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कड़ाके की ठंड, हैलट का आधा आईसीयू बंद
ब्यूरो, अमर उजाला कानपुर
Updated Sun, 21 Dec 2014 02:43 AM IST
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सर्दी में मरीजों की संख्या बढ़ने के बावजूद हैलट के 56 बेड के आईसीयू में सिर्फ 32 बेड पर ही मरीजों का इलाज हो पा रहा है। शेष 24 बेड खराब पड़े हैं।
वेंटीलेटर भी 13 में से 7 खराब हैं। इनमें से कई तो आईसीयू वार्ड शुरू होने के साथ ही खराब बताए जा रहे हैं। इसके पीछे मंशा चाहे जो हो, लेकिन तर्क दिया जाता है कि पर्याप्त स्टाफ नहीं है।
करोड़ों रुपये खर्च कर बनाए गए आईसीयू वार्ड की उपयोगिता पर अब सवाल भी उठने लगे हैं। कांग्रेस सांसद के फंड पर मायावती सरकार में शुरू हुए इस वार्ड को सपा सरकार के कार्यकाल में तत्काल ‘ऑक्सीजन’ न मिला तो मरीजों को ऑक्सीजन मिलने में दिक्कत हो जाएगी।
मालूम हो कि हैलट आईसीयू में इलाज फ्री होता है तो बाहर इस पर रोजाना पांच से दस हजार रुपये का खर्च आता है। वेंटीलेटर का खर्च प्राइवेट में रोजाना तकरीबन 25 हजार रुपये तक पहुंच जाता है।
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एक बेड पर एक नर्स होनी चाहिए
आईसीयू के एक बेड पर भर्ती मरीज के लिए हर शिफ्ट एक नर्स होनी चाहिए। यानी 24 घंटे में तीन नर्स होनी अनिवार्य है। इसमें भी एक नर्स रिलीवर के रूप में होनी चाहिए।
ताकि किसी नर्स की अनुपस्थिति में रिलीवर उसकी जगह काम संभाल ले। हैलट आईसीयू वार्ड के 56 बेड में से संचालित 32 बेड पर भर्ती मरीजों के केयर के लिए तकरीबन 15 नर्स तैनात हैं।
यानी एक शिफ्ट में सिर्फ पांच नर्स। मानकों के हिसाब से सिर्फ इन 32 बेड के लिए ही 128 नर्स की तैनाती होनी चाहिए। 56 बेड पर 224 नर्स की आवश्यकता है।
प्राइवेट में बहुत महंगा है आईसीयू
हैलट में जहां आईसीयू बेड का कोई चार्ज नहीं है वहीं बाहर अस्पताल के हिसाब से आईसीयू बेड का चार्ज पांच हजार से दस हजार और वेंटीलेटर का चार्ज प्रतिदिन 25 हजार रुपये तक है। दवाओं का खर्च अलग से है।
हांफ रहे हैं वेंटीलेटर
मेडिकल कॉलेज में 13 वेंटीलेटर हैं, लेकिन इनमें से सात खराब है। बाकी बचे छह वेंटीलेटर काम तो कर रहे हैं लेकिन पैरामेडिकल स्टाफ की कमी से इनकी सार्थकता पूरी नहीं हो पा रही है।
मेडिसिन विभाग के आईसीयू में चार वेंटीलेटर हैं। दो मेडिसिन के और दो पीडियाट्रिक्स के। साल भर से ज्यादा समय से इंफ्यूजन पंप, डीफेबुलेटर मशीन, पल्स ऑक्सीमीटर खराब पड़े हैं।
मॉनीटर पर मरीज की स्थिति देखकर डॉक्टर इलाज की दिशा तय करते हैं लेकिन जब मॉनीटर ही खराब है तो इलाज की दिशा कैसे तय होगी।
