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Kanpur News: बदल रहा बच्चों का बर्ताव, आ रहे अवसाद के लक्षण
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कानपुर। बच्चों का बर्ताव बदल रहा है। वह किसी बात का दिल पर गहरा असर ले लेते हैं जो उन्हें आक्रामक और आवेगी बना रहा है। इससे वह घातक कदम उठाने में भी नहीं चूकते। उनमें अवसाद के लक्षण भी आ रहे हैं। यह बात जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के मनोरोग विभाग की विशेष किशोरावस्था क्लीनिक में आए रोगियों के केस के अध्ययन से सामने आई है।
मेडिकल कॉलेज के मनोरोग विभागाध्यक्ष एवं प्रोफेसर डॉ. धनंजय चौधरी ने बताया कि स्पेशल एडोलेसेंट क्लीनिक में पांच सौ रोगियों ने स्वास्थ्य परीक्षण कराया है। इसमें पांच साल से 17 साल आयु वर्ग के बच्चे शामिल किए गए। इसमें 40 फीसदी लड़कियां और 60 फीसदी लड़के रहे हैं। किशोरों में मुख्य समस्या बर्ताव के बदलाव की मिली है। उनमें धैर्य की कमी हो गई है और वह अब अधिक आक्रामक और आवेगी हो रहे हैं।
पांच से 10 साल के बच्चों के अवसाद के अलग लक्षण मिले। उनमें बड़ों के मुकाबले आक्रामकता अधिक रही। विभाग बाल मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. कृतिका चावला ने बताया कि बच्चों और किशोरों का बर्ताव बदलने में मुख्य भूमिका तीन न्यूरो केमिकल की होती है। इनमें सीरोटोनिन, नॉर एपीनेफरीन और डोपामीन का संतुलन बिगड़ता है। इससे किसी का बर्ताव निर्धारित होता है। उन्होंने बताया कि बच्चे मां-बाप की अपेक्षाओं, ताना, दोस्तों के बीच ब्रेक अप आदि का दिल पर गहरा असर ले रहे हैं। इसके बाद दूसरे नंबर पर स्क्रीन टाइम का असर बच्चों के दिमाग पर आ रहा है। अधिक स्क्रीन टाइम से उनका रूटीन और खेलकूद प्रभावित होता है। पांच से 10 साल के बीच की उम्र के बच्चे अपने अवसाद की स्थिति ढंग से बता नहीं पाते। इसकी वजह से बर्ताव में बदलाव आ जाता है। उनका मिजाज आवेगी हो जाता है।
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मिजाज में बदलाव के कारण
- बात छिपाते हैं, अपनों से बताते नहीं
- मन की बात गुस्से में जाहिर करते
- खेलकूद के लिए बाहर नहीं जाते
- घरवालों की थोपी अपेक्षाएं बोझ समझते
- अपेक्षाएं पूरी न हो पाने का डर मन बना रहता
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यह करें
- बाहर मैदान में खेले कूदें, दोस्तों से मिलें बात करें
- मां-बाप बच्चों के गुमसुम रहने, खामोश रहने पर सतर्क रहें
- किशोर खुद अपनी क्षमता को पहचानें
- कोई दिक्कत हो तो छिपाएं नहीं बताएं
- मोबाइल स्क्रीन के लिए समय निर्धारित करें
- किसी हरकत या बात गलत लगे तो परिजनों को बताएं
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मेडिकल कॉलेज के मनोरोग विभागाध्यक्ष एवं प्रोफेसर डॉ. धनंजय चौधरी ने बताया कि स्पेशल एडोलेसेंट क्लीनिक में पांच सौ रोगियों ने स्वास्थ्य परीक्षण कराया है। इसमें पांच साल से 17 साल आयु वर्ग के बच्चे शामिल किए गए। इसमें 40 फीसदी लड़कियां और 60 फीसदी लड़के रहे हैं। किशोरों में मुख्य समस्या बर्ताव के बदलाव की मिली है। उनमें धैर्य की कमी हो गई है और वह अब अधिक आक्रामक और आवेगी हो रहे हैं।
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पांच से 10 साल के बच्चों के अवसाद के अलग लक्षण मिले। उनमें बड़ों के मुकाबले आक्रामकता अधिक रही। विभाग बाल मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. कृतिका चावला ने बताया कि बच्चों और किशोरों का बर्ताव बदलने में मुख्य भूमिका तीन न्यूरो केमिकल की होती है। इनमें सीरोटोनिन, नॉर एपीनेफरीन और डोपामीन का संतुलन बिगड़ता है। इससे किसी का बर्ताव निर्धारित होता है। उन्होंने बताया कि बच्चे मां-बाप की अपेक्षाओं, ताना, दोस्तों के बीच ब्रेक अप आदि का दिल पर गहरा असर ले रहे हैं। इसके बाद दूसरे नंबर पर स्क्रीन टाइम का असर बच्चों के दिमाग पर आ रहा है। अधिक स्क्रीन टाइम से उनका रूटीन और खेलकूद प्रभावित होता है। पांच से 10 साल के बीच की उम्र के बच्चे अपने अवसाद की स्थिति ढंग से बता नहीं पाते। इसकी वजह से बर्ताव में बदलाव आ जाता है। उनका मिजाज आवेगी हो जाता है।
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मिजाज में बदलाव के कारण
- बात छिपाते हैं, अपनों से बताते नहीं
- मन की बात गुस्से में जाहिर करते
- खेलकूद के लिए बाहर नहीं जाते
- घरवालों की थोपी अपेक्षाएं बोझ समझते
- अपेक्षाएं पूरी न हो पाने का डर मन बना रहता
यह करें
- बाहर मैदान में खेले कूदें, दोस्तों से मिलें बात करें
- मां-बाप बच्चों के गुमसुम रहने, खामोश रहने पर सतर्क रहें
- किशोर खुद अपनी क्षमता को पहचानें
- कोई दिक्कत हो तो छिपाएं नहीं बताएं
- मोबाइल स्क्रीन के लिए समय निर्धारित करें
- किसी हरकत या बात गलत लगे तो परिजनों को बताएं