Kanpur: जनरलगंज सबसे बड़ा कपड़ा बाजार, धागों से बुना है व्यापारियों का प्यार, 5000 करोड़ का सालाना कारोबार
अंग्रेजों के शासनकाल में अधिकांश कपड़ा इंग्लैंड से आयात होकर जनरलगंज कपड़ा मंडी में आता था अब देश और विदेश के बड़े ब्रांडों के कपड़ों के साथ स्थानीय इकाइयों के उत्पाद मिलते हैं। कानपुर में तैनात अंग्रेज जनरल जिनैल के पदनाम पर इसका नाम जनरलगंज रखा गया था।
विस्तार
कानपुर का थोक और सबसे बड़ा कपड़े का बाजार जनरलगंज बाजार का जितना इतिहास गौरवशाली है उतना ही इसका वर्तमान। 100 साल पुराने इस बाजार में तीन हजार से ज्यादा दुकानें और फर्में हैं। एक लाख लोगों का भरण पोषण करने वाले इस बाजार में एक समय सिर्फ 11 से 12 दुकानें ही हुआ करती थीं।
अंग्रेजों के शासनकाल में अधिकांश कपड़ा इंग्लैंड से आयात होकर जनरलगंज कपड़ा मंडी में आता था अब देश और विदेश के बड़े ब्रांडों के कपड़ों के साथ स्थानीय इकाइयों के उत्पाद मिलते हैं। यह बाजार इसलिए खास है क्योंकि बाजार का संचालन करने वाली कमेटी दीवानी न्यायालय की तरह विवादित मामलों की सुनवाई करती है। कमेटी के मध्यस्थता बोर्ड का निर्णय सभी व्यापारी मानते हैं।
बाजार बढ़ने के साथ यहां पर व्यावसायिक विवाद, मुकदमे बढ़ने लगे थे जो न्यायालय जाने लगे थे। इन सबके बीच कानपुर कपड़ा कमेटी की नींव पड़ी। 1925 में इस कमेटी का भारतीय कंपनीज एक्ट में पंजीकरण कराया गया। हालांकि कमेटी की स्थापना 1916 में की गई थी।
जनरल जिनैल के पदनाम पर पड़ा जनरलगंज
कानपुर में तैनात अंग्रेज जनरल जिनैल के पदनाम पर इसका नाम जनरलगंज रखा गया था। तब शहर में स्थापित कानपुर काटन मिल, विक्टोरिया मिल, जेके काटन एंड स्पिनिंग मिल, लक्ष्मीरतन काटन मिल, स्वदेशी काटन मिल, म्योर मिल, कानपुर टेक्सटाइल और एल्गिन मिलों के कपड़े जनरलगंज बाजार के व्यापारी थोक में खरीदकर बेचते थे। इसी कारण यहां पर देश के तमाम राज्यों के कारोबारी आते थे। इन्हीं मिलों और कपड़ा कारोबार के कारण कानपुर को पूरब का मैनचेस्टर कहा जाने लगा था।
रेशम वाली गली, बजाजा भी है बड़ा बाजार
जनरलगंज के आसपास ही रेशम वाली गली, नौघड़ा, बजाजा भी है। इन बाजारों का भी अपना अलग-अलग इतिहास है। रेशम वाली गली के बारे में कहा जाता है कि रेशम के वस्त्र मिलते थे। जबकि बजाजा कपड़ों का फुटकर बाजार आज भी है। नौघड़ा भी कपड़ों का बड़ा बाजार है। कहा जाता है कि यहां पर नौ घड़े एक साथ पर एक जगह पर मिले थे। इसके चलते ही इसका नाम नौघड़ा पड़ गया।
1975 में दुकान खोली थी। तब केवल कॉटन ही बिकता था। शहर में 10 मिलें चलती थीं। यहां से पूरे देश के अलावा विदेशों तक कपड़ा बाजार के जरिए माल जाता था। कॉटन उत्पाद बेचने के लिए लाइसेंस लेना पड़ता था। बिना लाइसेंस इसकी बिक्री नहीं कर सकते थे। बाजार ऐतिहासिक और समृद्घ है। - चरनजीत सिंह सागरी, पूर्व अध्यक्ष, कानपुर कपड़ा कमेटी
नवरात्र से लेकर दिवाली और उसके बाद तक बाजार में ग्राहकों की रौनक रहती है। दिवाली के दिन कमेटी के पदाधिकारी कमेटी कार्यालय में पूजन करते हैं। यह परंपरा दशकों पुरानी है। बाजार समय के साथ आगे बढ़ रहा है। कई पीढ़िया इस कारोबार में लगी हैं। - अमित दोसर, उपाध्यक्ष, कानपुर कपड़ा कमेटी
आंकड़ों में जनरलगंज बाजार
- 100 साल पुराने बाजार में अंग्रेजों के शासनकाल में कपड़ा इंग्लैंड से आयात होकर जनरलगंज आता था
- 01 लाख से ज्यादा लोगों को रोजगार यह बाजार दे रहा है
- 11 से 12 दुकानें और फर्म हुआ करती थी शुरुआत में, अब 3000 के करीब
- 5000 करोड़ से ज्यादा का है सालाना कारोबार