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खलिहान और किसानों के नहीं बदले हालात

Mon, 11 Apr 2016 12:56 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो Updated Mon, 11 Apr 2016 12:56 AM IST
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Things changed barn and farmers
dry bundelkhand, jhansi news - फोटो : demopic
झांसी। बदहाल बुंदेलखंड में खुशहाली के रंग भरने को केंद्र की यूपीए-2 सरकार द्वारा दिया गया 7,266 करोड़ रुपये का बुंदेलखंड पैकेज संकट की इस घड़ी में दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहा है। यह भारी भरकम राहत पैकेज खेत-खलिहान व किसानों की दशा तो नहीं बदल पाया, ठेकेदार व अफसरों को जरूर मालामाल कर गया।
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बुंदेलखंड में सूखा कोई नया नहीं है। कुदरत का कहर यहां हमेशा से ही जारी रहा। बीते दशक में सन 2005 से 2009 तक लगातार चार साल बुंदेलखंड सूखे की चपेट में रहा था। दाने-दाने को मोहताज किसान आत्महत्या को मजबूर हो गए थे। हर ओर हाहाकार की स्थिति थी। बुुंदेलखंड के किसानों को दुबारा इस स्थिति का सामना न करना पड़े तथा सूखा व अन्य किसी भी दैवी आपदा में क्षेत्र की कृषि व्यवस्था प्रभावित न हो, इसके लिए केंद्र की कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने 19 नवंबर 2009 को बुंदेलखंड पैकेज की घोषणा की थी। 7,266 करोड़ रुपये के इस पैकेज में से 3,606 करोड़ रुपये उत्तर प्रदेश के हिस्से में आने वाले बुंदेलखंड के सात जनपदों को दिए गए थे।
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बाकी 3,660 करोड़ रुपये मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड के छह जनपदों को आवंटित किए गए थे। साल 2011 में उत्तर प्रदेश के हिस्से में पेयजल के लिए 200 करोड़ रुपये और जोड़ दिए गए थे। पैकेज के तहत बुंदेलखंड की सिंचाई व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने, पशुओं की नस्ल सुधारने व वृक्षारोपण/उद्यानीकरण को बढ़ावा देने पर फोकस किया गया था। इसके लिए संबंधित विभागों को केंद्र सरकार ने दोनों हाथों से पैसा दिया था। निगरानी की जिम्मेदारी प्रदेश सरकारों को सौंपी गई थी, लेकिन वर्तमान में सूखा बुंदेलखंड के खेत खलिहानों में नंगा नाच कर रहा है। ऐसे में बुंदेलखंड पैकेज कहीं नजर नहीं आ रहा है। बल्कि, धांधली के नित नए मामले सामने आ रहे हैं। हालांकि, कागजों में आवंटित धनराशि में से विभागों ने 90 फीसदी धनराशि खर्च भी कर दी है और पूरी शिद्दत से बुंदेलखंड पैकेज की अगली किस्त का इंतजार किया जा रहा है।
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ढाई लाख हेक्टेअर जमीन होनी थी सिंचित
झांसी। बुंदेलखंड पैकेज से ढाई लाख हेक्टेअर असिंचित जमीन को सिंचित करने का लक्ष्य तय किया गया था। इसके लिए गांव-गांव में बीस हजार नए कुएं खोदे जाने थे। पुराने कुओं का जीर्णोंद्धार व सूखे कुओं को रीचार्ज किया जाना था। इसके अलावा जगह-जगह चेक डेम व खेत तालाब तालाबों का निर्माण होना था। जबकि, नहरों की लाइनिंग पक्की जानी थी। हालांकि, खेत तालाब योजना शुरू में ही धड़ाम हो गई थी, जिसे पैकेज से वापस ले लिया गया था। लेकिन, अन्य सभी कार्य कागजों में एकदम चौकस हैं, जबकि धरातल पर स्थिति एकदम इतर बनी हुई है।
 

बकरियां दम तोड़ गईं, गायों की नहीं सुधरी नस्ल    
झांसी। बुंदेलखंड पैकेज में पशु पालन को बढ़ावा देने व जानवरों की नस्ल सुधारने पर भी विशेष जोर रहा था, इसके लिए दो हजार लोगों का चयन कर उन्हें 10-10 बकरियों के सेट देने तथा हरियाणा के मुर्रा सांड़ों से यहां की गायों की नस्ल सुधारने का प्रावधान भी किया गया था। कागजों में यह सभी काम हुए भी, परंतु धरातल से इनका कोई नाता नहीं रहा। गांवों में न तो पैकेज की बकरी हैं और न ही यहां की गायों में हरियाणा की नस्ल नजर आती हैं। जानकारों के अनुसार उक्त सभी कार्य कागजों में ही हुए। धरातल पर तो सिर्फ खानापूरी ही हुई।


