झांसी ऐसा भाया, यहीं आशियाना बनाया, देश, प्रदेश के कई इलाकों से आए लोग यहीं के होकर रह गए
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झांसी की पहली पहचान वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई के नाम से होती है। उनके पूर्वज महाराष्ट्र से झांसी आए थे और यहीं के होकर रह गए। हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद की पहचान भी झांसी के लाल के रूप में हैं। उनके पिता प्रयागराज के रहने वाले थे और स्थानांतरण होने पर झांसी आए थे और फिर यहीं के होकर रह गए। झांसी के प्रति लगाव का ये सिलसिला अब भी बदस्तूर जारी है। रेलवे, सेना, बीएचईएल, बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज, पारीछा थर्मल पावर समेत अन्य महकमों में नौकरी करने आए तमाम लोग यहीं के होकर रह गए।
ललितपुर रोड की तमाम कॉलोनियों में बीएचईएल और सेना से रिटायर लोग रह रहे हैं, तो सीपरी बाजार और प्रेमनगर में बाहर से आए रेलवे कर्मचारियों की भरमार है। जबकि, कानपुर मार्ग पर विश्वविद्यालय और मेडिकल कॉलेज के कर्मचारियों ने अपना आशियाना बना रखा है। इसके अलावा भी शहर के कई हिस्सों में प्रदेश व देश के अलग-अलग हिस्सों से आने वाले लोग स्थायी रूप से रह रहे हैं।
झांसी की ये खूबियां आईं पसंद
- बड़े शहरों जैसी खूबियां और छोटे शहरों जैसा आराम
- सड़क व रेल मार्ग से देश के किसी भी हिस्से में जाने की सुविधा
- आबादी का घनत्व कम और खुला - खुला वातावरण
- मेडिकल, इंजीनियरिंग व अन्य उच्च स्तरीय शिक्षा की सुविधा
- लोगों का शांतिप्रिय स्वभाव, दंगे - फसाद जैसी कभी स्थिति नहीं बनी
- स्थानीय लोगों की आसानी से बाहरियों को अपनाने की प्रवृत्ति
- हरा-भरा और साफ सुथरा वातावरण
- आसपास देहात होने की वजह से गुणवत्तायुक्त दूध, सब्जियों की उपलब्धता
- प्रदेश के अन्य शहरों की तुलना में कम अपराध
- छोटे-बड़े कारोबार और नौकरियों की वजह से रोजगार की संभावनाएं
- खेल के अच्छे मैदान और प्रशिक्षण की भी व्यवस्था
- चौड़ी सड़कों पर वाहनों का कम दबाव, जाम का झंझट कम
- आसपास पर्यटन स्थलों की भरमार, जगह-जगह हरे-भरे पार्क
- बारिश में जल भराव की स्थिति नहीं, अपने आप सड़कों से साफ हो जाता है पानी
- कम प्रदूषण की वजह से मिलती है शुद्ध हवा
मूलत: रहने वाली पौड़ी गढ़वाल के हैं। सेना में रहते हुए कई स्थानों पर स्थानांतरण हुआ। लेकिन, स्थायी निवास बनाने के लिए सबसे मुफीद झांसी ही लगा, सो यहीं के होकर रह गए। न प्रदूषण है और न जाम का झंझट, सबकुछ आसानी से उपलब्ध है। इससे बेहतर शहर और कोई नहीं।
- विजय राज सिंह, रिटायर्ड कर्नल (रामनाथ सिटी)
कानपुर देहात के रहने वाले हैं। पुलिस की लंबी नौकरी में रहते हुए प्रदेश के कई शहरों में जाने और रहने का मौका मिला। लेकिन, इन सब में झांसी ही मन को भाया। केवल मुझे ही नहीं, बल्कि पूरे परिवार को ये अच्छा लगा। यहीं घर बना लिया है और अब यहीं के होकर रह गए हैं।
- कल्याण सिंह, सेवानिवृत्त क्षेत्राधिकारी पुलिस (सनफ्रान अशोक वैली)
प्रयागराज के रहने वाले हैं। 1998 में झांसी आए थे। इसके बाद कई जगह ट्रांसफर हुआ, लेकिन परिवार को यहीं रखा। यहीं बच्चों की शिक्षा हुई। मकान भी यहीं बना लिया। ये शहर हर किसी को आत्मसात कर लेता है। झांसी छोड़कर अब कहीं जाने का मन नहीं है।
- डा. एसके दुबे, पुरातत्व अधिकारी (केके पुरी कॉलोनी)
मध्य प्रदेश के पृथ्वीपुर के रहने वाले हैं। झांसी पोस्टिंग होने के बाद यहां रहने को मिला। यहां सबकुछ अच्छा लगा। यहीं जमीन खरीद ली और मकान बना लिया। सड़क, रेल मार्ग से झांसी की पूरे देश से अच्छी कनेक्टिविटी है। मेडिकल की भी बड़े महानगरों जैसी सुविधाएं हैं।
- जेपी शर्मा, रिटायर्ड कर्नल (बजरंग कॉलोनी)
शिक्षा विभाग की नौकरी में रहते हुए झांसी आए थे, वैसे रहने वाले जालौन जिले के हैं। झांसी में देश के बड़े महानगरों जैसी सभी सुविधाएं हैं और छोटे शहरों जैसा आराम है। शांत वातावरण और आपसी में घुलेमिले रहने वाले लोग है। ऐसे में हर कोई यहां रहना चाहेगा।
- बीपी दोहरे, सेवानिवृत्त शिक्षाधिकारी (खातीबाबा)
कानपुर नगर के रहने वाले हैं। फायर सर्विस में रहते हुए प्रदेश के कई शहरों में जाने का मौका मिला, लेकिन अंत में झांसी ही मन को भाया। यहीं घर बना लिया है और रिटायर होने के बाद स्कूल का भी संचालन कर रहे हैं। यहां आने वाले नाते - रिश्तेदारों को भी झांसी खूब भाता है।
- महावीर सिंह, सेवानिवृत्त अग्निशमन अधिकारी (सीपरी बाजार, साहनी विहार)