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Jhansi News: मिट्टी के मिजाज से तय होगी गेहूं की पैदावार
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मार, काबर, पड़वा और राकड़ मिट्टी में खेती के तरीके अलग-अलग अपनाने की सलाह
वैज्ञानिकों ने उन्नत किस्मों के चयन पर दिया जोर
संवाद न्यूज एजेंसी
झांसी। गेहूं की बेहतर पैदावार के लिए सिर्फ उन्नत बीज बोना ही काफी नहीं है, बल्कि खेत की मिट्टी की प्रकृति को समझना भी जरूरी है। मिट्टी की जलधारण क्षमता, बुवाई का समय और सिंचाई का सही प्रबंधन फसल के उत्पादन पर सीधा असर डालते हैं। रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक डॉ. अनिल कुमार राय और डॉ. योगेश्वर सिंह ने किसानों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप गेहूं की खेती करने की सलाह दी है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, बुंदेलखंड में मार, काबर, पड़वा और राकड़ जैसी मिट्टियां पाई जाती हैं। इनकी बनावट और नमी रोकने की क्षमता अलग-अलग होती है। ऐसे में सभी खेतों में एक जैसी कृषि पद्धति अपनाने के बजाय मिट्टी के अनुरूप खेत की तैयारी, खाद और सिंचाई का प्रबंधन करना चाहिए। मिट्टी की वास्तविक उर्वरता जानने के लिए परीक्षण कराना भी जरूरी है।
गेहूं की खेती में समय का विशेष महत्व है। वैज्ञानिकों ने सिंचित क्षेत्रों में नवंबर के प्रथम पखवाड़े तक बुवाई करने को लाभकारी बताया है। देर से बुवाई होने पर तापमान बढ़ने के कारण दाने भरने की अवधि घट सकती है, जिससे पैदावार प्रभावित होती है। किसानों को खेत तैयार रखने और प्रमाणित बीज का उपयोग करने की सलाह दी गई है।
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इन उन्नत किस्मों पर भी ध्यान
वैज्ञानिकों ने गेहूं की उन्नत किस्मों में एचआई-1544, एचआई-1605, डीबीडब्ल्यू-187, डीबीडब्ल्यू-303, डीबीडब्ल्यू-327 और एचडी-2932 के नाम सुझाए हैं। हालांकि, किस्म का चयन बुवाई के समय, मिट्टी की प्रकृति और सिंचाई की उपलब्धता के आधार पर स्थानीय कृषि अनुशंसाओं के अनुरूप करना चाहिए।
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वैज्ञानिकों ने उन्नत किस्मों के चयन पर दिया जोर
संवाद न्यूज एजेंसी
झांसी। गेहूं की बेहतर पैदावार के लिए सिर्फ उन्नत बीज बोना ही काफी नहीं है, बल्कि खेत की मिट्टी की प्रकृति को समझना भी जरूरी है। मिट्टी की जलधारण क्षमता, बुवाई का समय और सिंचाई का सही प्रबंधन फसल के उत्पादन पर सीधा असर डालते हैं। रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक डॉ. अनिल कुमार राय और डॉ. योगेश्वर सिंह ने किसानों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप गेहूं की खेती करने की सलाह दी है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, बुंदेलखंड में मार, काबर, पड़वा और राकड़ जैसी मिट्टियां पाई जाती हैं। इनकी बनावट और नमी रोकने की क्षमता अलग-अलग होती है। ऐसे में सभी खेतों में एक जैसी कृषि पद्धति अपनाने के बजाय मिट्टी के अनुरूप खेत की तैयारी, खाद और सिंचाई का प्रबंधन करना चाहिए। मिट्टी की वास्तविक उर्वरता जानने के लिए परीक्षण कराना भी जरूरी है।
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गेहूं की खेती में समय का विशेष महत्व है। वैज्ञानिकों ने सिंचित क्षेत्रों में नवंबर के प्रथम पखवाड़े तक बुवाई करने को लाभकारी बताया है। देर से बुवाई होने पर तापमान बढ़ने के कारण दाने भरने की अवधि घट सकती है, जिससे पैदावार प्रभावित होती है। किसानों को खेत तैयार रखने और प्रमाणित बीज का उपयोग करने की सलाह दी गई है।
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इन उन्नत किस्मों पर भी ध्यान
वैज्ञानिकों ने गेहूं की उन्नत किस्मों में एचआई-1544, एचआई-1605, डीबीडब्ल्यू-187, डीबीडब्ल्यू-303, डीबीडब्ल्यू-327 और एचडी-2932 के नाम सुझाए हैं। हालांकि, किस्म का चयन बुवाई के समय, मिट्टी की प्रकृति और सिंचाई की उपलब्धता के आधार पर स्थानीय कृषि अनुशंसाओं के अनुरूप करना चाहिए।