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हिंदी दिवस 2021 : बुंदेलखंड में जन्मे हिंदी साहित्य के पुरोधाओं की कृतियों को किया जा रहा विस्मृत

Tue, 14 Sep 2021 06:24 PM IST
झांसी ब्यूरो अमर उजाला ब्यूरो, झांसी
अमर उजाला ब्यूरो, झांसी Published by: झांसी ब्यूरो Updated Tue, 14 Sep 2021 06:24 PM IST
सार

हिंदी की स्वीकार्यता सिर्फ हिंदी दिवस मनाने से नहीं, बल्कि उसके प्रति उत्सवधर्मिता विकसित करने से होगी। वर्ष भर में एक बार हिंदी दिवस मना लेने से हम हिंदी का उत्थान नहीं कर सकते, इनके साहित्य को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए शोध संस्थानों की स्थापना की गई हैं।

 

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Hindi Diwas 2021 :  The works of the pioneers of Hindi literature born in Bundelkhand are being forgotten
हिंदी दिवस 2021

विस्तार

 बुंदेलखंड में रीतिकाल के प्रथम आचार्य महाकवि केशवदास, लोक कवि ईसुरी, मैथिली शरण गुप्त, डा. वृंदावन लाल वर्मा जैसी विभूतियों ने हिंदी के विकास में अपना अहम योगदान दिया है, पर हिंदी की जिन कृतियों की उपलब्धियों के लिए इन्हें जाना जाता है, उनके संरक्षण के लिए सरकार अब तक कोई ध्यान नहीं दे सकी है। इनके साहित्य को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए शोध संस्थानों की स्थापना की गई, पर एक दो को छोड़ दें तो अधिकांश शोध संस्थान निजी संस्थाओं ने बनाए और यह आर्थिक अभाव में अपने मंतव्य तक पहुंचने से पहले ही ठप हो गए।
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लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी ठप पड़ा है महाकवि केशव शोध संस्थान
साहित्यकार अजित पुरोहित कहते हैं कि रीतिकाल के प्रथम आचार्य महाकवि केशव दास के हिंदी साहित्य को युवा पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय रीवा ने महाकवि केशव शोध संस्थान की स्थापना ओरछा में की थी, यह शोध संस्थान अब भी सिर्फ एक कमरे में चल रहा है। इसकी इमारत के लिए तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री अर्जुन सिंह ने लाखों रुपये की जमीन भी ओरछा में खरीदी थी जो अब भी पड़ी हुई है। पर, बाद में बुंदेलखंड और बघेलखंड के क्षेत्रवाद के झमेले में फंसकर यह शोध संस्थान किराये के एक कमरे में ही कैद होकर रह गया। अब न तो विश्वविद्यालय इसकी ओर ध्यान दे रहा है और न ही सरकार। जब हमारी आने वाली पीढ़ी ही हिंदी साहित्य को नहीं जान सकेगी तो हिंदी का विकास कैसे संभव है। अब केशव की कृतियां कहीं भी उपलब्ध नहीं हैं।
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लोक कवि ईसुरी शोध संस्थान भी सरकार की अनदेखी का शिकार
शिक्षाविद डा. प्रियम्बदा त्रिपाठी मिश्र बताती हैं कि बुंदेलखंड के ही लोककवि ईसुरी को लेकर भी उनके गृह ग्राम मेढ़की में लोक कवि ईसुरी शोध संस्थान की स्थापना साहित्यकारों की एक निजी संस्था ने की थी, पर शासन की ओर से समुचित सहयोग न मिलने से यह संस्था भी अपने मंतव्य तक नहीं पहुंच सकी। आज ईसुरी की हिंदी चौकड़ियों का साहित्य भी नई पीढ़ी तक नहीं पहुंच पा रहा है।
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राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त, डा. वृंदावन लाल वर्मा जैसे बुंदेलखंड के महान साहित्यकारों की कृतियों को लेकर सरकार का न तो कोई पुस्तकालय है और न ही कोई अन्य संस्था, ऐसे में आखिर कैसे इनका साहित्य आने वाली पीढ़ी तक पहुंच सकेगा। कुछ विश्वविद्यालयों में इनकी कृतियां पाठ्यक्रम में शामिल की गईं थीं, पर धीरे-धीरे पाठ्यक्रमों से भी इन्हें हटाया जा रहा है। इसलिए सिर्फ हिंदी दिवस मनाने मात्र से हिंदी का विकास संभव नहीं है, बल्कि बुंदेलखंड की हिंदी साहित्य के लिए अविस्मरणीय योगदान करने वाली इन विभूतियों के साहित्य को नई पीढ़ी तक पहुंचाने से ही हिंदी का विकास हो सकेगा।

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