{"_id":"5c98e9fcbdec22146e0fa190","slug":"holi-ganga-mela-kanpur-2019-date","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"गंगा मेला: रंग ठेला कनपुरियों को कर देगा सराबोर, हवाओं में घुलेगा अबीर गुलाल","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
गंगा मेला: रंग ठेला कनपुरियों को कर देगा सराबोर, हवाओं में घुलेगा अबीर गुलाल
Mon, 25 Mar 2019 08:17 PM IST
प्रभापुंज मिश्रा
यूपी डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
यूपी डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
Published by: प्रभापुंज मिश्रा
Updated Mon, 25 Mar 2019 08:17 PM IST
विज्ञापन
रंग में सराबोर छात्राएं
- फोटो : अमर उजाला
कानपुर में गंगा मेला पर हटिया से 77 सालों से निकलता आ रहा रंग ठेला इस बार भी सभी को सराबोर कर देगा। हटिया में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ शुरू हुए विरोध के चलते गोरों ने गिरफ्तार किए गए आजादी के दीवानों को इसी दिन रिहा किया था। इसी खुशी में गंगा मेला पर यह रंग ठेला निकलता है।
इस बार गंगा मेला मंगलवार को है। सरसैया घाट पर शाम चार बजे से गंगा मेला भी लगेगा। इसके चलते प्रशासनिक अधिकारी सोमवार देर शाम तक तैयारियों में लगे रहे। विभिन्न संगठनों के लोग भी देर रात तक जुटे रहे। कानपुर हटिया होली महोत्सव कमेटी की ओर से इस बार 78वां रंग ठेला निकाला जाएगा।
विज्ञापन
इस बार गंगा मेला मंगलवार को है। सरसैया घाट पर शाम चार बजे से गंगा मेला भी लगेगा। इसके चलते प्रशासनिक अधिकारी सोमवार देर शाम तक तैयारियों में लगे रहे। विभिन्न संगठनों के लोग भी देर रात तक जुटे रहे। कानपुर हटिया होली महोत्सव कमेटी की ओर से इस बार 78वां रंग ठेला निकाला जाएगा।
विज्ञापन
होली की मस्ती
- फोटो : अमर उजाला
ठेला रज्जन बाबू पार्क हटिया से निकलेगा। यह जनरलगंज, नयागंज, बादशाही नाका आदि क्षेत्रों से होते हुए गुजरेगा और वापस पार्क में आकर समाप्त होगा। शाम को रज्जन बाबू पार्क में मेला भी लगेगा। इसमें बच्चों के लिए निशुल्क झूले और खाने-पीने के लजीज व्यंजन भी होंगे।
गंगा मेला की परंपरा अंग्रेजी हुकूमत की हार का प्रतीक भी है। वर्ष 1942 में इस मेले की नींव पड़ी थी। मेला संयोजक ज्ञानेंद्र विश्नोई बताते हैं कि कमेटी की स्थापना स्व. गुलाब चंद्र सेठ ने की थी। हटिया तब नगर के बड़े व्यापारियों और क्रांतिकारियों का गढ़ हुआ करता था।
गंगा मेला की परंपरा अंग्रेजी हुकूमत की हार का प्रतीक भी है। वर्ष 1942 में इस मेले की नींव पड़ी थी। मेला संयोजक ज्ञानेंद्र विश्नोई बताते हैं कि कमेटी की स्थापना स्व. गुलाब चंद्र सेठ ने की थी। हटिया तब नगर के बड़े व्यापारियों और क्रांतिकारियों का गढ़ हुआ करता था।
विज्ञापन
होली खेलती लड़कियां
- फोटो : अमर उजाला
इन्हीं क्रांतिकारियों की प्रेरणा से कुछ युवकों ने 1942 में होली के दिन तिरंगा फहरा दिया। युवकों ने घोड़े पर सवार एक अंग्रेज के धमकाने पर उसकी पिटाई कर दी। इसकी गूंज अंग्रेज अफसरों तक पहुंची तो हटिया क्षेत्र को चारों ओर से घेर लिया गया। करीब दर्जन भर लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।
इसकी जबरदस्त विरोध हुआ। हटिया समेत आसपास के सभी बाजार बंद हो गए। विरोध देख गिरफ्तार क्रांतिकारियों को आखिर अनुराधा नक्षत्र के दिन रिहा कर दिया गया। इसी खुशी में हटिया समेत पूरे शहर में जमकर होली खेली गई। रंगों का ठेला निकाला गया। रंगे पुते लोग सरसैया घाट पहुंचे और गंगा स्नान किया। इसके बाद से यह परंपरा निरंतर चलती आ रही है।
इसकी जबरदस्त विरोध हुआ। हटिया समेत आसपास के सभी बाजार बंद हो गए। विरोध देख गिरफ्तार क्रांतिकारियों को आखिर अनुराधा नक्षत्र के दिन रिहा कर दिया गया। इसी खुशी में हटिया समेत पूरे शहर में जमकर होली खेली गई। रंगों का ठेला निकाला गया। रंगे पुते लोग सरसैया घाट पहुंचे और गंगा स्नान किया। इसके बाद से यह परंपरा निरंतर चलती आ रही है।