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रावण तो जल गया लेकिन रावणत्व नहीं : मंदाकिनी दीदी

Fri, 02 Oct 2026 02:45 AM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Fri, 02 Oct 2026 02:45 AM IST
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Ravana has burned, but the spirit of Ravana remains: Mandakini Didi
कानपुर। श्रीरामलीला सोसाइटी के बैनर तले आयोजित रामकथा के तीसरे दिन रामचरित मानस मर्मज्ञ मंदाकिनी दीदी ने राजा जनक की पुष्प वाटिका और रावण की अशोक वाटिका के दृष्टांत से प्रेम को परिभाषित किया। उन्होंने कहा कि प्रेम वासना नहीं अलौकिकता है। प्रेम को जब वासना से जोड़ा जाता है तो यह रावणत्व होता है। रावण तो जल गया लेकिन रावणत्व नहीं जला।
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उन्होंने कहा कि रामचरित मानस से अंतर स्पष्ट है। जेन-जी को प्रेम और वासना का अंतर समझना आवश्यक है। पाश्चात्य प्रभाव से प्रणय के नए-नए रूप सामने आते हैं और अप्रिय घटनाएं होती हैं। रामकथा का आयोजन मर्चेंट चैंबर में किया गया। महाआरती और ओमकार जाप के बाद मंदाकिनी दीदी ने कथा प्रारंभ की। अतिशय भूख का प्रकारों का विश्लेषण करते हुए उन्होंने कहा कि वासना प्रेम का रूप धारण कर अमर्यादित हो जाती है। अशोक वाटिका में जगत जननी के प्रणय निवेदन अस्वीकार करने पर रावण क्रोध में चंद्रहास निकाल लेता है। वह वासना का अतिशय भूखा है। जैसे आज के दौर में एसिड फेंकने की घटनाएं होती हैं, लोग पशु जैसा व्यवहार करने लगते हैं। पाश्चात्य में यह चिंतन नहीं है लेकिन सनातन वालों को यह समझना चाहिए।
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उन्होंने पुष्प वाटिका का वर्णन करते हुए कहा कि प्रभु श्रीराम और जगत जननी के बीच एक शब्द नहीं बोला जाता और भावनाएं प्रेषित होती रहती हैं। यह अलौकिक प्रेम का रूप है। सौंदर्य से प्रेम होता है जिससे व्यक्ति के हृदय में सद्भाव पैदा करता है। प्रेम का सुख प्रियतम को सुख देने में होता है। रावण सीता मां की ओर आकर्षित था और श्रीराम को हटाना चाहता था, यही राक्षसत्व है। मंदाकिनी दीदी ने कहा कि रामचरित मानस सामाजिकता के रहस्य और बारीकियों को उद्घाटित करती है। इस मौके पर राजीव गर्ग, कमल किशोर अग्रवाल, आलोक अग्रवाल, अमरनाथ मेहरोत्रा, पवन अग्रवाल, लालजी शुक्ला, वीरेंद्र अग्रवाल, गोपाल कृष्ण माहेश्वरी, बृज किशोर कनोडिया, राकेश गर्ग आदि रहे।
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