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केन-बेतवा परियोजना बुझाएगी बुंदेलखंड की प्यास
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झांसी। करीब 19 साल से जिस केन-बेतवा लिंक परियोजना का इंतजार हो रहा, उसके मंजूरी मिलने से बुंदेलखंड की तस्वीर बदल जाएगी। इसका सबसे बड़ा फायदा सूखाग्रस्त इलाके तक सिंचाई के लिए पानी पहुंच जाएगा। इसकी मदद से झांसी, महोबा, ललितपुर एवं बांदा का करीब 2.51 लाख हेक्टेयर असिंचित जमीन को सिंचित बनाया जा सकेगा। यहां के करीब 20 लाख किसानों को इससे फायदा मिलेगा।
परियोजना से जुड़े अभियंताओं का कहना है इसकी मदद से झांसी का 17488 हेक्टयर कृषि रकबा एवं ललितपुर का 3533 हेक्टयर रकबा सिचिंत होगा। बांदा की पौने दो लाख हे.जमीन सिचिंत होगी। कुल करीब 2.51 लाख हे. जमीन सिचिंत हो सकेगी। इसके अलावा झांसी, ललितपुर, महोबा, एवं हमीरपुर में 67 एमसीएम (मिलियन क्यूबिक मीटर) पीने का पानी भी उपलब्ध कराया जाएगा।
केन-बेतवा लिंक नहर से झांसी के सभी नहर, तालाब एवं डैम भी भरे जा सकेंगे। सपरार, खपरार, लखेरी जैसे सूखे बांध भी भर जाएंगे। परियोजना के लिए मध्य प्रदेश के पन्ना में केन नदी पर दौधन बांध बनेगा। इससे 221 किलोमीटर लंबा लिंक चैनल निकलेगा। यह बरुआसागर के पास से बेतवा नदी को पानी उपलब्ध कराएगा। परियोजना के अंतर्गत बरियारपुर पिकप वीयर के डाउनस्ट्रीम में दो नए बैराज बनेंगे। यहां करीब 128 एमसीएम पानी का भंडारण होगा। अभियंताओं के मुताबिक बरियापुर पिकप वीयर, परीछा, वीयर, बरूआ सागर में बांध निर्माण एवं पुनस्थापना का कार्य होगा। झांसी को प्रेशराइज्ड पाइप सिस्टम एवं माइक्रो-इरीगेशन सिस्टम का फायदा मिलेगा। हमीरपुर स्थित मौदहा बांध को बेतवा लिंक नहर से जोड़कर बांध भरा जाएगा।
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झांसी में बनेगा केन-बेतवा लिंक परियोजना का मुख्यालय
- सीईओ समेत तैनात होंगे पांच अपर सीईओ
- 44 हजार करोड़ की लागत की परियोजना दूर करेगी बुंदेलखंड का सूखा
- पहली बार आपस में जोड़ी जाएंगी दो नदियां
अमर उजाला ब्यूरो
झांसी। केंद्रीय कैबिनेट से मंजूरी के साथ ही केन-बेतवा लिंक परियोजना का मुख्यालय झांसी में बनना तय हो गया। परियोजना को अमली जामा पहनाने के लिए स्पेशल व्हीकल परपज (एसपीवी) गठित होगा। इसकी कमान मुख्य कार्यपालक अधिकारी के पास होगी। इस पद पर केंद्र सरकार के अपर सचिव रैंक के अधिकारी तैनात होगा। इनकी मदद के लिए पांच अलग-अलग अपर मुख्य कार्यपालक अधिकारी भी तैनात होंगे।
इस लिंक परियोजना का काम शुरू होने पर झांसी में प्रदेश स्तरीय एक नया कार्यालय खुल जाएगा। यहां करीब 200 अधिकारी एवं कर्मचारी तैनात किए जाएंगे। परियोजना को वर्ष 2030 तक पूरा किए जाने का लक्ष्य है। करीब 44 हजार करोड़ की भारी-भरकम परियोजना को अमली जामा पहनाने की खातिर उप्र एवं मप्र में अलग-अलग कार्यालय बनेंगे। उप्र इलाके की परियोजना नियंत्रित करने के लिए झांसी में मुख्यालय बनेगा। यहां सीईओ के साथ ही पांच अपर सीईओ तैनात होंगे। इनमें अपर सीईओ (प्लानिंग), अपर सीईओ (नहर परियोजना), सीईओ (पर्यावरण एवं भूमि अधिग्रहण), अपर सीईओ (इलेक्ट्रिक एवं मैकेनिकल), अपर सीईओ (मानव संसाधन) एवं निदेशक वित्त के पद होंगे। इनकी तैनाती के साथ ही यहां बड़ी संख्या में सहायक अभियंता एवं जूनियर अभियंताओं की तैनाती होगी। परियोजना में बरुआसागर के पास केन नदी को मिलाया जाएगा। यहां से इसे बेतवा नदी से जोड़ा जाएगा। एक्सईएन राघवेंद्र कुमार गुप्ता के मुताबिक एसपीवी का स्वरुप तय हो गया है। जल्द ही इसका भी गठन हो जाएगा। प्रोजेक्ट पर केंद्र सरकार 90 प्रतिशत धनराशि खर्च करेगी जबकि दोनों प्रदेशों को कुल दस प्रतिशत धनराशि वहन करनी होगी।
जमीन में उतरने में लग गए 19 बरस
- 2006 में झांसी में खुला था पहला कार्यालय
जल बंटवारे के विवाद के चलते उलझी रही योजना
बुंदेलखंड को दो नदियों को जोड़कर इस पूरे इलाके का सूखा दूर करने में गेम चेंजर माने जाने वाली इस परियोजना की पहली बार रूपरेखा तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी
के कार्यकाल के दौरान वर्ष 2002 में तैयार हुई थी। वर्ष 2005, अगस्त में उप्र एवं मप्र के बीच पानी बंटवारे का शुरूआती समझौता हुआ लेकिन, काफी समय तक परियोजना ठंडे बस्ते में रही। वर्ष 2006 में पहली बार परियोजना के सर्वे के लिए झांसी में राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण का गठन हुआ। उसके बाद तत्कालीन जल संसाधन मंत्री उमा भारती एवं मप्र मुख्यमंत्री शिवराज चौहान के बीच चल रहे शीत युद्घ के चलते परियोजना फाइलों से नहीं निकल सकी। वर्ष 2019 में उप्र एवं मप्र सरकार के बीच बात दुबारा शुरू हुई लेकिन, मामला जल बंटवारे में उलझ गया। मप्र जहां पूरे साल का पानी एक साथ उप्र को देने की बात कह रहा था वहीं, उप्र फसली सीजन के मुताबिक पानी मांग रहा था। उप्र का कहना था कि मानसून के बाद भी 750 मिलियन क्यूबिक मीटर(एमसीएम) पानी की आवश्यकता है जबकि मप्र पूरे साल में 700 एमसीएम से अधिक पानी देने को राजी नहीं था। इसको लेकर करीब डेढ़ साल तक गतिरोध बना रहा। आखिरकार इस वर्ष की शुरुआत में केंद्र सरकार की मध्यस्थता के बाद मप्र अफसर फसली सीजन के मुताबिक पानी देने को राजी हो गए।
सर्वे पर ही खर्च हो गए 150 करोड़
केन-बेतवा परियोजना की पूरी सर्वे रिपोर्ट करने में करीब 150 करोड़ रुपये का खर्चा आया है। झांसी स्थित कार्यालय से वर्ष 2006 से यह कार्य लगातार चल रहा था। उसके बाद से अब तक यहां छह एक्सईएन तैनात रह चुके। सबसे पहले वर्ष 2006 में पीके मिश्र, डीके शर्मा, पीवी रामाराजू, डीके शर्मा, एके मधोक, डीके गोयल, सीपीएन सेंगर एवं अब राघवेंद्र कुमार गुप्ता की तैनाती रही। मंजूरी मिलने के बाद बृहस्पतिवार को प्रोजेक्ट के मॉडल की धूल साफ करके उसे चमकाया गया। अभियंताओं का कहना है कि इसे फिर से क्रियाशील किया जाएगा।
सिंचाई को मिलने वाला पानी
झांसी 17488 हे.
