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पढ़िए अाखिर कैसे देश की सुरक्षा में आईआईटीयंस बनेंगे मददगार

Sun, 13 Nov 2016 11:10 PM IST
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर Updated Sun, 13 Nov 2016 11:10 PM IST
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iit kanpur helps to protect our army mens
जवानाें की मदद काेअाईअाईटीयंस देंगे साथ
देश की जल, थल और नभ (आकाश) की सुरक्षा में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मददगार बनेगा। इसके लिए डिपार्टमेंट ऑफ रिसर्च एंड डिफेंस आर्गेनाइजेशन (डीआरडीओ) से समझौता हुआ है। आईआईटी के विज्ञानी अनमैंड एरियल व्हीकल (मानवरहित हवाई वाहन, यूएवी) और अनमैंड अंडर वॉटर व्हीकल (मानवरहित जल वाहन) पर काम कर रहे हैं। यह तकनीक सेना को दी जाएगी। आईआईटी की रिसर्च पर रक्षामंत्री मनोहर परिकर के वैज्ञानिक सलाहकार डॉ. जी सतीश रेड्डी भी खुशी जता चुके हैं।
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आईआईटी में चल रहे चार दिवसीय (11 से 14 नवंबर) 54वें नेशनल मेटलर्जिकल डे और 70वें एनुअल टेक्निकल मीटिंग के तीसरे दिन सैन्य ताकत को बढ़ाने पर चर्चा हुई। आईआईटी कानपुर के निदेशक प्रो. इंद्रनील मन्ना ने बताया कि यूएवी पर काम चल रहा है। यह प्रोजेक्ट प्रभावशाली है। हाई-फाई कैमरे की मदद से अंतरराष्ट्रीय सीमा की निगरानी की जा सकती है। किसी तरह की हलचल या फिर गतिविधि की जानकारी मिल जाएगी। समुद्री सुरक्षा और मजबूत की जाए, इस दिशा में प्रयास चल रहे हैं। कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट, मेकेनिकल इंजीनियरिंग और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के विज्ञानी अनमैंड अंडर वाटर तकनीक का प्रोटोटाइप तैयार कर रहे हैं। यह उपक्रम पनडुब्बी जैसी होगा। स्ट्रक्चरल सेरेमिक मैटेरियल की मदद से अधिक ताप झेलने वाला स्टील बनाया जा रहा है। थ्री डी पेंटिंग पर भी काम चल रहा है। 
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iit kanpur helps to protect our army mens
सेना के वाहनाें काे बनाया जाएगा अाधुनिक - फोटो : अमर उजाला
हाइपर सोनिक मैटेरियल से मजबूत होंगे सैन्य वाहन
हाइपर सोनिक मैटेरियल से तैयार सेना के वाहन और हथियारों को नष्ट नहीं किया जा सकेगा। इनकी गति ध्वनि की गति से छह गुना ज्यादा होगी। इस दिशा में डिफेंस मेटलर्जिकल रिसर्च लेबोरेट्री (डीएमआरएल) रिसर्च कर रहा है। निदेशक प्रो. समीर कामत ने कहा कि सैन्य वाहन, टैंकर और तोप का मैटेरियल डीएमआरएल तैयार करता है। मेटैलिक और सेरेमिक मैटेरियल से हल्के, मजबूत वाहन, हथियार बनाए जा रहे हैं। जल सेना का समुद्री जहाज भी मजबूत किया जा रहा है। अब देश में बने मैटेरियल से ही समुद्री जहाज बन रहे हैं। पहले बाहर से मैटेरियल मंगाया जाता था। 
सस्ता होगा घुटना प्रत्यारोपण
मेटल्स एंड मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग का दायरा बढ़ा है। अब बायोमेडिकल में भी काम हो रहा है। आईआईएससी बंगलूरू के मैटेरियल रिसर्च सेंटर में तैनात प्रो. विक्रम जीत बासु ने बताया कि अगले पांच साल में कूल्हा और घुटने का प्रत्यारोपण आसान हो जाएगा। स्पेसफिक इंप्लांट तकनीक से कूल्हा तैयार किया जा रहा है। इसकी कीमत काफी कम है। अभी प्रत्यारोपण पर दो लाख रुपये का खर्च आता है। आईआईटी कानपुर के प्रो. बलानी ने कहा कि लिक्विड खत्म होने से अब घुटने की कटोरी नहीं जाएगी। इसके लिए एसी ट्यूबलर सॉकेट बनाया जा रहा है। सॉकेट लगाकर घुटने को मजबूत बनाया जाएगा। 
 
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