हाय रे बेरोजगारी, एमबीए पास लगाएगा झाड़ूू
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अलीगढ़ से किया एमबीए
बक्सर (बिहार) के ग्राम फफदर निवासी लोरिक पासवान के बेटे सरोज कुमार ने 2015 में अलीगढ़ स्थित एक इंस्टीट्यूट से मार्केटिंग में एमबीए किया। उसने बताया कि पढ़ाई के लिए मजदूर पिता और निजी नौकरी करने वाले छोटे भाई ने जैसे-तैसे उसकी फीस जमा की। वह भी ट्यूशन पढ़ाता रहा। घर में कभी-कभी खाने के फाके भी पड़ जाते थे। कई बार नमक रोटी से ही पेट भरना पड़ता था। इसके उसकी मां की तबियत खराब हो गई। तब उसने सोचा था कि एमबीए करते ही उसकी अच्छी नौकरी लग जाएगी और वह अपने साथ ही परिवार का भी सपना पूरा करेगा।
कंपनी ने किया धाेखा
एमबीए करते ही कैंपस सिलेक्शन के रूप में कंसर्ट डिजिटल इंजीनियरिंग टेक्नालॉजी, अलीगढ़ में सात हजार रुपये महीने की नौकरी लगी, कंपनी ने शर्तों के पालन के बजाय उनसे बेतहाशा काम लिया। बार - बार आश्वासन के बावजूद वेतन नहीं बढ़ाया तो उसने नौकरी छोड़ दी। फिर पटना के एक नर्सिंगहोम में नौकरी मिली। उसे मरीज लाने का लक्ष्य दिया गया, पर नर्सिंगहोम ठीक न होने से लक्ष्य पूरा नहीं हो पाया तोे उसे नौकरी से हाथ धोना पड़ा। इसी बीच नगर निगम कानपुर में संविदा पर सफाई कर्मियों की जगह निकली तो उसने बड़ी उम्मीद के साथ आवेदन किया।