आईसीयू में काम करने वाले डॉक्टर्स को मरीज की स्थिति देखकर इलाज करना पड़ता है। ज्यादातर का इलाज ठीक होता है, लेकिन कभी-कभी समस्या खड़ी हो जाती है।
बाईपेप को छोटा वेंटीलेटर कहते हैं। मेडिसिन विभाग में दो बाईपेप हैं लेकिन यह काफी समय से खराब पड़े हुए हैं।
आईसीयू में चल रही वेटिंग
पूरी क्षमता से आईसीयू न चल पाने से मरीजों को वेटिंग में रहना पड़ रहा है। बाहर आईसीयू का खर्च महंगा होने से हैलट के आईसीयू में मरीजों को रखने के लिए राजनैतिक दबाव भी जबरदस्त है।
ठंड के कारण हार्ट अटैक और ब्रेन स्ट्रोक के मरीजों के अचानक बढ़ जाने से आईसीयू में इस समय 25 से ज्यादा की वेटिंग चल रही है। कई मरीजों का ऑपरेशन इस वजह से नहीं हो पा रहा है क्योंकि वेंटीलेटर खाली नहीं हैं।
यदि इन मरीजों के तीमारदार जल्द से जल्द ऑपरेशन का दबाव बनाते हैं तो उन्हें तत्काल हायर सेंटर रेफर कर दिया जाता है।
2009 में हुआ था लोकार्पण
29 जुलाई 09 को प्रदेश सरकार के तत्कालीन चिकित्सा शिक्षा मंत्री लालजी वर्मा ने हैलट में 56 बेड के आईसीयू का लोकार्पण किया था।
उस समय मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. आनंद स्वरूप और एसआईसी डॉ. वीएन त्रिपाठी थी। लोकार्पण के तकरीबन एक साल बाद आईसीयू में मरीजों को भर्ती किया जाना शुरू हो पाया।
आईसीयू तो शुरू हो गया, लेकिन यहां पैरामेडिकल स्टाफ की तैनाती नहीं की गई। राजनैतिक दबाव से शुरू आईसीयू में हैलट की नर्सों को डायवर्ट कर तैनात किया गया।
तब जल्द ही पैरामेडिकल स्टाफ की अलग से तैनाती की बात कही गई थी लेकिन अब तक ऐसा नहीं हो पाया।
मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल प्रो. नवनीत कुमार से दो टूक.....
क्षमता से ज्यादा हो रहा काम : प्रिंसिपल
सवालः आरोप है कि आईसीयू पूरी क्षमता से न चलाने के पीछे प्राइवेट वालों को लाभ पहुंचाना वजह है?
जवाबः यह जो भी कह रहा है पूरी तरह गलत है। चार साल पहले जब आईसीयू शुरू हुआ तब भी उतने ही बेड पर काम हो रहा था जितना अब हो रहा है। हमारे डॉक्टर्स और पैरामेडिकल स्टाफ क्षमता से ज्यादा काम कर रहे हैं।
यदि ऐसा नहीं होता तो 32 बेड भी नहीं चल पाते। जो भी मरीज हमारे यहां आता है वह निराश होकर नहीं जाता है।
सवालः फिर व्यवस्था क्यों नहीं सुधर रही है?
जवाबः आईसीयू के उच्चीकरण के लिए नौ करोड़ रुपये का बजट मिल चुका है। वेंटीलेटर्स ठीक होंगे और कुछ वेंटीलेटर्स बढ़ाए जाएंगे। एक महीने में सुधार दिखने लगेगा।
सवालः नर्सिंग स्टाफ के लिए रोटरी, लायंस आदि से भी तो मदद ली जा सकती है?
