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मजबूरी: गांवों में नहीं मिले रोजगार तो चल दिए परदेस, कुछ लोग घरों पर ही काम-धंधा शुरू करके बने प्रेरणास्रोत
Mon, 12 Oct 2020 02:32 PM IST
प्रभापुंज मिश्रा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
Published by: प्रभापुंज मिश्रा
Updated Mon, 12 Oct 2020 02:32 PM IST
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फिर काम पर लौट रहे मजदूर
- फोटो : PTI
कोरोना संक्रमण के चलते लॉकडाउन में कई मुसीबतें झेलकर मजदूर अपने घर लौटे थे। प्रशासन के लाख ढिंढोरा पीटने के बाद भी जब गांवों में काम नहीं मिला तो मजदूरों को मजबूरी में परदेस जाना पड़ रहा है। हालांकि कुछ लोगों ने गांवों में ही काम-धंधा शुरू करके लोगों के लिए नजीर पेश की है।
लॉकडाउन हुआ तो फैक्टरियां बंद हो गईं, इससे मजदूरों का काम भी छिन गया। परदेस में पैसा खतम होने पर मजदूर अनेक मुसीबतें झेलकर पैदल चलकर, बसों या ट्रेनों से घर लौटे। प्रशासन ने प्रवासी मजदूरों के लिए मनरेगा का काम दिलाने के लिए खूब ढिंढोरा पीटा, लेकिन पर्याप्त काम नहीं दे सका।
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लॉकडाउन हुआ तो फैक्टरियां बंद हो गईं, इससे मजदूरों का काम भी छिन गया। परदेस में पैसा खतम होने पर मजदूर अनेक मुसीबतें झेलकर पैदल चलकर, बसों या ट्रेनों से घर लौटे। प्रशासन ने प्रवासी मजदूरों के लिए मनरेगा का काम दिलाने के लिए खूब ढिंढोरा पीटा, लेकिन पर्याप्त काम नहीं दे सका।
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किसी को दो दिन काम मिला तो किसी को पांच दिन। लेकिन महीने भर उनके खातों में मनरेगा का पैसा नहीं आया। पास का पैसा भी खतम हो गया। चूल्हे ठंडे रहने लगे। अनलॉक के चलते जब कंपनियां खुलीं तो मालिकों के बुलाने पर मजदूर वापस परदेस जाने लगे हैं। गांव में गुजारा न होने पर कई लोग कर्ज काम की तलाश में शहर जा रहे हैं। बस स्टैंड और रेलवे स्टेशनों पर फिर से भीड़ होने लगी है। कई कामगारों को ठेकेदार और मालिक बसें भेजकर बुला रहे हैं। अधिकांश मजदूरों का कहना है कि गांव में काम मिल जाता तो शहर बिल्कुल नहीं जाते।
रोजगार के नाम पर मिला धोखा
फतेहपुर जिले के कई मजदूर बताते हैं कि लॉकडाउन में बड़ी परेशानी में गांव आ पाए। उनके पास रुपये नहीं बचे थे। प्रशासन ने कहा कि सबको मनरेगा में काम देंगे। काम केवल दो-चार दिन मिला, मजदूरी महीने भर बाद भी नहीं आई। रोजगार नहीं, धोखा मिला। भूखों मरने की नौबत आ गई तो कोरोना संक्रमण में भी जान हथेली पर रखकर शहरों की ओर जाना पड़ रहा है।
गांव में ही खोल ली फैक्टरी
मल्लावां, जिला हरदोई के दारूकुईयां गांव निवासी अजय कुमार अपने भाइयों विपिन और राजीव के साथ लोवर-टीशर्ट बनाने वाली एक कंपनी में काम करते थे। लॉकडाउन में घर आए तो रोजी-रोटी की समस्या बनने पर घर में ही लोवर-टीशर्ट बनाने वाली छोटी सी फैक्टरी पिता का पिता के नाम रजिस्ट्रेशन करा लिया। एक जनरेटर और आठ मशीनें हैं। उन्होंने दो कारीगरों को भी काम दिया है। तैयार कपड़ों की आपूर्ति सीतापुर, लखनऊ और उन्नाव व हरदोई में भी करते हैं। अजय बताते हैं कि माह में औसतन 20 हजार रुपये की बचत कर लेते हैं।
रोजगार के नाम पर मिला धोखा
फतेहपुर जिले के कई मजदूर बताते हैं कि लॉकडाउन में बड़ी परेशानी में गांव आ पाए। उनके पास रुपये नहीं बचे थे। प्रशासन ने कहा कि सबको मनरेगा में काम देंगे। काम केवल दो-चार दिन मिला, मजदूरी महीने भर बाद भी नहीं आई। रोजगार नहीं, धोखा मिला। भूखों मरने की नौबत आ गई तो कोरोना संक्रमण में भी जान हथेली पर रखकर शहरों की ओर जाना पड़ रहा है।
गांव में ही खोल ली फैक्टरी
मल्लावां, जिला हरदोई के दारूकुईयां गांव निवासी अजय कुमार अपने भाइयों विपिन और राजीव के साथ लोवर-टीशर्ट बनाने वाली एक कंपनी में काम करते थे। लॉकडाउन में घर आए तो रोजी-रोटी की समस्या बनने पर घर में ही लोवर-टीशर्ट बनाने वाली छोटी सी फैक्टरी पिता का पिता के नाम रजिस्ट्रेशन करा लिया। एक जनरेटर और आठ मशीनें हैं। उन्होंने दो कारीगरों को भी काम दिया है। तैयार कपड़ों की आपूर्ति सीतापुर, लखनऊ और उन्नाव व हरदोई में भी करते हैं। अजय बताते हैं कि माह में औसतन 20 हजार रुपये की बचत कर लेते हैं।