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Kanpur News: गाजियाबाद के ट्रैवल्स के नाम है बस, नागालैंड से कराया है पंजीकरण
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- 48 सीटर बस में थे लगभग 60 यात्री
संवाद न्यूज एजेंसी
इटावा/ताखा। शनिवार रात हादसे का शिकार हुई एसी स्लीपर बस नागालैंड से पंजीकृत है। जबकि इस बस के मालिक गाजियाबाद के पते पर एक ट्रैवर्ल्स एजेंसी के नाम से है। यूपी के सख्त नियमों से बचने के लिए संचालक अन्य प्रदेशों में पंजीकरण कराकर तमाम तरह के खेल करते हैं। हादसे का शिकार हुई बस 48 सीटर होने के बावजूद उसमें 60 यात्री भरे थे।
आगरा लखनऊ एक्सप्रेसवे पर आए दिन स्लीपर, डबल डेकर बसें हादसों का शिकार बन रही हैं। इनमें से ज्यादातर बसें राजस्थान, मध्यप्रदेश, नागालैंड, पश्चिम बंगाल आदि प्रदेशों से पंजीकृत होती हैं। अधिकांश में जितनी बस की क्षमता है उससे अधिक यात्री बैठाए जाते हैं। जगह-जगह इन बसों को रोककर खुलेआम सवारियां भरी जाती है। इसके बाद भी जिम्मेदार मौन हैं। नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर एक बस संचालक ने बताया कि यूपी में स्लीपर बस में सीटें कम देने कम देने प्रावधान है। जबकि पंजीकरण की फीस अधिक है। ऐसे में जहां स्लीपर बस की सीटों का अधिक परिमिट और फीस कम होती है। वहां से ट्रांसपोर्टर पंजीकरण कराकर ऑल इंडिया परमिट ले लेता है। एआरटीओ प्रदीप कुमार ने बताया कि जांच पड़ताल की जा रही है। गाड़ी के पेपर पूरे हैं, लेकिन सवारियां अधिक बैठाने की जानकारी मिली है। इस पर जांच पड़ताल की जा रही है। आरोपी ट्रैवर्ल्स के खिलाफ कार्रवाई के लिए लिखा जाएगा।
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संवाद न्यूज एजेंसी
इटावा/ताखा। शनिवार रात हादसे का शिकार हुई एसी स्लीपर बस नागालैंड से पंजीकृत है। जबकि इस बस के मालिक गाजियाबाद के पते पर एक ट्रैवर्ल्स एजेंसी के नाम से है। यूपी के सख्त नियमों से बचने के लिए संचालक अन्य प्रदेशों में पंजीकरण कराकर तमाम तरह के खेल करते हैं। हादसे का शिकार हुई बस 48 सीटर होने के बावजूद उसमें 60 यात्री भरे थे।
आगरा लखनऊ एक्सप्रेसवे पर आए दिन स्लीपर, डबल डेकर बसें हादसों का शिकार बन रही हैं। इनमें से ज्यादातर बसें राजस्थान, मध्यप्रदेश, नागालैंड, पश्चिम बंगाल आदि प्रदेशों से पंजीकृत होती हैं। अधिकांश में जितनी बस की क्षमता है उससे अधिक यात्री बैठाए जाते हैं। जगह-जगह इन बसों को रोककर खुलेआम सवारियां भरी जाती है। इसके बाद भी जिम्मेदार मौन हैं। नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर एक बस संचालक ने बताया कि यूपी में स्लीपर बस में सीटें कम देने कम देने प्रावधान है। जबकि पंजीकरण की फीस अधिक है। ऐसे में जहां स्लीपर बस की सीटों का अधिक परिमिट और फीस कम होती है। वहां से ट्रांसपोर्टर पंजीकरण कराकर ऑल इंडिया परमिट ले लेता है। एआरटीओ प्रदीप कुमार ने बताया कि जांच पड़ताल की जा रही है। गाड़ी के पेपर पूरे हैं, लेकिन सवारियां अधिक बैठाने की जानकारी मिली है। इस पर जांच पड़ताल की जा रही है। आरोपी ट्रैवर्ल्स के खिलाफ कार्रवाई के लिए लिखा जाएगा।
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