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जानें बुंदेलखंड में कैसे हो रहा ‘गजराज’ का सफाया
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर
Updated Fri, 23 Dec 2016 11:05 AM IST
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बुंदेलखंड में कम हो रही हाथियों की संख्या
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पहाड़, जंगल और चटियल मैदान वाले बुंदेलखंड में हाथियों का सफाया होता जा रहा है। हाथियों के लिए यहां की जमीन अब सुलभ नहीं है। यही कारण है कि यहां से या तो हाथी दूसरी जगहों के घने जंगलों में पहुंच रहे हैं या तो मरते जा रहे हैं। पहाड़, जंगल और चटियल मैदान वाले बुंदेलखंड में अन्य पशु-पक्षियों के साथ ऊंट भी कम हो रहे हैं। पिछले एक दशक में इनकी संख्या में बड़ी कमी आई है। मौजूदा समय में बुंदेलखंड में ऊंटों की संख्या सिर्फ 74 है। चित्रकूट और हमीरपुर में पूरी तरह से हाथियों का सफाया हो गया है। महोबा में गिने-चुने बचे हैं। जालौन में ऊंट विलुप्त हो चुके हैं।
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जालौन में एक भी ऊंट नहीं
बुदेंलखंड में ऊंट
हर 10 सालों में यहां पशुओं की गणना होती है। अब तक 19 पशु गणनाएं हो चुकी हैं। 19वीं पशु गणना वर्ष 2012 में हुई थी। इसके आंकड़ों की अधिकृत सूचना जनसूचना अधिकार अधिनियम के तहत पशु पालन विभाग ने लगभग चार वर्षों बाद दी है। आरटीआई कार्यकर्ता कुलदीप शुक्ला को मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डॉ.लाखन सिंह ने पशुओं के आंकड़े उपलब्ध कराए हैं। सूचना के मुताबिक बुंदेलखंड में 44 हाथी हैं। इसमें 37 नर और 7 मादा हैं। बांदा में सर्वाधिक 28 हाथी हैं। इनमें 21 नर और 7 मादा हैं। महोबा में 3 और जालौन में 13 हाथी हैं। चित्रकूट तथा हमीरपुर में हाथियों की संख्या शून्य बताई गई है। इसी तरह ऊंटों की कुल संख्या 74 है। सबसे ज्यादा 60 ऊंट बांदा में हैं। चित्रकूट में 7, महोबा में 5 और हमीरपुर में 2 ऊंट हैं। जालौन में एक भी ऊंट नहीं है।
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56 हजार साल पहले यहां रहते थे एलीफस
बुंदेलखंड में कम हो रही हाथियों की संख्या
जहां आज बीहड़ हैं, वहां कभी एलीफस नेमेडिक हाथी का आशियाना होता था। अब ये हाथी दुनिया से विलुप्त हो गए हैं। बुंदेलखंड के हमीरपुर और जालौन में इन हाथियों के अवशेष मिले हैं। 56 हजार साल पहले यहां एलीफस के रहने की पहली बार पुष्टि हुई है। इन्हीं हाथियों के अवशेष उत्तराखंड की शिवालिक पहाड़ियों में भी पाए गए हैं। बुंदेलखंड के कालपी (जालौन) और हमीरपुर जिले में वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान के विज्ञानियों की टीम को एलीफस नेमेडिकस हाथी के जबड़े, सिर की टूटी हड्डियां और पिछले दांत मिले हैं। जांच में इसकी पुष्टि होने के बाद कार्बन डेटिंग कराई गई तो ये जीवाश्म 56 हजार साल पुराने निकले। इससे यह तय हो गया कि जब ये हाथी यहां विचरण करते थे तो इन इलाकों में बीहड़ नहीं थे। विज्ञानियों का अंदाजा है कि यहां बीहड़ 50 हजार साल पुराने हैं। एलीफस हाथी बीहड़ बनने से पहले यहां रहते थे।
हाथियों के खत्म होने के बाद बने बीहड़
बुंदेलखंड में कम हो रही हाथियों की संख्या
इन हाथियों के खत्म होने के बाद बीहड़ बनने का सिलसिला शुरू हुआ। एलीफस नेमेडिकस हाथी अब उत्तराखंड के शिवालिक में भी रहते रहे हैं। यहां पिंजौर एरिया की चट्टानों पर एलीफस हाथियों के जीवाश्म मिले हैं। यह माना जा रहा है कि एलीफस हाथियों का विचरण यूपी और उत्तराखंड का गंगा बेसिन रहा है। वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान के वरिष्ठ विज्ञानी डॉ. प्रदीप श्रीवास्तव के अनुसार हमीरपुर, कालपी (जालौन) में एलीफस नेमेडिकस हाथी के अवशेष मिले हैं। हाथियों की यह प्रजाति विलुप्त हो गई है। जीवाश्मों से पहली बार इस क्षेत्र में इस प्रजाति की पहचान हुई है।