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Kanpur News: मिल और बड़े उद्योग हो रहे बंद, बढ़ रहे असंगठित श्रमिक
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कानपुर। कानपुर शहर के औद्योगिक स्वरूप को वापस लाने के लिए सरकारें और जनप्रतिनिधि जुबानी घोड़े दाैड़ा रहे हैं, लेकिन शहर से बड़े उद्योग खत्म होते जा रहे हैं। बीआईसी की ओर से संचालित लाल इमली मिल कभी भी बंद हो सकती है। एनटीसी की मिलें पहले ही बंद हो चुकी हैं। एनटीसी को बंद करने की तैयारी चल रही है। इस तरह मिल और बड़े उद्योग बद हो रहे हैं। वहीं, असंगठित श्रमिक बढ़ रहे हैं।
1500 करोड़ रुपये से 13 साल पहले पुनर्जीवित की गई कानपुर फर्टिलाइजर एंड केमिकल्स लिमिटेड (केएफसीएल) को प्रबंधन ने एक महीने पहले बंद कर दिया था। यह शहर का आखिरी बड़ा उद्योग था, जिसमें हजारों लोगों को एक साथ रोजगार दिया जाता था। वहीं, बड़े उद्योगों और मिलों के बंद होने से संगठित क्षेत्र के मजदूरों की संख्या कम हो गई। शहर में असंगठित क्षेत्र के मजदूर तेजी से बढ़ गए हैं। उप्र भवन एवं सन्निर्माण कर्मकार कल्याण बोर्ड के तहत शहर में 6,75,194 श्रमिक पंजीकृत हैं। असंगठित कर्मकार सामाजिक सुरक्षा बोर्ड में 15,32,895 श्रमिक पंजीकृत हैं, जबकि एमएसएमई में 5.5 लाख श्रमिक काम कर रहे हैं।
24 मार्च 1803 को ईस्ट इंडिया कंपनी ने कानपुर को जिला पोषित किया था। समय बीता और कानपुर एक औद्योगिक नगरी के तौर पर विकसित होने लगा। ब्रिटिश इंडिया काॅरपोरेशन (बीआईसी) और नेशनल टेक्सटाइल काॅरपोरेशन (एनटीसी) के अधीन लाल इमली, म्योर मिल, एल्गिन मिल एक और दो, कानपुर टेक्सटाइल, लक्ष्मी रतन कॉटन मिल, अथर्टन मिल, विक्टोरिया मिल, स्वदेशी कॉटन मिल की नींव पड़ी। इन मिलों के उत्पादों ने धूम मचाई। मैनचेस्टर ऑफ द ईस्ट कहे जाने वाले शहर की इन मिलों में तीन पालियों में कपड़ों का उत्पादन होता था। तीन पाली में एक मिल में लगभग चार से पांच हजार मजदूर काम करते थे। इसके अलावा निजी क्षेत्र की जेके कॉटन, जेके जूट मिल में 10 हजार से ज्यादा लोग काम करते थे। विश्व प्रसिद्ध लाल इमली बंदी के कगार पर है। यहां पर बचे 150 से ज्यादा श्रमिकों के बकाया भुगतान की प्रक्रिया चल रही है। एनटीसी की मिलें पहले ही बंद हो चुकी हैं। केएफसीएल निजी क्षेत्र की बड़ी इकाई थी, जो हजारों लोगों को रोजगार दे रही थी। शहर में बड़े उद्योग बचे नहीं हैं। जो चल रहे थे, उन्हें भी बंद करने पर मजबूर होना पड़ा। शहर की एक बड़ी इस्पात कंपनी भी घाटे में चल रही है। होजरी उद्योग भी सिमट रहा है।
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- 14 मई 1989 को सबसे पहले शहर में जेके कॉटन मिल को बंद किया गया था। रात में बंदी का नोटिस चस्पा किया गया था। मिल में तीन पालियों में 3500 श्रमिक काम करते थे।
- जेके जूट मिल 1993 में बंद की गई थी। कुछ साल बाद सारडा समूह ने मिल चलाने का प्रयास किया। 2013 से काम पूरी तरह बंद हो गया। मिल में 3000 श्रमिक काम करते थे।
- 2006 में एलएमएल बंद हो गई। एलएमएल में 4000 श्रमिक काम करते थे।
- 2002 में एनटीसी समूह की कंपनी लक्ष्मी रतन मिल को बंद किया गया।
- 2003 में म्योर मिल, स्वदेशी कॉटन, अथर्टन और विक्टोरिया मिल को बंद किया गया।
- एनटीसी की इन मिलों में 25-30 हजार से ज्यादा श्रमिक काम करते थे।
- 2005 में बीआईसी के अधीन संचालित कानपुर टेक्सटाइल को रात 12 बजे बंद कर दिया गया।
- 2006 में एल्गिन मिल एक और एल्गिन मिल को बंद कर दिया गया। बीआईसी की इन तीन मिलों में पांच हजार लोग काम करते थे।
मजदूरों की स्थिति बहुत खराब है। 14 घंटे का काम और 6 घंटे का दाम दिया जा रहा है। असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों का तो कोई वेतन ही निर्धारित नहीं है। बताया कुछ और दिया कुछ और जाता है। इस पर कोई बात भी नहीं करना चाहता है। शिकागाे क्रांति की फिर आवश्यकता हो गई है। - राजेश कुमार शुक्ला, महामंत्री, ईपीएफ स्टाफ पेंशनर्स एसोसिएशन उप्र।
शहर में बड़े उद्योग और मिलें बंद होती जा रही हैं। एक समय में शहर की सरकारी और निजी क्षेत्र की 25 मिलों में ही पांच लाख से ज्यादा श्रमिक काम करते थे। ये सभी संगठित उद्योग थे। अब शहर में निर्माण और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की संख्या बढ़ती जा रही है। एमएसएमई भी रोजगार उपलब्ध करा रहे है। असित सिंह, अध्यक्ष, एटक।
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1500 करोड़ रुपये से 13 साल पहले पुनर्जीवित की गई कानपुर फर्टिलाइजर एंड केमिकल्स लिमिटेड (केएफसीएल) को प्रबंधन ने एक महीने पहले बंद कर दिया था। यह शहर का आखिरी बड़ा उद्योग था, जिसमें हजारों लोगों को एक साथ रोजगार दिया जाता था। वहीं, बड़े उद्योगों और मिलों के बंद होने से संगठित क्षेत्र के मजदूरों की संख्या कम हो गई। शहर में असंगठित क्षेत्र के मजदूर तेजी से बढ़ गए हैं। उप्र भवन एवं सन्निर्माण कर्मकार कल्याण बोर्ड के तहत शहर में 6,75,194 श्रमिक पंजीकृत हैं। असंगठित कर्मकार सामाजिक सुरक्षा बोर्ड में 15,32,895 श्रमिक पंजीकृत हैं, जबकि एमएसएमई में 5.5 लाख श्रमिक काम कर रहे हैं।
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24 मार्च 1803 को ईस्ट इंडिया कंपनी ने कानपुर को जिला पोषित किया था। समय बीता और कानपुर एक औद्योगिक नगरी के तौर पर विकसित होने लगा। ब्रिटिश इंडिया काॅरपोरेशन (बीआईसी) और नेशनल टेक्सटाइल काॅरपोरेशन (एनटीसी) के अधीन लाल इमली, म्योर मिल, एल्गिन मिल एक और दो, कानपुर टेक्सटाइल, लक्ष्मी रतन कॉटन मिल, अथर्टन मिल, विक्टोरिया मिल, स्वदेशी कॉटन मिल की नींव पड़ी। इन मिलों के उत्पादों ने धूम मचाई। मैनचेस्टर ऑफ द ईस्ट कहे जाने वाले शहर की इन मिलों में तीन पालियों में कपड़ों का उत्पादन होता था। तीन पाली में एक मिल में लगभग चार से पांच हजार मजदूर काम करते थे। इसके अलावा निजी क्षेत्र की जेके कॉटन, जेके जूट मिल में 10 हजार से ज्यादा लोग काम करते थे। विश्व प्रसिद्ध लाल इमली बंदी के कगार पर है। यहां पर बचे 150 से ज्यादा श्रमिकों के बकाया भुगतान की प्रक्रिया चल रही है। एनटीसी की मिलें पहले ही बंद हो चुकी हैं। केएफसीएल निजी क्षेत्र की बड़ी इकाई थी, जो हजारों लोगों को रोजगार दे रही थी। शहर में बड़े उद्योग बचे नहीं हैं। जो चल रहे थे, उन्हें भी बंद करने पर मजबूर होना पड़ा। शहर की एक बड़ी इस्पात कंपनी भी घाटे में चल रही है। होजरी उद्योग भी सिमट रहा है।
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- 14 मई 1989 को सबसे पहले शहर में जेके कॉटन मिल को बंद किया गया था। रात में बंदी का नोटिस चस्पा किया गया था। मिल में तीन पालियों में 3500 श्रमिक काम करते थे।
- जेके जूट मिल 1993 में बंद की गई थी। कुछ साल बाद सारडा समूह ने मिल चलाने का प्रयास किया। 2013 से काम पूरी तरह बंद हो गया। मिल में 3000 श्रमिक काम करते थे।
- 2006 में एलएमएल बंद हो गई। एलएमएल में 4000 श्रमिक काम करते थे।
- 2002 में एनटीसी समूह की कंपनी लक्ष्मी रतन मिल को बंद किया गया।
- 2003 में म्योर मिल, स्वदेशी कॉटन, अथर्टन और विक्टोरिया मिल को बंद किया गया।
- एनटीसी की इन मिलों में 25-30 हजार से ज्यादा श्रमिक काम करते थे।
- 2005 में बीआईसी के अधीन संचालित कानपुर टेक्सटाइल को रात 12 बजे बंद कर दिया गया।
- 2006 में एल्गिन मिल एक और एल्गिन मिल को बंद कर दिया गया। बीआईसी की इन तीन मिलों में पांच हजार लोग काम करते थे।
मजदूरों की स्थिति बहुत खराब है। 14 घंटे का काम और 6 घंटे का दाम दिया जा रहा है। असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों का तो कोई वेतन ही निर्धारित नहीं है। बताया कुछ और दिया कुछ और जाता है। इस पर कोई बात भी नहीं करना चाहता है। शिकागाे क्रांति की फिर आवश्यकता हो गई है। - राजेश कुमार शुक्ला, महामंत्री, ईपीएफ स्टाफ पेंशनर्स एसोसिएशन उप्र।
शहर में बड़े उद्योग और मिलें बंद होती जा रही हैं। एक समय में शहर की सरकारी और निजी क्षेत्र की 25 मिलों में ही पांच लाख से ज्यादा श्रमिक काम करते थे। ये सभी संगठित उद्योग थे। अब शहर में निर्माण और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की संख्या बढ़ती जा रही है। एमएसएमई भी रोजगार उपलब्ध करा रहे है। असित सिंह, अध्यक्ष, एटक।