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दादानगर औद्योगिक क्षेत्र की रौनक लौटने में लगेगा वक्त
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कोरोना संकट के चलते बीते 46 दिनों से बंद औद्योगिक क्षेत्र दादानगर में बहुत कुछ बदल गया है। यहां की फैक्ट्रियां, सड़कें, गलियां और पार्क रौनक लौटने की बाट जोह रहे हैं। लॉकडाउन से पहले दोपहर के एक बजते ही फैक्ट्रियों में काम करने वालों का हुजूम भोजन करने के लिए सड़कों और आसपास के पार्कों में दिखने लगता था। यहां ठेलियों व छोटे-छोटे ढाबों पर ऐसी भीड़ उमड़ती थी कि मेला फीका पड़ जाता था। लेकिन शनिवार को दोपहर एक से दो बजे के बीच दादानगर की सड़कों पर पहले जैसा कुछ भी नहीं दिखा। सड़कें और फुटपाथ खाली तथा दुकानें, ढाबे बंद थे।
हालांकि पांच दिन पहले प्रशासन ने फैक्ट्रियों को चलाने की अनुमति दे दी है, लेकिन महज 20 फीसदी फैक्ट्रियों में ही उत्पान शुरू हो सका है। इनमें भी औसत 25 फीसदी कर्मचारी ही वापस लौटे हैं। यह संख्या दादानगर औद्योगिक क्षेत्र के रुतबे के सामने कुछ भी नहीं है। वैसे, 25 फीसदी फैक्ट्रियां अगले दो-चार दिन में और चलने लगेंगी। फैक्ट्रियों के बाहर चहलकदमी तो जरूर शुरू हो गई है, लेकिन रौनक नहीं है।
इस औद्योगिक क्षेत्र में छोटी-बड़ी कुल 2500 औद्योगिक इकाइयां हैं। इनमें एक लाख से अधिक कर्मचारी और श्रमिक प्रत्यक्ष रूप से काम करते हैं। इतने ही लोग फैक्ट्रियों में काम करने वालों की बदौलत तरह-तरह की दुकानों में अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार पाते हैं।
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दादानगर स्थित कानपुर इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कोऑपरेटिव सोसाइटी के अध्यक्ष विजय कपूर बताते हैं कि हालात पहले जैसे होने में एक वर्ष से अधिक समय लग जाएगा। लॉकडाउन में उद्यमी टूट गया है। किसी के पास बिजली बिल जमा करने के लिए पूंजी नहीं है तो कोई कर्मचारी व मजदूूरों को वेतन देने की हालत में नहीं। उत्पादन शुरू करने के लिए मंजूरी मिल गई है लेकिन संसाधनों की कमी में ऐसा संभव नहीं हो पा रहा है। उन्होंने समझाया कि यदि किसी फैक्ट्री में अलग-अलग तरह की मशीनों पर 10 मजदूर काम करते थे और उनमें से दो मजदूर अपने घर चले गए तो उनके स्थान पर कोई अन्य व्यक्ति उन मशीनों को चलाने में सक्षम नहीं है। ऐसे में आठ मजदूर अपने हिस्से का काम कर भी देंगे तो उत्पादन की प्रक्रिया पूरी नहीं होगी। माल अधूरा ही बना रहेगा। इसी तरह किसी के पास ऑर्डर नहीं है तो किसी के पास कच्चा माल खरीदने के लिए पैसे की कमी है। बताया कि उनकी साइकिल के पार्ट्स बनाने वाली फैक्ट्री में अभी काम शुरू नहीं हो सका है।
इसी तरह प्राविंशियल इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के उपाध्यक्ष सुमित चावला अपनी पीड़ा बताते हैं। वे कहते हैं कि उनका कच्चा माल दूसरे राज्यों से आता है। अब बाहर के विक्रेता एडवांस पैसा जमा करने पर ही माल भेजने की बात कह रहे हैं। ऐसे में इतना पैसा कहां कि एडवांस देकर कच्चा माल मंगाए। फिर उसे बनाएं और बिकने का इंतजार करें। कहा कि पैसे का फ्लो तभी बनेगा जब उद्योग और व्यापार पूरी तरह खुलेंगे। इससे पहले फैक्ट्री में उत्पादन करना नुकसानदायक है।
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हालांकि पांच दिन पहले प्रशासन ने फैक्ट्रियों को चलाने की अनुमति दे दी है, लेकिन महज 20 फीसदी फैक्ट्रियों में ही उत्पान शुरू हो सका है। इनमें भी औसत 25 फीसदी कर्मचारी ही वापस लौटे हैं। यह संख्या दादानगर औद्योगिक क्षेत्र के रुतबे के सामने कुछ भी नहीं है। वैसे, 25 फीसदी फैक्ट्रियां अगले दो-चार दिन में और चलने लगेंगी। फैक्ट्रियों के बाहर चहलकदमी तो जरूर शुरू हो गई है, लेकिन रौनक नहीं है।
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इस औद्योगिक क्षेत्र में छोटी-बड़ी कुल 2500 औद्योगिक इकाइयां हैं। इनमें एक लाख से अधिक कर्मचारी और श्रमिक प्रत्यक्ष रूप से काम करते हैं। इतने ही लोग फैक्ट्रियों में काम करने वालों की बदौलत तरह-तरह की दुकानों में अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार पाते हैं।
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दादानगर स्थित कानपुर इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कोऑपरेटिव सोसाइटी के अध्यक्ष विजय कपूर बताते हैं कि हालात पहले जैसे होने में एक वर्ष से अधिक समय लग जाएगा। लॉकडाउन में उद्यमी टूट गया है। किसी के पास बिजली बिल जमा करने के लिए पूंजी नहीं है तो कोई कर्मचारी व मजदूूरों को वेतन देने की हालत में नहीं। उत्पादन शुरू करने के लिए मंजूरी मिल गई है लेकिन संसाधनों की कमी में ऐसा संभव नहीं हो पा रहा है। उन्होंने समझाया कि यदि किसी फैक्ट्री में अलग-अलग तरह की मशीनों पर 10 मजदूर काम करते थे और उनमें से दो मजदूर अपने घर चले गए तो उनके स्थान पर कोई अन्य व्यक्ति उन मशीनों को चलाने में सक्षम नहीं है। ऐसे में आठ मजदूर अपने हिस्से का काम कर भी देंगे तो उत्पादन की प्रक्रिया पूरी नहीं होगी। माल अधूरा ही बना रहेगा। इसी तरह किसी के पास ऑर्डर नहीं है तो किसी के पास कच्चा माल खरीदने के लिए पैसे की कमी है। बताया कि उनकी साइकिल के पार्ट्स बनाने वाली फैक्ट्री में अभी काम शुरू नहीं हो सका है।
इसी तरह प्राविंशियल इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के उपाध्यक्ष सुमित चावला अपनी पीड़ा बताते हैं। वे कहते हैं कि उनका कच्चा माल दूसरे राज्यों से आता है। अब बाहर के विक्रेता एडवांस पैसा जमा करने पर ही माल भेजने की बात कह रहे हैं। ऐसे में इतना पैसा कहां कि एडवांस देकर कच्चा माल मंगाए। फिर उसे बनाएं और बिकने का इंतजार करें। कहा कि पैसे का फ्लो तभी बनेगा जब उद्योग और व्यापार पूरी तरह खुलेंगे। इससे पहले फैक्ट्री में उत्पादन करना नुकसानदायक है।