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Jhansi News: सेम की नई किस्म तैयार, 30 फीसदी बढ़ी पैदावार
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झांसी। बुंदेलखंड के किसानों के लिए राहत भरी खबर है। रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने तीन साल तक शोध करने के बाद क्षेत्र की जलवायु और मिट्टी के हिसाब से सेम की नई किस्म श्री लक्ष्मी सेम-8 विकसित की है। वैज्ञानिकों का दावा है कि इस प्रजाति में ज्यादा फूल खिलने से फलियां अधिक निकलती हैं। इससे 38 क्विंटल प्रति हेक्टेअर तक पैदावार हो रही है, जो अन्य पारंपरिक प्रजातियों की तुलना में 30 प्रतिशत ज्यादा है। इससे न केवल किसानों की आमदनी में इजाफा होगा, बल्कि सीमित सिंचाई वाले इलाकों में भी सब्जी उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा।
केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने शोध कार्य के दौरान बुंदेलखंड समेत कई क्षेत्रों और शोध संस्थानों से सेम के जननद्रव्य (जर्म प्लाज्म) और प्रजातियों का संकलन किया। विश्वविद्यालय के निदेशक शोध डॉ. सुशील कुमार चतुर्वेदी ने बताया कि लगातार तीन सालों तक झांसी की जलवायु और मिट्टी में इनका परीक्षण किया गया। शोध परिणामों में श्री लक्ष्मी सेम-8 नामक प्रजाति ने सर्वोत्तम प्रदर्शन किया है। इस प्रजाति से लगभग 38 क्विंटल प्रति हेक्टेअर की पैदावार मिली, जो सेम की अन्य प्रजातियों जैसे काशी शीतल (26 क्विंटल प्रति हेक्टेअर) और काशी हरीतिमा (28 क्विंटल प्रति हेक्टेअर) से 30 प्रतिशत ज्यादा है। ये दोनों किस्में केंद्र सरकार से यूपी के लिए संस्तुत हैं।
उन्होंने बताया कि इसकी फलियां आकर्षक हरे रंग की कम रेशे वाली हैं और बोआई के 120 दिन बाद फलियां सब्जी बनाने के लिए उपयुक्त हो जाती हैं। फलियों की लंबाई लगभग 10 से 12 सेंटीमीटर, चौड़ाई 1.5 सेंटीमीटर और 100 फलियों का वजन लगभग 650 से 700 ग्राम होता है, जो बाजार और उपभोक्ता की मांग के अनुरूप है। कहा कि इसकी खेती से अतिरिक्त आय के अलावा मानव स्वास्थ्य को भी बेहतर बनाया जा सकता है। अधिक जानकारी के लिए किसान विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों से संपर्क कर सकते हैं।
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तीन-चार महीने बाजार में उपलब्ध रहती है सेम
सेम की सब्जी तीन से चार महीने बाजार में उपलब्ध रहती है। ठंड के सीजन में दिसंबर से बाजार में आनी शुरू हो जाती है, जो कि मार्च तक मिलती रहती है। इसे लोग अपने घरों के लॉन में भी लगा सकते हैं। सेम प्रोटीनयुक्त होती है।
वर्जन..
बुंदेलखंड की जलवायु और भूमि में सब्जियों की खेती बढ़ाने की अपार संभावनाएं हैं। पिछले सालों में आवागमन के संसाधनों और सड़कों के निर्माण ने बुंदेलखंड में सब्जियों की खेती को लाभकारी बना दिया है। क्षेत्र के किसान सब्जियों को झांसी, ग्वालियर, कानपुर आदि शहरों में बेचकर आय बढ़ा सकते हैं। - डॉ. अशोक कुमार सिंह, कुलपति, रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय।
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केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने शोध कार्य के दौरान बुंदेलखंड समेत कई क्षेत्रों और शोध संस्थानों से सेम के जननद्रव्य (जर्म प्लाज्म) और प्रजातियों का संकलन किया। विश्वविद्यालय के निदेशक शोध डॉ. सुशील कुमार चतुर्वेदी ने बताया कि लगातार तीन सालों तक झांसी की जलवायु और मिट्टी में इनका परीक्षण किया गया। शोध परिणामों में श्री लक्ष्मी सेम-8 नामक प्रजाति ने सर्वोत्तम प्रदर्शन किया है। इस प्रजाति से लगभग 38 क्विंटल प्रति हेक्टेअर की पैदावार मिली, जो सेम की अन्य प्रजातियों जैसे काशी शीतल (26 क्विंटल प्रति हेक्टेअर) और काशी हरीतिमा (28 क्विंटल प्रति हेक्टेअर) से 30 प्रतिशत ज्यादा है। ये दोनों किस्में केंद्र सरकार से यूपी के लिए संस्तुत हैं।
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उन्होंने बताया कि इसकी फलियां आकर्षक हरे रंग की कम रेशे वाली हैं और बोआई के 120 दिन बाद फलियां सब्जी बनाने के लिए उपयुक्त हो जाती हैं। फलियों की लंबाई लगभग 10 से 12 सेंटीमीटर, चौड़ाई 1.5 सेंटीमीटर और 100 फलियों का वजन लगभग 650 से 700 ग्राम होता है, जो बाजार और उपभोक्ता की मांग के अनुरूप है। कहा कि इसकी खेती से अतिरिक्त आय के अलावा मानव स्वास्थ्य को भी बेहतर बनाया जा सकता है। अधिक जानकारी के लिए किसान विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों से संपर्क कर सकते हैं।
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तीन-चार महीने बाजार में उपलब्ध रहती है सेम
सेम की सब्जी तीन से चार महीने बाजार में उपलब्ध रहती है। ठंड के सीजन में दिसंबर से बाजार में आनी शुरू हो जाती है, जो कि मार्च तक मिलती रहती है। इसे लोग अपने घरों के लॉन में भी लगा सकते हैं। सेम प्रोटीनयुक्त होती है।
वर्जन..
बुंदेलखंड की जलवायु और भूमि में सब्जियों की खेती बढ़ाने की अपार संभावनाएं हैं। पिछले सालों में आवागमन के संसाधनों और सड़कों के निर्माण ने बुंदेलखंड में सब्जियों की खेती को लाभकारी बना दिया है। क्षेत्र के किसान सब्जियों को झांसी, ग्वालियर, कानपुर आदि शहरों में बेचकर आय बढ़ा सकते हैं। - डॉ. अशोक कुमार सिंह, कुलपति, रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय।