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यौन उत्पीड़न मामला: आईआईटी प्रोफेसर की अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश रद्द, सवेतन बहाल
Tue, 20 May 2025 11:24 AM IST
शिखा पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
Published by: शिखा पांडेय
Updated Tue, 20 May 2025 11:24 AM IST
सार
यौन उत्पीड़न के आरोपों में घिरे प्रोफेसर आनंद सुब्रमण्यम को कोर्ट ने राहत दी। कोर्ट ने तय अधिनियम के तहत मामले की नए सिरे से जांच का आदेश दिया।
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आईआईटी कानपुर
- फोटो : सोशल मीडिया
विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आईआईटी कानपुर के मटेरियल साइंस के प्रोफेसर आनंद सुब्रमण्यम को यौन उत्पीड़न के आरोपों में दी गई अनिवार्य सेवानिवृत्ति के आदेश को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने उन्हें तत्काल सवेतन बहाल करने का आदेश दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति जेजे मुनीर की अदालत ने प्रोफेसर आनंद की याचिका स्वीकार करते हुए दिया है।
प्रो. सुब्रमण्यम पर उनके अधीन शोध कर रही छात्रा ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। इस शिकायत पर आईआईटी की आंतरिक शिकायत समिति ने जांच कर रिपोर्ट दी। इसके आधार पर 22 फरवरी 2023 को बोर्ड ऑफ गवर्नर्स ने उन्हें जबरन सेवानिवृत्त करने का फैसला देकर एक मार्च को इसे लागू करने का आदेश दिया था। इसके खिलाफ प्रोफेसर ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उनके अधिवक्ता ने दलील दी कि जांच प्रक्रिया में सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया। यह कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम का उल्लंघन है। कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि जांच में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन नहीं हुआ। हालांकि, कोर्ट ने मामले की जांच नए सिरे से कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम 2013 के प्रावधानों के तहत करने का आदेश भी दिया है।
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प्रो. सुब्रमण्यम पर उनके अधीन शोध कर रही छात्रा ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। इस शिकायत पर आईआईटी की आंतरिक शिकायत समिति ने जांच कर रिपोर्ट दी। इसके आधार पर 22 फरवरी 2023 को बोर्ड ऑफ गवर्नर्स ने उन्हें जबरन सेवानिवृत्त करने का फैसला देकर एक मार्च को इसे लागू करने का आदेश दिया था। इसके खिलाफ प्रोफेसर ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उनके अधिवक्ता ने दलील दी कि जांच प्रक्रिया में सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया। यह कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम का उल्लंघन है। कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि जांच में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन नहीं हुआ। हालांकि, कोर्ट ने मामले की जांच नए सिरे से कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम 2013 के प्रावधानों के तहत करने का आदेश भी दिया है।
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