जवाबः रोटरी इंडस्ट्री, रोटरी वेस्ट ने कैंपस में रैन बसेरे बनवाए हैं। नर्सिंग स्टाफ के लिए भी इनसे मदद लेने की बात चल रही है। बात भी हुई है। कमिश्नर से नर्सिंग स्टाफ की कमी की जानकारी मांगी थी।
300 नर्सिंग स्टाफ की रिक्वायरमेंट भेजी है। नर्सिंग स्टाफ मिल जाए तो आईसीयू को पूरी क्षमता से चलाने में कोई समस्या ही नहीं आएगी।
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वेंटीलेटर भी 13 में से 7 खराब हैं। इनमें से कई तो आईसीयू वार्ड शुरू होने के साथ ही खराब बताए जा रहे हैं। इसके पीछे मंशा चाहे जो हो, लेकिन तर्क दिया जाता है कि पर्याप्त स्टाफ नहीं है।
करोड़ों रुपये खर्च कर बनाए गए आईसीयू वार्ड की उपयोगिता पर अब सवाल भी उठने लगे हैं। कांग्रेस सांसद के फंड पर मायावती सरकार में शुरू हुए इस वार्ड को सपा सरकार के कार्यकाल में तत्काल ‘ऑक्सीजन’ न मिला तो मरीजों को ऑक्सीजन मिलने में दिक्कत हो जाएगी।
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मालूम हो कि हैलट आईसीयू में इलाज फ्री होता है तो बाहर इस पर रोजाना पांच से दस हजार रुपये का खर्च आता है। वेंटीलेटर का खर्च प्राइवेट में रोजाना तकरीबन 25 हजार रुपये तक पहुंच जाता है।
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एक बेड पर एक नर्स होनी चाहिए
आईसीयू के एक बेड पर भर्ती मरीज के लिए हर शिफ्ट एक नर्स होनी चाहिए। यानी 24 घंटे में तीन नर्स होनी अनिवार्य है। इसमें भी एक नर्स रिलीवर के रूप में होनी चाहिए।
ताकि किसी नर्स की अनुपस्थिति में रिलीवर उसकी जगह काम संभाल ले। हैलट आईसीयू वार्ड के 56 बेड में से संचालित 32 बेड पर भर्ती मरीजों के केयर के लिए तकरीबन 15 नर्स तैनात हैं।
यानी एक शिफ्ट में सिर्फ पांच नर्स। मानकों के हिसाब से सिर्फ इन 32 बेड के लिए ही 128 नर्स की तैनाती होनी चाहिए। 56 बेड पर 224 नर्स की आवश्यकता है।
प्राइवेट में बहुत महंगा है आईसीयू
हैलट में जहां आईसीयू बेड का कोई चार्ज नहीं है वहीं बाहर अस्पताल के हिसाब से आईसीयू बेड का चार्ज पांच हजार से दस हजार और वेंटीलेटर का चार्ज प्रतिदिन 25 हजार रुपये तक है। दवाओं का खर्च अलग से है।
हांफ रहे हैं वेंटीलेटर
मेडिकल कॉलेज में 13 वेंटीलेटर हैं, लेकिन इनमें से सात खराब है। बाकी बचे छह वेंटीलेटर काम तो कर रहे हैं लेकिन पैरामेडिकल स्टाफ की कमी से इनकी सार्थकता पूरी नहीं हो पा रही है।
मेडिसिन विभाग के आईसीयू में चार वेंटीलेटर हैं। दो मेडिसिन के और दो पीडियाट्रिक्स के। साल भर से ज्यादा समय से इंफ्यूजन पंप, डीफेबुलेटर मशीन, पल्स ऑक्सीमीटर खराब पड़े हैं।
मॉनीटर पर मरीज की स्थिति देखकर डॉक्टर इलाज की दिशा तय करते हैं लेकिन जब मॉनीटर ही खराब है तो इलाज की दिशा कैसे तय होगी।
आईसीयू में काम करने वाले डॉक्टर्स को मरीज की स्थिति देखकर इलाज करना पड़ता है। ज्यादातर का इलाज ठीक होता है, लेकिन कभी-कभी समस्या खड़ी हो जाती है।
