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समाज के लिए दंगों में दे दी प्राणों की आहुति, ऐसे थे गणेश शंकर विद्यार्थी

Wed, 26 Oct 2016 06:30 PM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, कानपुर
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, कानपुर Updated Wed, 26 Oct 2016 06:30 PM IST
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journalist ganesh shankar vidyarthi birthday
गणेश शंकर विद्यार्थी (फाइल फोटो)

पत्रकारिता के पुरोधा कहे जाने वाले गणेश शंकर विद्यार्थी का आज जन्मदिन है। आज यानी 26 अक्तूबर 1890 को हुआ था। पत्रकारिता के दौरान इन्होंने अपना सर्वस्व समाज सेवा में लगा दिया। यहां तक कि अपने प्राणों की आहुति तक दे दी। 23 मार्च, 1931 को सरदार भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी हुई थी। अगली सुबह 24 मार्च को कानपुर हिंदू-मुस्लिम दंगे की आग में जल रहा था। ऐसे विकराल समय में विद्याथीर्जी लोगों को शांत करने और सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने के लिए सक्रिय हुए। 25 मार्च, 1931 को कानपुर के चौबे गोला इलाके में उनकी हत्या कर दी गई। भीषण मारकाट में दो दिन तक उनका कोई अत-पता न लग सका। दो दिन बाद उनका शव अस्पताल में ढूंढ़ा जा सका। शव इतना फूल गया था कि उसे पहचानना तक मुश्किल था। इसके बाद गुपचुप तरीके से उनका अंतिम संस्कार भी करा दिया गया।

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इतने महान व्यक्ति की ऐसी मौत बेहद दुखद घटना थी। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या ऐसी मौत उनके नसीब में आने योग्य थी। उनके सामाजिक कार्यों के आधार पर तो कदाचित ऐसा नहीं होना चाहिए था। यदि उनके कार्यों का लेखा-जोखा तैयार हो तो हमारी आत्मा मन ही मन रोएगी कि हमने एक ऐसे इंसान को खो दिया जिससे हमे बहुत कुछ सीखना था।
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पत्रकारिता जगत में लेकर आए क्रांति
उन्होंने पत्रकारिता जगत में क्रांति ला दी थी। कितने ही नए-नए शब्दों की खोजकर समाज को प्रदान किया। इस विशेषता से ही उन्हें एक अलग पहचान मिली। बीसवीं शताब्दी के सर्वाधिक सक्रिय, निर्भीक और जनप्रिय पत्रकार के रूप में उभर कर सामने आए। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान पत्रकारिता उनका मिशन बन गई।
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इनका जन्म 26 अक्तूबर 1890 को इलाहाबाद के अतरसुइया मुहल्ले में रहने वाले एक कायस्थ परिवार में हुआ था। इनके पिता मुंशी जयनारायण हथगांव, जिला फतेहपुर यूपी के निवासी थे। पिता ग्वालियर रियासत में मुंगावली के ऐंग्लो वर्नाक्युलर स्कूल के हेडमास्टर थे तो माता गोमती देवी घर संभालती थी। इनकी प्रारंभिक शिक्षा ग्वालियर में ही हुई। विद्यारंभ उर्दू से हुआ और आगे चलकर अंग्रेजी मिडिल की परीक्षा भी पास की।

कानपुर से रहा विशेष जुड़ाव...
विद्यार्थी जी अपनी आगे की शिक्षा के लिए बडे भाई शिवव्रत नारायण के पास कानपुर चले आए। 1907 में आगे की पढाई के लिए कायस्थ पाठशाला इलाहाबाद चले गए। यहां इन्होंने 'कर्मयोगी' और उर्दू ‘स्वराज’ अखबार से पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखा। 

बाद में ‘सरस्वती’ में सहायक संपादक के बतौर काम किया। कानपुर में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के सान्निध्य में उन्होंने आरंभिक दीक्षा ग्रहण की, लेकिन ‘सरस्वती’ का विशुद्ध साहित्यिक रुझान और विद्यार्थी की राजनीतिक अभिरुचि में तालमेल नहीं बैठ सका। दिसंबर, 1912 में वे ‘अभ्युदय’ में चले गए, जहां 23 सितंबर, 1913 तक कार्यरत रहे।

कानपुर के फील खाना मोहाल में प्रताप प्रेस की नींव डाली 1913 को साप्ताहिक प्रताप का पहला अंक निकाला। इस पहले अंक से ही यह सिद्धान्त सूचक पंक्तियाँ प्रताप में छपने लगीं जिसने लोगों ने बेहद पसंद किया... 

जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है।
यह नर नहीं, नर पशु निरा है और मृतक समान है।।
 

अपने पहेल अंक में ही ‘प्रताप’ के माध्यम से विद्यार्थीजी ने यह स्पष्ट कर दिया था कि वे किसी की प्रशंसा या अप्रशंसा, किसी की प्रसन्नता या अप्रसन्नता, किसी की घुड़की या धमकी, से विचलित नहीं होने वाले थे, उन्होंने लिखा सांप्रदायिक और व्यक्तिगत झगड़ों से प्रताप सदा अलग रहने की कोशिश करेगा। उसका जन्म किसी विशेष सभा, संस्था, व्यक्ति या मत के पालन-पोषण, रक्षा तथा विरोध के लिए नहीं हुआ है किंतु उसका मत स्वातंत्र्य विचार और उसका धर्म सत्य होगा।’ और ऐसा हुआ भी। इसलिए थोड़े ही समय में 'प्रताप' ने स्वाधीनता आदोंलन में बेहतर मुकाम पा लिया। 



रचनात्मक लेखन में थी महारथ हासिल 
विद्यार्थीजी का लेखन केवल राजनीतिक विषयों तक सीमित नहीं रहा। समय मिलने पर वे वैचारिक और रचनात्मक लेखन भी करते रहे हैं। महाराणा प्रताप, दादाभाई नौरोजी, महात्मा गोखले, लोकमान्य तिलक, कर्मवीर गांधी आदि महापुरुषों पर लिखे रेखाचित्र, हाथी की फांसी नामक कहानी, विक्टर ह्यूगो के उपन्यासों के ‘आहुति’ और ‘बलिदान’ नाम से किए गए अनुवाद, जेल जीवन के अनुभव आदि रचनाएं विद्यार्थीजी की रचनात्मक सामर्थ्य का प्रमाण हैं। विद्यार्थीजी के जेल जाने पर ‘प्रताप’ का कार्यभार कृष्णदत्त पालीवाल, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, माखनलाल चतुर्वेदी, प्रकाशनारायण शिरोमणि, श्रीनिवास बाला जी हार्डीकर आदि की टीम ने बखूबी संभाला। 
 

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