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भारत माता के साथ चंद्रशेखर आजाद की मां की सेवा कर अमर हो गए मलकापुरकर

Tue, 03 Aug 2021 01:42 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Tue, 03 Aug 2021 01:42 AM IST
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Malkapurkar became immortal by serving Chandrashekhar Azad's mother with Bharat Mata
भुसावलकांड के दैरान अंग्रेज सरकार की पुलिस की गिरफ्त क्रांतिकारी सदाशिवराव मलकापुरकर।
झांसी। अज्ञातवास के दौरान बुंदेलखंड में चंद्रशेखर आजाद के सबसे भरोसेमंद साथियों में भगवानदास माहौर और सदाशिवराव मलकापुरकर ही थे। सदाशिवराव को भुसालवल कांड में चौदह वर्ष की काले पानी की सजा हुई थी। अंग्रेजी शासनकाल में ही 1938 में कांग्रेस मंत्रिमंडल बनने पर इन्हें रिहा कर दिया गया था। बुंदेलखंड के सागर जिले में रहली तहसील के निमोनी गांव में सन 1911 में सदाशिवराम मलकापुरकर का जन्म एक जमींदार परिवार में हुआ था। उन्हें उच्च शिक्षा के लिए परिवारजनों ने बहनोई के पास झांसी भेजा था। यहां पर वह भगवानदास माहौर और मास्टर रुद्रनारायण के संपर्क में आने के बाद चंद्रशेखर आजाद के भरोसेमंद साथी बन गए। मलकापुरकर पढ़ाई के साथ क्रांतिकारियों के संग बम बनाने का अभ्यास भी करते थे। मलकापुरकर को भारत मां को गुलामी की जंजीरों से आजाद कराने के लिए एक सच्चे राष्ट्रभक्त सपूत के रूप में जाना जाता है, वहीं उन्हें आजाद के बलिदान के बाद उनकी मां जगरानी देवी की वृद्धावस्था में सेवा करने के लिए भी एक सच्चे बेटे के रूप में भी याद किया जाता है।
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आजाद की मां को कुटकी के चावल खाकर गुजारा करते देख रो पड़े थे सदाशिव
क्रांतिकारी भगवानदास माहौर के छात्र रहे डा. उदय त्रिपाठी बताते हैं कि उन्हें माहौर जी के मार्फत ही सदाशिवराव मलकापुरकर को जानने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। सदाशिवराव मलकापुरकर के सभी साथी उन्हें सिंधु काका के नाम से पुकारते थे, यह नाम बहुत निकट के साथियों को ही मालूम था। अंग्रेजी शासनकाल में इस नाम का खुफिया तरीके से इस्तेमाल किया जाता था। मलकापुरकर जी सन 1931 में भुसावल रेलवे स्टेशन पर राजगुरु को देने के लिए असलहे ले जाते समय डा. भगवानदास माहौर के साथ ही पकड़े गए थे। जलगांव में सुनवाई के दौरान इन्हें चौदह वर्ष की काले पानी की सजा हुई थी। बाद में 1938 में इन्हें रिहा कर दिया गया था। चंद्रशेखर आजाद की शहादत के बाद देश आजाद हुआ पर किसी ने भी नहीं सोचा की आजाद की मां किस हाल हमें होंगी। चंद्रशेखर आजाद के के पिता और बड़े भाई की मृत्यु हो चुकी थी। उनकी मां झबुआ जिले के भावरा गांव में अकेली रहती थी। हालत यह थी कि उपले बेचकर इतना भी पैसा नहीं आता था कि अनाज खरीद सकें। भीलों के इलाके में जलभराव वाली जगह में कुटकी के चावल होते थे, इन्हीं चावलों को उबालकर किसी तरह से वे अपने पेट भरती थीं, इतना ही नहीं उस पर भील जाति के लोग यह ताना मारा करते थे कि उनका बेटा चंदू (चंद्रशेखर आजाद) डकैत था, इसीलिए उसे अंग्रेज सरकार ने मार दिया था। बात 1948-49 की है, अचानक सदाशिवराव मलकापुरकर को चंद्रशेखर आजाद की मां का स्मरण हुआ और वे भावरा गांव की ओर उनसे मिलने चल दिए। यहां जाकर उन्होंने स्वतंत्र भारत में भी चंद्रशेखर आजाद की मां का जो हाल देखा उसे देख उनकी आंखें नम हो गई। उन्होंने अपना परिचय चंद्रशेखर आजाद के मित्र के रूप दिया तथा आजाद की मां जगरानी देवी को अपने साथ झांसी ले आए। इसके बाद जगरानी देवी कभी झांसी तो कभी निमोनी गांव में रहती थीं। सदाशिवराव उनकी एक बेटे की तरह सेवा करते रहे। 23 मार्च 1951 को चंद्रशेखर आजाद की मां जगरानी देवी का झांसी में ही देहावसान हो गया। मलकापुरकर ने जगरानी देवी को सगे बेटे की तरह मुखाग्नि देकर आजाद को दिया गाय बचन पूरा किया।
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शांता ताई ने पुत्रवधु की तरह की आजाद की मां की सेवा
इतिहास के छात्र रहे डा. नितिन साहू बताते हैं कि क्रांतिकारी सदाशिवराव मलकापुरकर आजीवन कुंवारे रहे। उनके भाई शंकर राव की पत्नी शांता ताई को जब मालूम हुआ कि उनके देवर सदाशिव चंद्रशेखर की मां जगरानी को अपने साथ झांसी ले आए हैं तो वे भी अपने पति शंकरराव के साथ झांसी आ गई तथा उन्होंने एक पुत्रवधु की तरह अंतिम समय तक जगरानी देवी की सेवा की। 1949 में वे सदाशिवव राव को साथ लेकर जगरानी देवी को तीर्थ यात्रा करवाने निकल पड़ीं तथा तीर्थ यात्रा करवाने के एक वर्ष बाद ही जगरानी देवी की मृत्यु हो गई। उनकी समाधि अभी भी झांसी के बड़ागांव गेट बाहर स्थित है।
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एसपीआई इंटर कालेज और हाफिज सिद्दीकी स्कूल में शिक्षक रहे सदाशिवराव
साहू बताते हैं कि आजाद भारत में अपनी जीविका चलाने के लिए कुछ दिनों सदाशिवराव मलकापुरकर सरस्वती पाठशाला इंटर कालेज व हाफिज सिद्दीकी स्कूल में शिक्षक रहे। वृद्धावस्था में न तो शासन की ओर से उन्हें कोई मदद मिली न ही समाज की ओर से कोई सहायता तो वह बेहद अभावों का जीवन जीने लगे। एक छोटी सी झोपड़ी में किसी तरह वह अपना जीवन यापन करते थे। बाद में वे झांसी से अपने गांव निमोनी चले गए जहां 1995 में उनका निधन हो गया।
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