{"_id":"38-122228","slug":"Kanpur-122228-38","type":"story","status":"publish","title_hn":"घुटना प्रत्यारोपण से नार्मल होती चाल ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
घुटना प्रत्यारोपण से नार्मल होती चाल
Kanpur
Updated Sun, 03 Mar 2013 05:31 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
कानपुर। यूपी आर्थोप्लास्टी सोसाइटी की कार्यशाला में शनिवार को छह राज्यों के आर्थोपेडिक सर्जनों ने घुटना प्रत्यारोपण करना सीखा। ऑपरेशन के लाइव टेलीकास्ट के बाद विशेषज्ञों ने आर्थोपेडिक सर्जनों के सवालों के जवाब भी दिए। इस दौरान बताया गया कि गठिया रोगी घुटना प्रत्यारोपित होने के बाद आसानी से चल-फिर सकते हैं।
कैंट के एक रेस्टोरेंट में दो दिवसीय ‘कानपुर आर्थोप्लास्टी कोर्स- 2013’ शुरू हुआ। इसमें वक्ताओं ने कहा कि जो मरीज अर्थराइटिस (गठिया) की वजह से नहीं चल पाते, घुटना प्रत्यारोपण के बाद उनकी चाल लगभग नार्मल हो जाती है। घुटना प्रत्यारोपण की बेसिक जानकारी और प्रत्यारोपण की विधि बताने के बाद कोर्स डायरेक्टर डॉ. एएस प्रसाद ने स्वरूप नगर के एक नर्सिंगहोम में घुटना प्रत्यारोपित किया। कार्यक्रम स्थल पर इसका लाइव टेलीकास्ट किया गया। आपरेशन करीब एक घंटा चला। इसके बाद जर्मनी के डॉ. ग्रीको हेकन, वेस्ट बंगाल आर्थोपेडिक एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. इंद्रजीत, फोर्टिस कोलकाता के डॉ. राकेश राजपूत, लुधियाना के डॉ. एचएस गिल और डॉ. एएस प्रसाद ने पैनल डिशकशन किया। प्रशिक्षण लेने आए आर्थोपेडिक सर्जनों के सवालों के जवाब दिए। बताया गया कि घुटना प्रत्यारोपण में एक से डेढ़ लाख रुपये खर्च आता है। सफलता का प्रतिशत 84 से 87 प्रतिशत है। कार्यशाला में यूपी के साथ ही बिहार, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश के 110 डॉक्टर शामिल हुए। कार्यशाला के दूसरे दिन रविवार को कूल्हा प्रत्यारोपण सिखाया जाएगा।
इनसेट
देशी कृत्रिम घुटने से सस्ता होगा ऑपरेशन - डॉ.इंद्रजीत
वेस्ट बंगाल आर्थोपेडिक एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. इंद्रजीत के अनुसार ज्यादातर मरीजों को इंपोर्टेड कृत्रिम घुटना लगाया जाता है जबकि देशी कृत्रिम घुटना इसकी तुलना में सस्ता है। विदेशी घुटने की सफलता से संबंधित शोध और लेख विश्वस्तरीय पत्रिकाओं में छपते रहते हैं। यदि देशी घुटने बनाने वाली कंपनी भी साइंटफिक तौर पर अपने कृत्रिम घुटने की गुणवत्ता को प्रूफ करें, प्रत्यारोपण के पांच, 10 , 15 और 20 साल बाद मरीजों में इसके रिजल्ट आदि बताएं तो डॉक्टर इन्हें बढ़ावा दे सकते हैं। इसका फायदा सीधे मरीजों को मिलेगा। उन्होंने बताया कि घुटना प्रत्यारोपण में आधुनिक कंप्यूटर नेवीगेशन टेक्निक का विशेष महत्व है। इस तकनीक से आपरेशन के दौरान हड्डी काटने की सटीक जानकारी मिलती है। सामान्य आकार के कृत्रिम घुटने प्रत्यारोपित किए जाते रहे हैं। ये कभी - कभी मैच नहीं करतेे। अत्याधुनिक ‘कस्टम मेड’ तकनीक से हमारी बाडी के हिसाब से कृत्रिम घुटने कंपनी से बनकर आ जाते हैं। हालांकि इस विधि से खर्च करीब 25 हजार रुपये बढ़ जाता है। अब पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग - अलग कृत्रिम घुटने आने लगे हैं।