राज्य के साथ केंद्र की भी रही अनदेखी
झांसी। बुंदेलखंड पैकेज के लिए बजट केंद्र सरकार द्वारा उपलब्ध कराया गया था। इसके तहत कार्यों के क्रियान्वयन व निगरानी की जिम्मेदारी प्रदेश सरकारों को सौंपी गई थी। बुंदेलखंड पैकेज की स्थिति को देखकर यह आसानी से कहा जा सकता है कि राज्य सरकारों ने अपना काम सही ढंग से नहीं किया, लेकिन इतने भर से केंद्र भी अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता है। केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय वर्षा सिंचित क्षेत्र प्राधिकरण के सीईओ जे एस सामरा को बुंदेलखंड पैकेज की निगरानी की जिम्मेदारी सौंपी थी। उन्होंने यहां दर्जनों दौरे भी किए व मौके पर जाकर कार्यों की हकीकत भी देखी। लेकिन, इसकी बेहतरी के लिए उनके द्वारा कोई कड़े कदम नहीं उठाए गए।


फाइल में खुद गया कुआं और हो गया पेमेंट
झांसी। बुंदेलखंड पैकेज के कार्यों की गड़बड़ियों की लंबी फेहरिस्त है। आए दिन मामले सामने आते रहते हैं। अफसरों की चौखट तक शिकायतें पहुंचती हैं, लेकिन कार्रवाई जांच के भरोसे तक सीमित रह जाती हैं। इसकी तस्दीक कूप निर्माण में हुई धांधली को देखकर की जा सकती है।

ब्लाक चिरगांव के ग्राम वकुवां खुर्द निवासी जगदीश ने जिलाधिकारी ने कूप निर्माण में धांधली की शपथ पत्र देखकर शिकायत की थी, जिसमें उन्होंने बताया था कि वह बुंदेलखंड पैकेज के तहत कूप निर्माण की पात्रता सूची में उसका नाम दर्ज किया गया था, लेकिन कूप का निर्माण नहीं कराया गया। जबकि, सरकारी आंकड़ों में 73,488 रुपये की लागत से कूप निर्माण पूर्ण होना दर्शाया जा रहा है। यही शिकायत ग्राम सिकरी खुर्द के प्रभुदयाल, वकवां खुर्द की पुष्पा देवी व इटवां खुर्द की रामश्री की है। यह तो सिर्फ बानगी भर है। कागजों में कूप निर्माण के मामलों की सूची बहुत लंबी है।  



सही इस्तेमाल होता, तो बदल जाती तस्वीर
झांसी। कांग्रेस द्वारा गठित की गई बुंदेलखंड पैकेज मॉनिटरिंग कमेटी के चेयरमैन भानु सहाय के मुताबिक पैकेज का यदि सही इस्तेमाल किया गया होता, तो बुंदेलखंड की तस्वीर बदल जाती, लेकिन इसमें बड़े पैमाने पर धांधली हुई। यहां तक कि पोल खुलने के डर से पैकेज को ऑनलाइन तक नहीं किया गया, जबकि यह इसकी शर्तों में शामिल था। उन्होंने कहा कि प्रदेश की बसपा व सपा सरकार ने इसकी जमकर अनदेखी की। हालांकि, इसमें चूक केंद्र के स्तर पर भी हुई है। अपनी दी हुई राशि का केंद्र सरकार सही इस्तेमाल नहीं करवा पाई। केंद्र द्वारा पैकेज के क्रियान्वयन के सुधार को प्रदेश सरकारों को पत्र तो खूब लिखे गए, परंतु नतीजा कुछ भी नहीं निकला।


पूर्व मंत्री ने की सीबीआई जांच की मांग
झांसी। पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रदीप जैन आदित्य ने बताया कि बुंदेलखंड पैकेज को धांधली से बचाने के लिए तत्कालीन केंद्र सरकार ने दोनों प्रदेशों में मॉनिटरिंग कमेटी बनाने की योजना बनाई थी, लेकिन इसका यूपी व एमपी के मुख्यमंत्रियों ने विरोध कर दिया था, जिससे कमेटियां नहीं बन पाईं थीं। उन्होंने कहा कि पैकेज में बड़े पैमाने पर धांधली हुई है। इसकी सीबीआई जांच की जानी चाहिए। इसकी वह पहले भी मांग कर चुके हैं, लेकिन राज्य सरकारें इस संबंध में निर्णय नहीं ले रही हैं। 
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