बाईपेप को छोटा वेंटीलेटर कहते हैं। मेडिसिन विभाग में दो बाईपेप हैं लेकिन यह काफी समय से खराब पड़े हुए हैं।
आईसीयू में चल रही वेटिंग
पूरी क्षमता से आईसीयू न चल पाने से मरीजों को वेटिंग में रहना पड़ रहा है। बाहर आईसीयू का खर्च महंगा होने से हैलट के आईसीयू में मरीजों को रखने के लिए राजनैतिक दबाव भी जबरदस्त है।
ठंड के कारण हार्ट अटैक और ब्रेन स्ट्रोक के मरीजों के अचानक बढ़ जाने से आईसीयू में इस समय 25 से ज्यादा की वेटिंग चल रही है। कई मरीजों का ऑपरेशन इस वजह से नहीं हो पा रहा है क्योंकि वेंटीलेटर खाली नहीं हैं।
यदि इन मरीजों के तीमारदार जल्द से जल्द ऑपरेशन का दबाव बनाते हैं तो उन्हें तत्काल हायर सेंटर रेफर कर दिया जाता है।
2009 में हुआ था लोकार्पण
29 जुलाई 09 को प्रदेश सरकार के तत्कालीन चिकित्सा शिक्षा मंत्री लालजी वर्मा ने हैलट में 56 बेड के आईसीयू का लोकार्पण किया था।
उस समय मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. आनंद स्वरूप और एसआईसी डॉ. वीएन त्रिपाठी थी। लोकार्पण के तकरीबन एक साल बाद आईसीयू में मरीजों को भर्ती किया जाना शुरू हो पाया।
आईसीयू तो शुरू हो गया, लेकिन यहां पैरामेडिकल स्टाफ की तैनाती नहीं की गई। राजनैतिक दबाव से शुरू आईसीयू में हैलट की नर्सों को डायवर्ट कर तैनात किया गया।
तब जल्द ही पैरामेडिकल स्टाफ की अलग से तैनाती की बात कही गई थी लेकिन अब तक ऐसा नहीं हो पाया।
मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल प्रो. नवनीत कुमार से दो टूक.....
क्षमता से ज्यादा हो रहा काम : प्रिंसिपल
सवालः आरोप है कि आईसीयू पूरी क्षमता से न चलाने के पीछे प्राइवेट वालों को लाभ पहुंचाना वजह है?
जवाबः यह जो भी कह रहा है पूरी तरह गलत है। चार साल पहले जब आईसीयू शुरू हुआ तब भी उतने ही बेड पर काम हो रहा था जितना अब हो रहा है। हमारे डॉक्टर्स और पैरामेडिकल स्टाफ क्षमता से ज्यादा काम कर रहे हैं।
यदि ऐसा नहीं होता तो 32 बेड भी नहीं चल पाते। जो भी मरीज हमारे यहां आता है वह निराश होकर नहीं जाता है।
सवालः फिर व्यवस्था क्यों नहीं सुधर रही है?
जवाबः आईसीयू के उच्चीकरण के लिए नौ करोड़ रुपये का बजट मिल चुका है। वेंटीलेटर्स ठीक होंगे और कुछ वेंटीलेटर्स बढ़ाए जाएंगे। एक महीने में सुधार दिखने लगेगा।
सवालः नर्सिंग स्टाफ के लिए रोटरी, लायंस आदि से भी तो मदद ली जा सकती है?
जवाबः रोटरी इंडस्ट्री, रोटरी वेस्ट ने कैंपस में रैन बसेरे बनवाए हैं। नर्सिंग स्टाफ के लिए भी इनसे मदद लेने की बात चल रही है। बात भी हुई है। कमिश्नर से नर्सिंग स्टाफ की कमी की जानकारी मांगी थी।
300 नर्सिंग स्टाफ की रिक्वायरमेंट भेजी है। नर्सिंग स्टाफ मिल जाए तो आईसीयू को पूरी क्षमता से चलाने में कोई समस्या ही नहीं आएगी।