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निजी आरक्षण केंद्र खोलने की योजना ठप
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Thu, 16 Mar 2017 12:43 AM IST
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निजी आरक्षण केंद्र खोलने की योजना ठप
- फोटो : demo
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पीपीपी मॉडल (प्राइवेट पब्लिक पार्टनरशिप) पर आरक्षण कार्यालय खोलने की योजना के अच्छे परिणाम नहीं मिलने पर रेलवे ने इस योजना पर विचार बंद कर दिया है।
दो साल पहले उत्तर मध्य रेलवे प्रशासन ने जेटीबीएस (अनारक्षित टिकट सुविधा केंद्र) की तरह वाईटीएसके (यात्री टिकट सुविधा केंद्र) शुरू करने की योजना बनाई थी। यह केंद्र पीपीपी मॉडल पर खोले जाने थे। इन काउंटरों पर लोग रेलवे के आरक्षित टिकट खरीद सकते थे। उस समय मंडल के सभी प्रमुख स्टेशनों के लिए आवेदन मांगे गए थे, मगर शर्तें बेहद जटिल होने से महोबा के एक व्यक्ति ने ही आवेदन किया था। इस पर भी अभी तक विचार नहीं हो सका। अच्छे परिणाम न आने पर रेल प्रशासन ने इस महत्वाकांक्षी योजना पर हथियार डाल दिए हैं। जनसंपर्क अधिकारी मनोज कुमार सिंह ने बताया कि पहली बार टेंडर में अच्छा रिस्पांस नहीं मिलने के बाद से योजना पर आगे विचार नहीं किया गया है।
गौरतलब है कि इस व्यवस्था में टेंडर लेने वाले को आधारभूत ढांचा व कर्मचारी खुद लगाने थे। सिर्फ तकनीकी सुविधाएं रेलवे को मुहैया करानी थी। लाइसेंस लेने वाले से पांच लाख की धरोहर राशि मांगी गई थी, जो वापस नहीं होती। जेटीबीएस संचालित कर रहे संचालकों को इस योजना में प्राथमिकता दी जा रही थी। भारी भरकम खर्चा व कमीशन के तौर पर न के बराबर राशि मिलने के कारण योजना लेने में किसी ने रुचि नहीं दिखाई।
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दो साल पहले उत्तर मध्य रेलवे प्रशासन ने जेटीबीएस (अनारक्षित टिकट सुविधा केंद्र) की तरह वाईटीएसके (यात्री टिकट सुविधा केंद्र) शुरू करने की योजना बनाई थी। यह केंद्र पीपीपी मॉडल पर खोले जाने थे। इन काउंटरों पर लोग रेलवे के आरक्षित टिकट खरीद सकते थे। उस समय मंडल के सभी प्रमुख स्टेशनों के लिए आवेदन मांगे गए थे, मगर शर्तें बेहद जटिल होने से महोबा के एक व्यक्ति ने ही आवेदन किया था। इस पर भी अभी तक विचार नहीं हो सका। अच्छे परिणाम न आने पर रेल प्रशासन ने इस महत्वाकांक्षी योजना पर हथियार डाल दिए हैं। जनसंपर्क अधिकारी मनोज कुमार सिंह ने बताया कि पहली बार टेंडर में अच्छा रिस्पांस नहीं मिलने के बाद से योजना पर आगे विचार नहीं किया गया है।
गौरतलब है कि इस व्यवस्था में टेंडर लेने वाले को आधारभूत ढांचा व कर्मचारी खुद लगाने थे। सिर्फ तकनीकी सुविधाएं रेलवे को मुहैया करानी थी। लाइसेंस लेने वाले से पांच लाख की धरोहर राशि मांगी गई थी, जो वापस नहीं होती। जेटीबीएस संचालित कर रहे संचालकों को इस योजना में प्राथमिकता दी जा रही थी। भारी भरकम खर्चा व कमीशन के तौर पर न के बराबर राशि मिलने के कारण योजना लेने में किसी ने रुचि नहीं दिखाई।
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