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इस चर्चित निकाय क्षेत्र में भाजपा का सूपड़ा साफ, सपा सिर्फ खाता खोल सकी
बीरेश कुमार मिश्रा,अमर उजाला कानपुर
Updated Sat, 02 Dec 2017 11:57 AM IST
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यूपी के इटावा जिले में छह नगर निकाय के चुनाव में इस बार सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी का सूपड़ा साफ हो गया। लोकसभा और विधानसभा चुनावों में मतदाताओं ने जिस भाजपा को सिर आंखों पर बैठाया था। उसी मतदाता ने निकाय चुनावों में भाजपा से अपनी आंखें फेर ली। वहीं सपा को भी नहीं बख्शा। सपा ने वर्ष 2012 के चुनाव में सभी छह निकायों में अपने समर्थक प्रत्याशी को जिताया था। इस बार सपा को अभी तक सिर्फ एक ही सीट पर संतोष करना पड़ा है।
वहीं केंद्र और प्रदेश में अपनी सत्ता की हनक दिखाने वाले भाजपाइयों की निकाय चुनावों में लुटिया ही डूब गई। सबसे आश्चर्यजनक बात ये रही कि इटावा को छोड़ बाकी पंाच निकायों को दूसरा नंबर भी नसीब नहीं हुआ। वहीं सबसे कड़ा मुकाबला इस बार जसवंतनगर में अध्यक्ष पद के लिए था। यहां सपा प्रत्याशी के खिलाफ पूर्व मंत्री शिवपाल सिंह यादव ने बागी प्रत्याशी सुनील जोली को समर्थन दिया। शिवपाल सिंह की प्रतिष्ठा यहां दांव पर लगी थी। जसवंतनगर में शिवपाल सिंह यादव ने अपनी ताकत का एहसास कराया। यहां शिवपाल समर्थक जोली ने चेयरमैन का चुनाव जीत लिया।
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वहीं केंद्र और प्रदेश में अपनी सत्ता की हनक दिखाने वाले भाजपाइयों की निकाय चुनावों में लुटिया ही डूब गई। सबसे आश्चर्यजनक बात ये रही कि इटावा को छोड़ बाकी पंाच निकायों को दूसरा नंबर भी नसीब नहीं हुआ। वहीं सबसे कड़ा मुकाबला इस बार जसवंतनगर में अध्यक्ष पद के लिए था। यहां सपा प्रत्याशी के खिलाफ पूर्व मंत्री शिवपाल सिंह यादव ने बागी प्रत्याशी सुनील जोली को समर्थन दिया। शिवपाल सिंह की प्रतिष्ठा यहां दांव पर लगी थी। जसवंतनगर में शिवपाल सिंह यादव ने अपनी ताकत का एहसास कराया। यहां शिवपाल समर्थक जोली ने चेयरमैन का चुनाव जीत लिया।
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सबसे ज्यादा खराब हालत भाजपा की हुई
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वर्ष 2012 के चुनाव में वैसे तो सपा ने अपने सिंबल पर चुनाव नहीं लड़ा था लेकिन सभी छह निकायों में सपा के उम्मीदवार ही चुनाव जीते थे। इस चुनाव में सपा, भाजपा, बसपा एवं कांग्रेस ने अपने अपने सिंबल पर चुनाव लड़ा। लखना, इकदिल, जसवंतनगर, बकेवर में इस बार निर्दलीयों ने शहर की सरकार बनाई। लखना से डॉ. समीर त्रिपाठी, बकेवर से विनोद दोहरे, इकदिल में डॉ. सुबोध दीक्षित, जसवंतनगर में सुनील जोली ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा।
जनता ने उन्हें प्रथम नागरिक चुने जाने के फैसले को अपनी मंजूरी दे दी। छह में चार निकायों की जनता ने सपा, बसपा, भाजपा और कांग्रेस को सिरे से नकार दिया। सबसे ज्यादा खराब हालत भाजपा की हुई। भाजपा इटावा को छोड़कर कहीं मुकाबले में दिखाई नहीं पड़ी। यहां तक कि भरथना में निर्दलीय दूसरे स्थान पर, बसपा तीसरे स्थान पर रही। भाजपा को चौथा स्थान मिला। लखना, बकेवर और इकदिल में भी ऐसी ही स्थिति रही। इकदिल में तो भाजपा सातवें नंबर पर रही। जसवंतनगर में भाजपा ने प्रत्याशी ही नहीं उतारा था।
जिले के मतदाताओं ने 2014 में मुलायम सिंह यादव का गृहजनपद होने के बाद भी इटावा लोकसभा सुरक्षित सीट से भाजपा के अशोक दोहरे को निर्वाचित कर लोकसभा भेजा। अशोक दोहरे बसपा से भाजपा में आए थे। अपने कार्यकर्ता पर विश्वास न करके भाजपा ने दूसरे दल से आए अशोक दोहरे को टिकट थमाया।
जनता ने उन्हें प्रथम नागरिक चुने जाने के फैसले को अपनी मंजूरी दे दी। छह में चार निकायों की जनता ने सपा, बसपा, भाजपा और कांग्रेस को सिरे से नकार दिया। सबसे ज्यादा खराब हालत भाजपा की हुई। भाजपा इटावा को छोड़कर कहीं मुकाबले में दिखाई नहीं पड़ी। यहां तक कि भरथना में निर्दलीय दूसरे स्थान पर, बसपा तीसरे स्थान पर रही। भाजपा को चौथा स्थान मिला। लखना, बकेवर और इकदिल में भी ऐसी ही स्थिति रही। इकदिल में तो भाजपा सातवें नंबर पर रही। जसवंतनगर में भाजपा ने प्रत्याशी ही नहीं उतारा था।
जिले के मतदाताओं ने 2014 में मुलायम सिंह यादव का गृहजनपद होने के बाद भी इटावा लोकसभा सुरक्षित सीट से भाजपा के अशोक दोहरे को निर्वाचित कर लोकसभा भेजा। अशोक दोहरे बसपा से भाजपा में आए थे। अपने कार्यकर्ता पर विश्वास न करके भाजपा ने दूसरे दल से आए अशोक दोहरे को टिकट थमाया।
विधानसभा चुनावों में इटावा एवं भरथना सीट पर भाजपा प्रत्याशियों ने चुनाव जीता
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अशोक दोहरे ने पलटकर कार्यकर्ताओं की ओर नहीं देखा। विधानसभा चुनाव हो या नगर निकाय चुनाव वे कहीं नजर नहीं आए। इसके बाद वर्ष 2017 में विधानसभा चुनावों में इटावा एवं भरथना सीट पर भाजपा प्रत्याशियों ने चुनाव जीता। भाजपा सरकार में जिले को कोई प्रतिनिधित्व नहीं मिला।
किसी विधायक को मंत्रिमंडल में स्थान नहीं मिला। कार्यकर्ता पहले की तरह से उपेक्षित ही रहा। जिला संगठन की भी कार्यकर्ताओं पर कोई पकड़ नहीं रही। संगठन और कार्यकर्ता पूरे चुनाव में अलग अलग रास्तों पर चलते दिखाई दिए। प्रशासनिक मशीनरी से भी कार्यकर्ताओं को कोई सम्मान नहीं मिला। फलस्वरूप कार्यकर्ताओं ने भाजपा प्रत्याशियों को हराकर संगठन और सरकार को संदेश दिया है। यही हालत रही तो आने वाले लोकसभा चुनाव में भाजपा को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा।
जिले के प्रभारी मंत्री स्वतंत्र देव सिंह वैसे तो महीने में दो-दो बार बैठक करने आते थे। उनका दौरा प्रशासनिक अधिकारियों की बैठकों एवं सरकारी कार्यक्रमों तक ही सीमित रहता था। आम कार्यकर्ताओं एवं आम मतदाताओं से उन्हें मिलने की फुरसत नहीं रहती थी। कार्यकर्ता संगठन और सरकार में पूरी तरह से उपेक्षित हो गया। मतदाताओं का भी धीरे-धीरे भाजपा से मोहभंग हो गया। नतीजा एक सांसद एवं दो विधायक वाली भाजपा निकाय चुनाव में एक भी सीट नहीं जीत सकी। भाजपा की अब तक की यह सबसे शर्मनाक हार है।
किसी विधायक को मंत्रिमंडल में स्थान नहीं मिला। कार्यकर्ता पहले की तरह से उपेक्षित ही रहा। जिला संगठन की भी कार्यकर्ताओं पर कोई पकड़ नहीं रही। संगठन और कार्यकर्ता पूरे चुनाव में अलग अलग रास्तों पर चलते दिखाई दिए। प्रशासनिक मशीनरी से भी कार्यकर्ताओं को कोई सम्मान नहीं मिला। फलस्वरूप कार्यकर्ताओं ने भाजपा प्रत्याशियों को हराकर संगठन और सरकार को संदेश दिया है। यही हालत रही तो आने वाले लोकसभा चुनाव में भाजपा को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा।
जिले के प्रभारी मंत्री स्वतंत्र देव सिंह वैसे तो महीने में दो-दो बार बैठक करने आते थे। उनका दौरा प्रशासनिक अधिकारियों की बैठकों एवं सरकारी कार्यक्रमों तक ही सीमित रहता था। आम कार्यकर्ताओं एवं आम मतदाताओं से उन्हें मिलने की फुरसत नहीं रहती थी। कार्यकर्ता संगठन और सरकार में पूरी तरह से उपेक्षित हो गया। मतदाताओं का भी धीरे-धीरे भाजपा से मोहभंग हो गया। नतीजा एक सांसद एवं दो विधायक वाली भाजपा निकाय चुनाव में एक भी सीट नहीं जीत सकी। भाजपा की अब तक की यह सबसे शर्मनाक हार है।