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अरशद मंसूरी ने लिया 'शरीर दान करने का फैसला' तो जारी हो गया ये फतवा
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर
Updated Sat, 10 Mar 2018 08:42 AM IST
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मुफ्ती हनीफ बरकाती, डॉ. अरशद मंसूरी
- फोटो : अमर उजाला
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यूपी के कानपुर में रामा डेंटल कॉलेज के महाप्रबंधक डॉ. अरशद मंसूरी ने मेडिकल छात्र-छात्राओं को शोध के लिए अपना शरीर दान कर दिया है। इसको लेकर मुस्लिम समाज ने कड़ी आपत्ति जताई है। फतवे में मुफ्ती ने देहदान करने को हराम और गुनाह बताया है। पिछले सप्ताह ही इस मामले पर फतवा जारी किया गया है।
अरशद मंसूरी ने 2006 में जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज को अपना शरीर दान करने की घोषणा की थी। इसके बाद लोगों ने इस पर आपत्ति जताई और इसे गलत बताया। इस संबंध में मोहम्मद हनीफ नाम के एक शख्स ने नई सड़क स्थित मदरसा एहसानुल मदारिस के दारुल इफ्ता (फतवा विभाग) से फतवा मांगा था।
इस पर मुफ्ती हनीफ बरकाती ने इसे हराम बताया है। मुफ्ती हनीफ बरकाती ने बताया कि इंसान अपने शरीर और रूह का मालिक नहीं है। यह अल्लाह की दी अमानत है। इस्लाम में किसी की मौत के बाद जनाजा (शव) को सामने रखकर नमाज अदा की जाती है, उसे कांधों पर रखकर कब्रिस्तान ले जाते हैं और सुपुर्द-ए-खाक करते हैं। कब्र पर पैर पड़ जाना तक गुनाह है तो मरने के बाद चीरने फाड़ने के लिए शरीर को दान नहीं दिया जा सकता है। वह या कोई भी मुफ्ती हों, देहदान के समर्थन में फतवा नहीं दे सकते हैं। जिस तरह खुदकुशी करना हराम है, उसी तरह मरने के बाद अपने शरीर का दान करना भी हराम है।
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दूसरी ओर भारत के पहले मुस्लिम देहदानी होने का दावा करने वाले कल्यानपुर निवासी डॉ. अरशद मंसूरी ने कहा कि वह फतवे से दुखी हैं। विरोध करने वालों से अपील करता हूं कि वह इस अच्छे काम में सहयोग करें। समाज की युवा पीढ़ी रूढ़िवादी विचारों से बाहर निकले और समाजहित में अच्छा काम करें। उन्होंने कहा कि देहदान करना कानूनी तौर पर वैध है। भारतीय होने के नाते ऐसा करना उनके लिए गौरव की बात है। वह खुद को पहले भारतीय मानते हैं, बाद में मुसलमान।
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अरशद मंसूरी ने 2006 में जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज को अपना शरीर दान करने की घोषणा की थी। इसके बाद लोगों ने इस पर आपत्ति जताई और इसे गलत बताया। इस संबंध में मोहम्मद हनीफ नाम के एक शख्स ने नई सड़क स्थित मदरसा एहसानुल मदारिस के दारुल इफ्ता (फतवा विभाग) से फतवा मांगा था।
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इस पर मुफ्ती हनीफ बरकाती ने इसे हराम बताया है। मुफ्ती हनीफ बरकाती ने बताया कि इंसान अपने शरीर और रूह का मालिक नहीं है। यह अल्लाह की दी अमानत है। इस्लाम में किसी की मौत के बाद जनाजा (शव) को सामने रखकर नमाज अदा की जाती है, उसे कांधों पर रखकर कब्रिस्तान ले जाते हैं और सुपुर्द-ए-खाक करते हैं। कब्र पर पैर पड़ जाना तक गुनाह है तो मरने के बाद चीरने फाड़ने के लिए शरीर को दान नहीं दिया जा सकता है। वह या कोई भी मुफ्ती हों, देहदान के समर्थन में फतवा नहीं दे सकते हैं। जिस तरह खुदकुशी करना हराम है, उसी तरह मरने के बाद अपने शरीर का दान करना भी हराम है।
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दूसरी ओर भारत के पहले मुस्लिम देहदानी होने का दावा करने वाले कल्यानपुर निवासी डॉ. अरशद मंसूरी ने कहा कि वह फतवे से दुखी हैं। विरोध करने वालों से अपील करता हूं कि वह इस अच्छे काम में सहयोग करें। समाज की युवा पीढ़ी रूढ़िवादी विचारों से बाहर निकले और समाजहित में अच्छा काम करें। उन्होंने कहा कि देहदान करना कानूनी तौर पर वैध है। भारतीय होने के नाते ऐसा करना उनके लिए गौरव की बात है। वह खुद को पहले भारतीय मानते हैं, बाद में मुसलमान।