विज्ञापन
---------------------
ऐसे करें गठिया से बचाव
---------------------
-नियमित व्यायाम
-पौष्टिक भोजन
-वजन पर नियंत्रण
-लाइफ स्टाइल में सुधार
-फास्टफूड, कोल्डड्रिंक से परहेज
--------------------------
विज्ञापन
कैंट के एक रेस्टोरेंट में दो दिवसीय ‘कानपुर आर्थोप्लास्टी कोर्स- 2013’ शुरू हुआ। इसमें वक्ताओं ने कहा कि जो मरीज अर्थराइटिस (गठिया) की वजह से नहीं चल पाते, घुटना प्रत्यारोपण के बाद उनकी चाल लगभग नार्मल हो जाती है। घुटना प्रत्यारोपण की बेसिक जानकारी और प्रत्यारोपण की विधि बताने के बाद कोर्स डायरेक्टर डॉ. एएस प्रसाद ने स्वरूप नगर के एक नर्सिंगहोम में घुटना प्रत्यारोपित किया। कार्यक्रम स्थल पर इसका लाइव टेलीकास्ट किया गया। आपरेशन करीब एक घंटा चला। इसके बाद जर्मनी के डॉ. ग्रीको हेकन, वेस्ट बंगाल आर्थोपेडिक एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. इंद्रजीत, फोर्टिस कोलकाता के डॉ. राकेश राजपूत, लुधियाना के डॉ. एचएस गिल और डॉ. एएस प्रसाद ने पैनल डिशकशन किया। प्रशिक्षण लेने आए आर्थोपेडिक सर्जनों के सवालों के जवाब दिए। बताया गया कि घुटना प्रत्यारोपण में एक से डेढ़ लाख रुपये खर्च आता है। सफलता का प्रतिशत 84 से 87 प्रतिशत है। कार्यशाला में यूपी के साथ ही बिहार, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश के 110 डॉक्टर शामिल हुए। कार्यशाला के दूसरे दिन रविवार को कूल्हा प्रत्यारोपण सिखाया जाएगा।
विज्ञापन
इनसेट
देशी कृत्रिम घुटने से सस्ता होगा ऑपरेशन - डॉ.इंद्रजीत
वेस्ट बंगाल आर्थोपेडिक एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. इंद्रजीत के अनुसार ज्यादातर मरीजों को इंपोर्टेड कृत्रिम घुटना लगाया जाता है जबकि देशी कृत्रिम घुटना इसकी तुलना में सस्ता है। विदेशी घुटने की सफलता से संबंधित शोध और लेख विश्वस्तरीय पत्रिकाओं में छपते रहते हैं। यदि देशी घुटने बनाने वाली कंपनी भी साइंटफिक तौर पर अपने कृत्रिम घुटने की गुणवत्ता को प्रूफ करें, प्रत्यारोपण के पांच, 10 , 15 और 20 साल बाद मरीजों में इसके रिजल्ट आदि बताएं तो डॉक्टर इन्हें बढ़ावा दे सकते हैं। इसका फायदा सीधे मरीजों को मिलेगा। उन्होंने बताया कि घुटना प्रत्यारोपण में आधुनिक कंप्यूटर नेवीगेशन टेक्निक का विशेष महत्व है। इस तकनीक से आपरेशन के दौरान हड्डी काटने की सटीक जानकारी मिलती है। सामान्य आकार के कृत्रिम घुटने प्रत्यारोपित किए जाते रहे हैं। ये कभी - कभी मैच नहीं करतेे। अत्याधुनिक ‘कस्टम मेड’ तकनीक से हमारी बाडी के हिसाब से कृत्रिम घुटने कंपनी से बनकर आ जाते हैं। हालांकि इस विधि से खर्च करीब 25 हजार रुपये बढ़ जाता है। अब पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग - अलग कृत्रिम घुटने आने लगे हैं।
विज्ञापन
---------------------
ऐसे करें गठिया से बचाव
---------------------
-नियमित व्यायाम
-पौष्टिक भोजन
-वजन पर नियंत्रण
-लाइफ स्टाइल में सुधार
-फास्टफूड, कोल्डड्रिंक से परहेज
--------------------------