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1436 सालों से मनाई जा रही है ईद
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, कानपुर
Updated Mon, 26 Jun 2017 04:46 PM IST
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कानपुर में मनाई जा रही ईद
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माना जाता है कि ईद का त्योहार 1436 सालों से मनाया जा रहा है। इसकी शुरुआत सऊदी अरब के मदीना शहर से सन दो हिजरी में हुई थी। रमजान के महीने में अल्लाहताला को राजी करने के लिए दिन रात भूखे प्यासे रहकर की गई रोजे की इबादत, कुरान की तिलावत, नमाज और जकात फितरा समेत नेक काम करने की इबादत से खुश होकर अल्लाहताला की तरफ से खुशी का दिन तय किया गया,जिसे ईद कहते हैं।
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रमजान में की गई इबादत का इनाम है ईद
कानपुर में ईद
खुदा के हुक्म से मुसलमान पूरे महीने रोजा रखते हैं और अल्लाहताला को राजी करते हैं। अपने गुनाहों की माफी मांगते हैं। गरीबों, बेवाओं, यतीमों के साथ हमदर्दी कर जकात फितरा, सदका देकर उनकी मदद करते हैं। रमजान के महीने में कमाई गई नेकियों के बदले ईद के दिन अल्लाहताला उन्हें इनाम से नवाजता है। यह इनाम ईद की खुशी की शक्ल में है। शव्वाल का चांद देखकर मनाई जाने वाली ईद की रात को हदीस में ‘इनाम की रात’ कहा गया है। इसलिए इस रात को भी शब-ए-कद्र की तरह इबादत करने का हुक्म है।
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ईद के पहले यह त्योहार मनाते थे मुसलमान
ईद
ईद के पहले सऊदी अरब में ‘नीरोज’ और ‘महरजान’ नाम से दो त्योहार मनाए जाते थे। पैगंबर-ए-इस्लाम ने अपनी उम्मत को बताया कि तुम दो त्योहार मनाया करो। पहला ईद-उल-फित्र (ईद) और दूसरा ईद-उल-अजहा (बकरीद)। इसके बाद सन दो हिजरी से ईद का त्योहार मनाया जाने लगा। ईद के दिन पड़ोसी, मेहमानों, रिश्तेदारों और दोस्तों का खास ध्यान देना चाहिए। एक दूसरों को हदिया और तोहफों का लेन-देन करना चाहिए। अगर साल भर किसी से लड़ाई या मनमुटाव रहा हो तो ईद के दिन गले मिलकर सभी गिले शिकवे दूर करने चाहिए।