तपती आंच में हठयोग, जानिए साधु संत क्याें करते हैं कल्पवास
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कंडों की आंच जलाकर भस्म शरीर पर
पौष की पूर्णिमा के स्नान के साथ कल्पवास होगा शुरू
फर्रुखाबाद के पंचाल घाट पर माघ महीने में लगने वाले मेला श्रीरामनगरिया में कल्पवास के लिए साधु संतों का आना शुरू हो गया है। पौष (पूस) महीने की पूर्णिमा के स्नान के साथ कल्पवास शुरू हो जाएगा। अन्य प्रदेशों से पहुंचने वाले लाखों श्रद्धालुअाें के लिये प्रशासन ने मेले की तैयारियां शुरू कर दी हैं। कल्पवासियों को अस्थाई राशनकार्ड और अस्थाई थाना बनाने की प्रक्रिया भी शुरू हो गई है। पंचाल घाट पर मेला श्रीरामनगरिया सैकड़ों वर्षों से लगता चला आ रहा है। इसमें साधु-सन्यासियों से लेकर गृहस्थ तक माघ महीने में भागीरथी के तट पर कल्पवास पर भगवान की आराधना करते हैं। पौष (पूस) की पूर्णिमा से माघ की पूर्णिमा तक कल्पवास चलता है। साधुओं ने कुटिया बनाना शुरु कर दिया है। राजस्थान के भीलपाड़ा के दानेश्वर धाम से आए नागा साधु बाबा रामदास ने बताया कि 1984 से यहां कल्पवास करने आ रहे हैं। मेले में साल दर साल आधुनिकता बढ़ने से आराधना में व्यवधान बढ़ता है। पहले करीब एक सैकड़ा झोपड़ियों में लोग मेला क्षेत्र में कल्पवास करते थे। तब माइक और साउंड का शोर नहीं होता था।
पहले से ही डेरा जमाएंगे नागा साधु
साधु संत पहले रोशनी के लिए कल्पवासी लालटेन का प्रयोग करते थे। कल्पवासियों की दिनचर्या केवल भगवत भजन ही थी अब लाइट की चकाचौंध, जगह- जगह पांडालों में लगे माइकों से निकलने वाला शोर पूजा करने में विघ्न पड़ता है। उन्होंने बताया कि अबकी बार नागा साधु अपने अखाडे़ को सजाने संवारने के लिए पहले से ही डेरा जमाएंगे। इस बार अन्य जिलों से 18 युवा नागा संन्यासी अखाडे़ में आकर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करेंगे। मेले के दौरान निकलने वाली शोभा यात्राओं में 56 तरह के हथियारों से करतब दिखाया जाएगा। पटाबाजी, बल्लम, फरसा, कांता, दोधारू, चौमुखी, चक्र, वननेती, धनुष बाण आदि से सुसज्जित साधु अपने हुनर का प्रदर्शन करेंगे। चौरासी परिक्रमा बद्रिका वन के कुंदन बाबा वर्ष 1999 से पांचालघाट पर कल्पवास करने के लिए आ रहे हैं। कुंदन बाबा बताते हैं कि, मेले की सूरत में अब काफी बदलाव आया है। आधुनित मेले में कल्पवासियों को किसी तरह की कोई तकलीफ नहीं होती है। छोटी आयु से ही संन्यास धारण कर अपना घर बार त्याग कर भगवान के चरणों में रमे हुए हैं।