फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Kanpur News ›   corona, lockdown

दादानगर औद्योगिक क्षेत्र की रौनक लौटने में लगेगा वक्त

Sat, 09 May 2020 11:03 PM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Sat, 09 May 2020 11:03 PM IST
विज्ञापन
corona, lockdown
कोरोना संकट के चलते बीते 46 दिनों से बंद औद्योगिक क्षेत्र दादानगर में बहुत कुछ बदल गया है। यहां की फैक्ट्रियां, सड़कें, गलियां और पार्क रौनक लौटने की बाट जोह रहे हैं। लॉकडाउन से पहले दोपहर के एक बजते ही फैक्ट्रियों में काम करने वालों का हुजूम भोजन करने के लिए सड़कों और आसपास के पार्कों में दिखने लगता था। यहां ठेलियों व छोटे-छोटे ढाबों पर ऐसी भीड़ उमड़ती थी कि मेला फीका पड़ जाता था। लेकिन शनिवार को दोपहर एक से दो बजे के बीच दादानगर की सड़कों पर पहले जैसा कुछ भी नहीं दिखा। सड़कें और फुटपाथ खाली तथा दुकानें, ढाबे बंद थे।
विज्ञापन

हालांकि पांच दिन पहले प्रशासन ने फैक्ट्रियों को चलाने की अनुमति दे दी है, लेकिन महज 20 फीसदी फैक्ट्रियों में ही उत्पान शुरू हो सका है। इनमें भी औसत 25 फीसदी कर्मचारी ही वापस लौटे हैं। यह संख्या दादानगर औद्योगिक क्षेत्र के रुतबे के सामने कुछ भी नहीं है। वैसे, 25 फीसदी फैक्ट्रियां अगले दो-चार दिन में और चलने लगेंगी। फैक्ट्रियों के बाहर चहलकदमी तो जरूर शुरू हो गई है, लेकिन रौनक नहीं है।
विज्ञापन

इस औद्योगिक क्षेत्र में छोटी-बड़ी कुल 2500 औद्योगिक इकाइयां हैं। इनमें एक लाख से अधिक कर्मचारी और श्रमिक प्रत्यक्ष रूप से काम करते हैं। इतने ही लोग फैक्ट्रियों में काम करने वालों की बदौलत तरह-तरह की दुकानों में अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार पाते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन

दादानगर स्थित कानपुर इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कोऑपरेटिव सोसाइटी के अध्यक्ष विजय कपूर बताते हैं कि हालात पहले जैसे होने में एक वर्ष से अधिक समय लग जाएगा। लॉकडाउन में उद्यमी टूट गया है। किसी के पास बिजली बिल जमा करने के लिए पूंजी नहीं है तो कोई कर्मचारी व मजदूूरों को वेतन देने की हालत में नहीं। उत्पादन शुरू करने के लिए मंजूरी मिल गई है लेकिन संसाधनों की कमी में ऐसा संभव नहीं हो पा रहा है। उन्होंने समझाया कि यदि किसी फैक्ट्री में अलग-अलग तरह की मशीनों पर 10 मजदूर काम करते थे और उनमें से दो मजदूर अपने घर चले गए तो उनके स्थान पर कोई अन्य व्यक्ति उन मशीनों को चलाने में सक्षम नहीं है। ऐसे में आठ मजदूर अपने हिस्से का काम कर भी देंगे तो उत्पादन की प्रक्रिया पूरी नहीं होगी। माल अधूरा ही बना रहेगा। इसी तरह किसी के पास ऑर्डर नहीं है तो किसी के पास कच्चा माल खरीदने के लिए पैसे की कमी है। बताया कि उनकी साइकिल के पार्ट्स बनाने वाली फैक्ट्री में अभी काम शुरू नहीं हो सका है।

इसी तरह प्राविंशियल इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के उपाध्यक्ष सुमित चावला अपनी पीड़ा बताते हैं। वे कहते हैं कि उनका कच्चा माल दूसरे राज्यों से आता है। अब बाहर के विक्रेता एडवांस पैसा जमा करने पर ही माल भेजने की बात कह रहे हैं। ऐसे में इतना पैसा कहां कि एडवांस देकर कच्चा माल मंगाए। फिर उसे बनाएं और बिकने का इंतजार करें। कहा कि पैसे का फ्लो तभी बनेगा जब उद्योग और व्यापार पूरी तरह खुलेंगे। इससे पहले फैक्ट्री में उत्पादन करना नुकसानदायक है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed