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Jhansi News: महंगाई और बदलती पसंद से थमे खादी के चरखे

Thu, 24 Sep 2026 02:17 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Thu, 24 Sep 2026 02:17 AM IST
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Khadi spinning wheels come to a halt due to inflation and changing preferences.
खादी वस्त्र भंडार में लगे खादी के वस्त्र ल - फोटो : Archive
झांसी। महंगाई और लोगों की बदलती पसंद ने खादी की बिक्री को झटका दिया है। नगर में संचालित श्री गांधी आश्रम की दुकानों पर साल-दर-साल बिक्री घट रही है। इसका असर खादी के उत्पादन के साथ ही चरखे और हथकरघे से जुड़े कारीगरों के रोजगार पर भी पड़ा है। महोबा के बेलाताल में कभी 100 चरखे चलते थे, लेकिन अब इनकी संख्या काफी कम हो गई है। गांधी जयंती पर छूट बढ़ने से कारोबार में कुछ सुधार की उम्मीद है।
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श्री गांधी आश्रम गुसाईंपुरा की करीब 80 वर्ष पुरानी दुकान के अकाउंटेंट जटाशंकर पाठक ने बताया कि महंगाई बढ़ने के कारण खादी की बिक्री प्रभावित हुई है। वर्ष 2024 में दुकान पर करीब 15 लाख रुपये की बिक्री हुई थी, जो वर्ष 2025 में घटकर नौ लाख रुपये रह गई। मानिक चौक स्थित श्री गांधी आश्रम की दुकान पर भी बिक्री में बड़ी गिरावट आई। वर्ष 2024 में यहां 12 लाख रुपये की बिक्री हुई थी, जो 2025 में घटकर 3.40 लाख रुपये रह गई।
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जटाशंकर पाठक पिछले 26 वर्ष से गुसाईंपुरा की दुकान पर काम कर रहे हैं। उनके साथ तीन अन्य कर्मचारी भी हैं। वर्तमान में खादी के कपड़ों पर 10 फीसदी की छूट दी जा रही है। गांधी जयंती के अवसर पर यह छूट बढ़कर 25 फीसदी होने की उम्मीद है। इससे बिक्री बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है।
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उत्पादन घटा तो कारीगरों ने छोड़ा काम
बिक्री घटने का असर खादी के उत्पादन पर भी पड़ा है। महोबा के बेलाताल में पहले गांधी आश्रम का कपड़ा तैयार होता था। यहां करीब 100 चरखे चलते थे, लेकिन अब इनकी संख्या काफी कम हो गई है। काम घटने से कई कारीगर दूसरे स्थानों पर चले गए हैं।
ग्राहकों की बदलती पसंद के चलते गांधी आश्रम की दुकानों पर खादी के साथ पॉलिस्टर मिश्रित कपड़े भी रखने पड़ रहे हैं। ऊनी चादर, शॉल और सदरी जैसे गर्म कपड़े कश्मीर और पानीपत से मंगाए जाते हैं। ग्रामोद्योग संघ बंगलूरू से अगरबत्ती, धूपबत्ती और चंदन की लकड़ी भी उपलब्ध कराई जाती है।

महंगाई के साथ बदली लोगों की पसंद भी कारण
गुसाईंपुरा के अकाउंटेंट जटाशंकर पाठक ने बताया कि बिक्री घटने के पीछे महंगाई के साथ लोगों की बदलती पसंद भी बड़ी वजह है। खादी हाथ से तैयार होती है, इसलिए मशीन से बने कपड़ों की तुलना में इसकी कीमत अधिक होती है। युवाओं में भी खादी के प्रति पहले जैसा आकर्षण नहीं रहा। अब युवा टेरीकॉट और दूसरे आधुनिक कपड़ों को अधिक पसंद करते हैं।
उन्होंने बताया कि खादी आरामदायक होती है, लेकिन इसकी देखभाल में भी मेहनत और खर्च होता है। इसे पहनने से पहले प्रेस करना जरूरी होता है। पहले राजनीति से जुड़े लोगों में भी खादी की मांग अधिक रहती थी, लेकिन अब वहां भी इसका चलन कम हुआ है।

20 लाख रुपये की छूट राशि अटकी
गांधी आश्रम झांसी के सचिव रामनाथ ने बताया कि पहले सरकारी विभागों में भी खादी के कपड़े की आपूर्ति होती थी, लेकिन अब इसमें काफी कमी आई है। प्रदेश सरकार पर पिछली छूट की करीब 20 लाख रुपये की राशि बकाया है। इसका भुगतान अब तक नहीं हुआ है।
उन्होंने बताया कि वर्ष 1956 के बाद खादी उद्योग वर्ष 2010 तक अच्छी स्थिति में रहा। बाद में छूट की व्यवस्था प्रभावित होने से खादी संस्थाओं की मुश्किलें बढ़ती गईं। आर्थिक संकट के कारण खादी का उत्पादन अब नाममात्र का रह गया है। चरखे और हथकरघे से जरूरतमंदों को मिलने वाला रोजगार भी धीरे-धीरे कम हो गया है। रामनाथ के मुताबिक, गांधी जयंती पर पहले खादी पर 30 फीसदी तक छूट मिलती थी। अब 25 फीसदी छूट मिलने की उम्मीद है। इससे बिक्री बढ़ने की संभावना है।


सेवानिवृत्ति के बाद बंद हुई दुकान फिर खोलने की तैयारी
सदर बाजार स्थित श्री गांधी आश्रम की दुकान मई 2026 में एक कर्मचारी के सेवानिवृत्त होने के बाद बंद हो गई थी। इसे दो अक्तूबर से पहले फिर शुरू करने की तैयारी है। श्री गांधी भंडार, इलाइट चौराहा के मैनेजर सुरेंद्रनाथ चौबे ने बताया कि सदर बाजार की दुकान की बिक्री झांसी की अन्य दुकानों की तुलना में अच्छी रही है। वर्ष 2025 में यहां करीब 10 से 15 लाख रुपये तक की बिक्री हुई थी। गांधी जयंती पर छूट बढ़ने से बिक्री में और सुधार की उम्मीद है।
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