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गर्मी बना रही शक्की: स्ट्रेस बढ़ने की वजह से लोगों के दिमाग में केमिकल लोचा, अपनों पर ही भरोसा नहीं

Mon, 18 Apr 2022 01:13 PM IST
हिमांशु अवस्थी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर Published by: हिमांशु अवस्थी Updated Mon, 18 Apr 2022 01:13 PM IST
सार

भीषण गर्मी में स्ट्रेस बढ़ने से लोग शक्की हो रहे हैं, जिससे घरों में कलह पैदा हो रही है। यही नहीं, तपिश की वजह से देर से नींद आ रही है और सोने के घंटे भी कम हो गए हैं। 

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Heat wave in Kanpur, stress is increasing among people
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

कानपुर में भीषण गर्मी दिमाग में खलल पैदा कर रही है। तपिश से स्ट्रेस बढ़ने की वजह से लोग शक्की हो गए हैं। वे एक-दूसरे पर शक कर रहे हैं, जिससे कलह पैदा हो रही है। व्यक्ति का व्यवहार अचानक बदलने से परेशान परिजन उन्हें लेकर विशेषज्ञों के यहां आ रहे। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के सर्वे में भी यह तथ्य सामने आया है।

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विशेषज्ञों का कहना है कि 20 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान दिमाग के लिए सुखद होता है। इससे अधिक पर स्ट्रेस बढ़ता है, जिससे न्यूरो केमिकल प्रभावित होने लगते हैं और व्यक्ति का व्यवहार बदल जाता है। तापमान अधिक होने पर कुछ लोगों में आत्महत्या के विचार भी आ रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जब से तापमान 40 डिग्री सेल्सियस पार हुआ है, तब से नीचे नहीं आया है। गर्मी का स्तर एक सा बना हुआ है। इससे लोगों के जेहन पर दुष्प्रभाव दिखने लगा है। 

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Heat wave in Kanpur, stress is increasing among people
फाइल फोटो - फोटो : amar ujala

राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के पूर्व जिला समन्वयक डॉ. एसके निगम का कहना है कि पारा 30 डिग्री सेल्सियस से अधिक हो जाने पर मानव मस्तिष्क के तबीयत खुश करने वाले न्यूरो केमिकल घट जाते हैं। इससे तनाव बढ़ने लगता है। पहला प्रभाव व्यक्ति की नींद पर आता है। इसके बाद एंजाइटी, अवसाद समेत सभी रोगों की जटिलताएं बढ़ने लगती हैं। उनका कहना है कि लोगों की जांच करने पर ऐसे लक्षण मिल रहे हैं।

जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के मनोरोग विभागाध्यक्ष और इंडियन साइकेट्रिक सोसाइटी के सेंट्रल जोन प्रतिनिधि प्रोफेसर धनंजय चौधरी ने बताया कि गर्मियों में नींद की कमी प्रमुख लक्षण है। उससे डोपामीन न्यूरो केमिकल प्रभावित होता है। बाईपोलर डिसऑर्डर, सीजोफ्रेनिया, मेनिया, डिप्रेशन, एंजाइटी आदि के रोगियों पर प्रभाव आता है। उसका एक लक्षण हैल्युसिनेशन भी है। आवाजें सुनाई पड़ती हैं, सामने साया से दिखाई पड़ने लगता है। स्ट्रेस होने पर व्यक्ति अधिक शक्की हो जाता है। इस दौरान ओपीडी में इस तरह के रोगी बढ़ रहे हैं। अगर परिवार के लोग रोगी की स्थिति नहीं समझते तो कलह पैदा हो जाती है।

यह करें
- सोने के पहले हाथ-पैर धो लें, दिन में दो बार नहाएं
- निगेटिव विचार दिमाग में न लाएं, गुस्सा न करें
- अच्छी बातें सोचें, सादा सुपाच्य भोजन लें
- रोगी नियमित दवा लें, अपना चेकअप कराएं
- सुबह और शाम को काम करें, दोपहर में आराम कर लें
- पानी की मात्र बढ़ाएं, बाहर निकलें तो पानी पीते रहें


 
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केस : एक
हैलट आए किदवईनगर के 50  वर्षीय रोगी व्यापारी हैं। उनका कहना है कि गर्मी बढ़ने के बाद से गुस्सा अधिक आ रहा है। उलझन रहती है। दिमाग पर भारीपन सा रहता है। कुछ गड़बड़ी होती है तो नजदीकी लोगों पर शक जाता है। कोई अपना नहीं लगता। सब स्वार्थी लग रहे हैं। घर में रोज झगड़ा होता है। इससे तनावपूर्ण स्थिति हो गई है।

केस: दो
लालबंगला के 48 वर्षीय व्यक्ति पोस्ट कोविड रोगी हैं। कोरोना से ठीक होने के बाद उन्हें एंजाइटी बढ़ गई है। गर्मी बढ़ने के बाद से अनिद्रा के शिकार हैं। शक और आशंकाएं रहने लगी हैं। इससे खाना कम हो गया है। घबराते हैं और रोते रहते हैं। उनका इलाज एक निजी विशेषज्ञ के यहां चल रहा है।

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