ललितपुर 3533 हे.
महोबा 37564 हे.
बांदा 192479 हे.
::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::
मिलने वाला पेयजल (एमसीएम में)
झांसी 14.66
ललितपुर 31.98
महोबा 20.13
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परियोजना से जुड़े अभियंताओं का कहना है इसकी मदद से झांसी का 17488 हेक्टयर कृषि रकबा एवं ललितपुर का 3533 हेक्टयर रकबा सिचिंत होगा। बांदा की पौने दो लाख हे.जमीन सिचिंत होगी। कुल करीब 2.51 लाख हे. जमीन सिचिंत हो सकेगी। इसके अलावा झांसी, ललितपुर, महोबा, एवं हमीरपुर में 67 एमसीएम (मिलियन क्यूबिक मीटर) पीने का पानी भी उपलब्ध कराया जाएगा।
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केन-बेतवा लिंक नहर से झांसी के सभी नहर, तालाब एवं डैम भी भरे जा सकेंगे। सपरार, खपरार, लखेरी जैसे सूखे बांध भी भर जाएंगे। परियोजना के लिए मध्य प्रदेश के पन्ना में केन नदी पर दौधन बांध बनेगा। इससे 221 किलोमीटर लंबा लिंक चैनल निकलेगा। यह बरुआसागर के पास से बेतवा नदी को पानी उपलब्ध कराएगा। परियोजना के अंतर्गत बरियारपुर पिकप वीयर के डाउनस्ट्रीम में दो नए बैराज बनेंगे। यहां करीब 128 एमसीएम पानी का भंडारण होगा। अभियंताओं के मुताबिक बरियापुर पिकप वीयर, परीछा, वीयर, बरूआ सागर में बांध निर्माण एवं पुनस्थापना का कार्य होगा। झांसी को प्रेशराइज्ड पाइप सिस्टम एवं माइक्रो-इरीगेशन सिस्टम का फायदा मिलेगा। हमीरपुर स्थित मौदहा बांध को बेतवा लिंक नहर से जोड़कर बांध भरा जाएगा।
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झांसी में बनेगा केन-बेतवा लिंक परियोजना का मुख्यालय
- सीईओ समेत तैनात होंगे पांच अपर सीईओ
- 44 हजार करोड़ की लागत की परियोजना दूर करेगी बुंदेलखंड का सूखा
- पहली बार आपस में जोड़ी जाएंगी दो नदियां
अमर उजाला ब्यूरो
झांसी। केंद्रीय कैबिनेट से मंजूरी के साथ ही केन-बेतवा लिंक परियोजना का मुख्यालय झांसी में बनना तय हो गया। परियोजना को अमली जामा पहनाने के लिए स्पेशल व्हीकल परपज (एसपीवी) गठित होगा। इसकी कमान मुख्य कार्यपालक अधिकारी के पास होगी। इस पद पर केंद्र सरकार के अपर सचिव रैंक के अधिकारी तैनात होगा। इनकी मदद के लिए पांच अलग-अलग अपर मुख्य कार्यपालक अधिकारी भी तैनात होंगे।
इस लिंक परियोजना का काम शुरू होने पर झांसी में प्रदेश स्तरीय एक नया कार्यालय खुल जाएगा। यहां करीब 200 अधिकारी एवं कर्मचारी तैनात किए जाएंगे। परियोजना को वर्ष 2030 तक पूरा किए जाने का लक्ष्य है। करीब 44 हजार करोड़ की भारी-भरकम परियोजना को अमली जामा पहनाने की खातिर उप्र एवं मप्र में अलग-अलग कार्यालय बनेंगे। उप्र इलाके की परियोजना नियंत्रित करने के लिए झांसी में मुख्यालय बनेगा। यहां सीईओ के साथ ही पांच अपर सीईओ तैनात होंगे। इनमें अपर सीईओ (प्लानिंग), अपर सीईओ (नहर परियोजना), सीईओ (पर्यावरण एवं भूमि अधिग्रहण), अपर सीईओ (इलेक्ट्रिक एवं मैकेनिकल), अपर सीईओ (मानव संसाधन) एवं निदेशक वित्त के पद होंगे। इनकी तैनाती के साथ ही यहां बड़ी संख्या में सहायक अभियंता एवं जूनियर अभियंताओं की तैनाती होगी। परियोजना में बरुआसागर के पास केन नदी को मिलाया जाएगा। यहां से इसे बेतवा नदी से जोड़ा जाएगा। एक्सईएन राघवेंद्र कुमार गुप्ता के मुताबिक एसपीवी का स्वरुप तय हो गया है। जल्द ही इसका भी गठन हो जाएगा। प्रोजेक्ट पर केंद्र सरकार 90 प्रतिशत धनराशि खर्च करेगी जबकि दोनों प्रदेशों को कुल दस प्रतिशत धनराशि वहन करनी होगी।
जमीन में उतरने में लग गए 19 बरस
- 2006 में झांसी में खुला था पहला कार्यालय
जल बंटवारे के विवाद के चलते उलझी रही योजना
बुंदेलखंड को दो नदियों को जोड़कर इस पूरे इलाके का सूखा दूर करने में गेम चेंजर माने जाने वाली इस परियोजना की पहली बार रूपरेखा तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी
के कार्यकाल के दौरान वर्ष 2002 में तैयार हुई थी। वर्ष 2005, अगस्त में उप्र एवं मप्र के बीच पानी बंटवारे का शुरूआती समझौता हुआ लेकिन, काफी समय तक परियोजना ठंडे बस्ते में रही। वर्ष 2006 में पहली बार परियोजना के सर्वे के लिए झांसी में राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण का गठन हुआ। उसके बाद तत्कालीन जल संसाधन मंत्री उमा भारती एवं मप्र मुख्यमंत्री शिवराज चौहान के बीच चल रहे शीत युद्घ के चलते परियोजना फाइलों से नहीं निकल सकी। वर्ष 2019 में उप्र एवं मप्र सरकार के बीच बात दुबारा शुरू हुई लेकिन, मामला जल बंटवारे में उलझ गया। मप्र जहां पूरे साल का पानी एक साथ उप्र को देने की बात कह रहा था वहीं, उप्र फसली सीजन के मुताबिक पानी मांग रहा था। उप्र का कहना था कि मानसून के बाद भी 750 मिलियन क्यूबिक मीटर(एमसीएम) पानी की आवश्यकता है जबकि मप्र पूरे साल में 700 एमसीएम से अधिक पानी देने को राजी नहीं था। इसको लेकर करीब डेढ़ साल तक गतिरोध बना रहा। आखिरकार इस वर्ष की शुरुआत में केंद्र सरकार की मध्यस्थता के बाद मप्र अफसर फसली सीजन के मुताबिक पानी देने को राजी हो गए।
सर्वे पर ही खर्च हो गए 150 करोड़
केन-बेतवा परियोजना की पूरी सर्वे रिपोर्ट करने में करीब 150 करोड़ रुपये का खर्चा आया है। झांसी स्थित कार्यालय से वर्ष 2006 से यह कार्य लगातार चल रहा था। उसके बाद से अब तक यहां छह एक्सईएन तैनात रह चुके। सबसे पहले वर्ष 2006 में पीके मिश्र, डीके शर्मा, पीवी रामाराजू, डीके शर्मा, एके मधोक, डीके गोयल, सीपीएन सेंगर एवं अब राघवेंद्र कुमार गुप्ता की तैनाती रही। मंजूरी मिलने के बाद बृहस्पतिवार को प्रोजेक्ट के मॉडल की धूल साफ करके उसे चमकाया गया। अभियंताओं का कहना है कि इसे फिर से क्रियाशील किया जाएगा।
सिंचाई को मिलने वाला पानी
झांसी 17488 हे.
ललितपुर 3533 हे.
महोबा 37564 हे.
बांदा 192479 हे.
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मिलने वाला पेयजल (एमसीएम में)
झांसी 14.66
ललितपुर 31.98
महोबा 20.13