{"_id":"38-155419","slug":"Kanpur-155419-38","type":"story","status":"publish","title_hn":"शरद पूर्णिमा कल, बरसेगा अमृत ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
शरद पूर्णिमा कल, बरसेगा अमृत
Kanpur
Updated Thu, 17 Oct 2013 05:40 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विज्ञापन
कानपुर। शरद पूर्णिमा शुक्रवार को है। मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा पृथ्वी पर अमृत वर्षा करता है। वहीं विद्वानों का कहना है कि इस दिन सूर्य और चंद्रमा की पूजा करने से अच्छे वर की प्राप्ति होती है।
अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहा जाता है। इस बारे में आजाद नगर के विद्वान संजय गुप्ता का कहना है कि शरद पूर्णिमा की रात्रि 16 कलाओं से युक्त चंद्रमा अमृत वर्षा करता है। रात्रि 12 बजे होने वाली इस अमृत वर्षा का लाभ मिले इसी उद्देश्य से चंद्रोदय के वक्त गगन तले खीर या दूध रखा जाता है। जिसका सेवन रात्रि 12 के बाद किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इसे खाने से रोगी रोग मुक्त हो जाता है।
आचार्य अमरेश मिश्रा का कहना है कि इस रात में सबसे उज्जवल चांदनी छिटकती है। चांद की रोशनी में सारा आसमान धुला नजर आता है। ऐसा लगता है मानो बरसात के बाद प्रकृति साफ और मनोहर हो गई है। इस दिन मां लक्ष्मी भ्रमण के लिए आती है और धरती के मनोहर दृश्य का आनंद लेती है। साथ ही माता यह भी देखती है कि कौन भक्त रात में जागकर उनकी भक्ति कर रहा है। इसलिए शरद पूर्णिमा की रात को को जगराता भी किया जाता है।
विज्ञापन
---------
महत्व
ऐसी मान्यता है कि माता लक्ष्मी का जन्म शरद पूर्णिमा के दिन हुआ था। इसलिए देश के कई हिस्से में शरद पूर्णिमा को लक्ष्मी पूजन किया जाता है। द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ तब मां लक्ष्मी राधा रूप में अवतरित हुई। भगवान श्रीकृष्ण और राधा की अद्भुत रासलीला का आरंभ भी शरद पूर्णिमा के दिन माना जाता है। शैव मतानुसार भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र कार्तिकेय का जन्म भी शरद पूर्णिमा के दिन हुआ था। इसी कारण से इसे कुमार पूर्णिमा भी कहा जाता है। पश्चिम बंगाल और उड़ीसा में इस दिन कुंवारी कन्याएं सुबह स्नान करके सूर्य और चंद्रमा की पूजा करती है। माना जाता है कि इससे योग्य पति प्राप्त होता है।
अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहा जाता है। इस बारे में आजाद नगर के विद्वान संजय गुप्ता का कहना है कि शरद पूर्णिमा की रात्रि 16 कलाओं से युक्त चंद्रमा अमृत वर्षा करता है। रात्रि 12 बजे होने वाली इस अमृत वर्षा का लाभ मिले इसी उद्देश्य से चंद्रोदय के वक्त गगन तले खीर या दूध रखा जाता है। जिसका सेवन रात्रि 12 के बाद किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इसे खाने से रोगी रोग मुक्त हो जाता है।
विज्ञापन
आचार्य अमरेश मिश्रा का कहना है कि इस रात में सबसे उज्जवल चांदनी छिटकती है। चांद की रोशनी में सारा आसमान धुला नजर आता है। ऐसा लगता है मानो बरसात के बाद प्रकृति साफ और मनोहर हो गई है। इस दिन मां लक्ष्मी भ्रमण के लिए आती है और धरती के मनोहर दृश्य का आनंद लेती है। साथ ही माता यह भी देखती है कि कौन भक्त रात में जागकर उनकी भक्ति कर रहा है। इसलिए शरद पूर्णिमा की रात को को जगराता भी किया जाता है।
विज्ञापन
---------
महत्व
ऐसी मान्यता है कि माता लक्ष्मी का जन्म शरद पूर्णिमा के दिन हुआ था। इसलिए देश के कई हिस्से में शरद पूर्णिमा को लक्ष्मी पूजन किया जाता है। द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ तब मां लक्ष्मी राधा रूप में अवतरित हुई। भगवान श्रीकृष्ण और राधा की अद्भुत रासलीला का आरंभ भी शरद पूर्णिमा के दिन माना जाता है। शैव मतानुसार भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र कार्तिकेय का जन्म भी शरद पूर्णिमा के दिन हुआ था। इसी कारण से इसे कुमार पूर्णिमा भी कहा जाता है। पश्चिम बंगाल और उड़ीसा में इस दिन कुंवारी कन्याएं सुबह स्नान करके सूर्य और चंद्रमा की पूजा करती है। माना जाता है कि इससे योग्य पति प्राप्त होता है।