौड़ते रहे, यदि वह बच्ची जिंदा निकलती तो भी हैलट में उसे तत्काल इलाज मिलने की उम्मीद कम ही थी। क्योंकि जिस डॉक्टर पर खुशी के इलाज का जिम्मा था वह हैलट आई ही नहीं। सिर्फ फोन पर जूनियर डॉक्टरों से हाल-चाल लेती रहीं। शाम को खुशी जिस समय हैलट इमरजेंसी में पहुंची, वहां कहने के बावजूद कोई सीनियर डॉक्टर नहीं था। और तो और दोपहर दो बजे के बाद से जिस डॉक्टर रूपा डालमिया की शिफ्ट ड्यूटी थी वे भी मौजूद नहीं थीं। डॉक्टर रूपा दोपहर दो बजे के बाद इंचार्ज थीं इसलिए उन्हें तो ड्यूटी के हिसाब से और इस इमरजेंसी के लिहाज से हर हाल में मौजूद रहना ही था। ये उनकी ड्यूटी थी। पर वे हैलट झांकने तक नहीं आईं। हड़बड़ाए जूनियर डॉक्टर ही जुटे रहे।
जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के बाल रोग विभाग की डॉ. रूपा डालमिया की रविवार दो बजे से रात 10 बजे तक यूनिट (शिफ्ट) थी। उनको दोपहर में ही खुशी के इलाज की व्यवस्था को कह दिया गया था। साथ ही बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ. यशवंत राव ने तीन डॉक्टरों डॉ. जीएन द्विवेदी, जूनियर डॉक्टर डॉ. अभिषेक, डॉ, रचना की टीम भी बना दी थी। शाम 5ः37 बजे जब खुशी हैलट इमरजेंसी पहुंची तो वहां कोई भी सीनियर डॉक्टर नहीं था। आईसीयू में अफसरों के फौज-फाटे के बीच जूनियर डॉक्टर हड़बड़ाए से इधर-उधर भाग रहे थे। समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या करें। कोई कहे आईसीयू भेजो, कोई वेंटीलेटर लाओ चिल्ला रहा था। करीब 15 मिनट बाद सीनियर डॉ. जीएन द्विवेदी पहुंचे जबकि उन्हें पहले से मौजूद रहना चाहिए था। फिर खुशी का परीक्षण शुरू हुआ। ऐसे मामलों में एक-एक पल कीमती होता है लेकिन डॉक्टर अपने रवैये से बाज नहीं आए।
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इस संबंध में डॉ. रूपा डालमिया ने कहा कि उन्होंने जूनियर डॉक्टरों से कहा था कि बच्ची के आने की सूचना मुझे दे देना। चूंकि बच्ची की मौत अस्पताल आने से पहले ही मौत हो गई थी इसलिए मैं अस्पताल नहीं आई। मुझे आजमगढ़ मेडिकल कॉलेज भी जाना था इसलिए वहां के लिए निकल चुकी हूं। ऐसी इमरजेंसी के बावजूद ड्यूटी बीच में छोड़कर जाने के सवाल पर वे कोई जवाब नहीं दे पाईं।
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