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कानपुर में केवल 1.76 फीसदी भूमि पर हरियाली
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 22 Apr 2016 01:09 AM IST
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अंबेडकरनगर में इस तरह क्षतिग्रस्त हैं पेड़ों की सुरक्षा को सड़क के किनारे बने ट्री-गार्ड।
- फोटो : अमर उजाला
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लखनऊ। जंगल लगातार सिकुड़ते जा रहे हैं। निर्माण के नाम पर पेड़ों की बलि दी जा रही है। कंक्रीट के जंगल में हरियाली गुम हो गई है। हालात ये हैं कि प्रदेश की सात प्रतिशत से भी कम भूमि पर जंगल रह गए हैं। शुक्रवार को विश्व पृथ्वी दिवस है। इस वर्ष की थीम है ‘पृथ्वी के लिए वृक्ष’। कानपुर में हरियाली की स्थिति बहुत खराब है। आदर्श स्थिति में कुल क्षेत्रफल a 33 प्रतिशत हिस्सा जंगल होना चाहिए, लेकिन कानपुर में केवल 1.76 फीसदी भूमि पर हरियाली बची है। अमर उजाला हरियाली बढ़ाने के लिए लगातार अभियान चला रहा है।
दुनिया 45वां पृथ्वी दिवस मनाते हुए यह समझ बढ़ाने का प्रयास कर रही है कि पेड़ रहेंगे तो ही पृथ्वी बचेगी। सीमैप में बॉटनिस्ट व वैज्ञानिक संजय कुमार बताते हैं कि पौधरोपण के बाद उन्हें बचाना एक बड़ी चुनौती होती है। जितने पौधे लगाए जाते हैं, उनमें से 60 प्रतिशत ही बच पाते हैं। अभियानों के तहत लगाए जाने वाले पौधों के वृक्ष बनने की संभावना और भी कम होती है क्योंकि देखरेख नहीं होती। रिटायर्ड पौध विज्ञानी डॉ. आरएन मिश्रा बताते हैं कि प्रदेश में वन्य क्षेत्र घटने की वजह शहरों का विस्तार है। छोटे शहर बड़े हो रहे हैं, कस्बे शहर बन रहे हैं और गांव कस्बों में तब्दील हो रहे हैं। पहले खेती के लिए पेड़ कट रहे थे, लेकिन अब निर्माणों के लिए कटाई की जा रही है।
सूबे में हरियाली ः केंद्र द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में देश की 6.88 प्रतिशत भूमि है, लेकिन जंगल केवल 2.17 प्रतिशत। साथ ही अपने ही क्षेत्रफल के अनुपात में यहां सिर्फ 7.33 प्रतिशत जंगल बचा है। वहीं प्रदेश सरकार के आंकड़ों में यह संख्या घटकर 6.85 प्रतिशत ही रह जाती है।
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शब्दों की बाजीगरी ः जंगल शब्द कहने पर कोई बच्चा भी ऐसी जगह की कल्पना करेगा जहां ढेरों वृक्ष हों, खूब हरियाली हो, लेकिन पेड़ों की कमी को छिपाने के लिए सरकारी आंकड़ों में प्रदेश के जंगलों को उनकी विशेषताओं के बजाय खुले और घने जंगलों में बांट दिया गया है। इससे जंगल के क्षेत्र को बढ़ा हुआ दिखाया गया है। कुल भूमि जिसमें जंगल है, उसमें केवल 22.56 प्रतिशत पर ही घना जंगल है, बाकी 34.16 प्रतिशत पर मध्यम-घना जंगल और 42.34 प्रतिशत भूमि पर ओवन फॉरेस्ट या कहें ‘खुला जंगल’ है।
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दुनिया 45वां पृथ्वी दिवस मनाते हुए यह समझ बढ़ाने का प्रयास कर रही है कि पेड़ रहेंगे तो ही पृथ्वी बचेगी। सीमैप में बॉटनिस्ट व वैज्ञानिक संजय कुमार बताते हैं कि पौधरोपण के बाद उन्हें बचाना एक बड़ी चुनौती होती है। जितने पौधे लगाए जाते हैं, उनमें से 60 प्रतिशत ही बच पाते हैं। अभियानों के तहत लगाए जाने वाले पौधों के वृक्ष बनने की संभावना और भी कम होती है क्योंकि देखरेख नहीं होती। रिटायर्ड पौध विज्ञानी डॉ. आरएन मिश्रा बताते हैं कि प्रदेश में वन्य क्षेत्र घटने की वजह शहरों का विस्तार है। छोटे शहर बड़े हो रहे हैं, कस्बे शहर बन रहे हैं और गांव कस्बों में तब्दील हो रहे हैं। पहले खेती के लिए पेड़ कट रहे थे, लेकिन अब निर्माणों के लिए कटाई की जा रही है।
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सूबे में हरियाली ः केंद्र द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में देश की 6.88 प्रतिशत भूमि है, लेकिन जंगल केवल 2.17 प्रतिशत। साथ ही अपने ही क्षेत्रफल के अनुपात में यहां सिर्फ 7.33 प्रतिशत जंगल बचा है। वहीं प्रदेश सरकार के आंकड़ों में यह संख्या घटकर 6.85 प्रतिशत ही रह जाती है।
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शब्दों की बाजीगरी ः जंगल शब्द कहने पर कोई बच्चा भी ऐसी जगह की कल्पना करेगा जहां ढेरों वृक्ष हों, खूब हरियाली हो, लेकिन पेड़ों की कमी को छिपाने के लिए सरकारी आंकड़ों में प्रदेश के जंगलों को उनकी विशेषताओं के बजाय खुले और घने जंगलों में बांट दिया गया है। इससे जंगल के क्षेत्र को बढ़ा हुआ दिखाया गया है। कुल भूमि जिसमें जंगल है, उसमें केवल 22.56 प्रतिशत पर ही घना जंगल है, बाकी 34.16 प्रतिशत पर मध्यम-घना जंगल और 42.34 प्रतिशत भूमि पर ओवन फॉरेस्ट या कहें ‘खुला जंगल’ है।