{"_id":"635c192680793307282f4d64","slug":"jani-we-were-the-levers-of-the-british-era-jhansi-news-jhs231739276","type":"story","status":"publish","title_hn":"मैनुअल सिग्नल की विदाई, मंडल के आखिरी स्टेशन","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
मैनुअल सिग्नल की विदाई, मंडल के आखिरी स्टेशन
विज्ञापन
झांसी। अंग्रेजों के जमाने से लीवर खींचकर रेल लाइन बदलने का तरीका अब गुजरे जमाने की बात हो गई है। शुक्रवार को मंडल के आखिरी स्टेशन में इलेक्ट्रानिक इंटरलॉकिंग का काम पूरा कर लिया गया। इसकी मदद से अब न सिर्फ बिना लीवर खींचे आसानी से पटरी बदली जा सकेगी बल्कि गड़बड़ी की गुंजाइश भी बेहद कम हो जाएगी। रेल अफसरों के मुताबिक इसका संचालन आरंभ कर दिया गया है।
रेलवे में लाइन बदलने का काम लोको पायलट के हाथ में नहीं होता है। पटरियां सेट करने का काम प्वाइंट्स मैन करते हैं। जिस रूट पर सिग्नल क्लियर रहता है, उसी रूट पर ट्रेन को आगे भेजा जाता है। इसका निर्धारण मास्टर केबिन में लगे डोमिनो पैनल्स केे माध्यम से होता है। रूट निर्धारित होेने के बाद इसका संदेश प्वाइंट्स मैन के पास भेजा जाता है। यहां वह लीवर खींचकर गाड़ी को निर्धारित ट्रैक पर भेजता है। इस काम में तीन लोगों की ड्यूटी लगती थी।
अंग्रेजों के जमाने की यह विधि अभी पूरे उत्तर मध्य रेलवे केे झांसी डिवीजन में सिर्फ भरुआ सुमेरपुर स्टेशन पर ही काम कर रही थी लेकिन, शुक्रवार को यहां भी इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग का काम पूरा कर लिया गया। अब यहां बिना लीवर खींचे सिर्फ एक बटन दबाकर यह काम किया जा सकेगा।
विज्ञापन
रेल अफसरों का कहना है पुराने इलेक्ट्रो मैकेनिकल इंस्टॉलेशन के बदले में नई विधि से सुरक्षा भी हो सकेगी। इसकी मदद से मैनुअल तरीके से होने वाली गड़बड़ी खत्म हो सकेगी। डीआरएम आशुतोष के मुुताबिक इस खंड में यह काम पूरा होने से पूरा एनसीआर जोन भी अब पूरी तरह मैकेनिकल इंटरलॉकिंग रहित हो गया।
रेल अफसरों की टीम ने लिया जायजा
झांसी। इस स्टेशन पर इलेक्ट्रानिक इंटरलॉकिंग का काम पिछले करीब एक साल से चल रहा था। इसके पूरा होने पर रेल अफसरों ने जायजा भी लिया। इस दौरान वरिष्ठ मंडल सिग्नल एवं टेलीकॉम अभियंता अमित गोयल, वरिष्ठ मंडल सिग्नल अभियंता रश्मि गौतम समेत अन्य शामिल रहे।
विज्ञापन
रेलवे में लाइन बदलने का काम लोको पायलट के हाथ में नहीं होता है। पटरियां सेट करने का काम प्वाइंट्स मैन करते हैं। जिस रूट पर सिग्नल क्लियर रहता है, उसी रूट पर ट्रेन को आगे भेजा जाता है। इसका निर्धारण मास्टर केबिन में लगे डोमिनो पैनल्स केे माध्यम से होता है। रूट निर्धारित होेने के बाद इसका संदेश प्वाइंट्स मैन के पास भेजा जाता है। यहां वह लीवर खींचकर गाड़ी को निर्धारित ट्रैक पर भेजता है। इस काम में तीन लोगों की ड्यूटी लगती थी।
विज्ञापन
अंग्रेजों के जमाने की यह विधि अभी पूरे उत्तर मध्य रेलवे केे झांसी डिवीजन में सिर्फ भरुआ सुमेरपुर स्टेशन पर ही काम कर रही थी लेकिन, शुक्रवार को यहां भी इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग का काम पूरा कर लिया गया। अब यहां बिना लीवर खींचे सिर्फ एक बटन दबाकर यह काम किया जा सकेगा।
विज्ञापन
रेल अफसरों का कहना है पुराने इलेक्ट्रो मैकेनिकल इंस्टॉलेशन के बदले में नई विधि से सुरक्षा भी हो सकेगी। इसकी मदद से मैनुअल तरीके से होने वाली गड़बड़ी खत्म हो सकेगी। डीआरएम आशुतोष के मुुताबिक इस खंड में यह काम पूरा होने से पूरा एनसीआर जोन भी अब पूरी तरह मैकेनिकल इंटरलॉकिंग रहित हो गया।
रेल अफसरों की टीम ने लिया जायजा
झांसी। इस स्टेशन पर इलेक्ट्रानिक इंटरलॉकिंग का काम पिछले करीब एक साल से चल रहा था। इसके पूरा होने पर रेल अफसरों ने जायजा भी लिया। इस दौरान वरिष्ठ मंडल सिग्नल एवं टेलीकॉम अभियंता अमित गोयल, वरिष्ठ मंडल सिग्नल अभियंता रश्मि गौतम समेत अन्य शामिल रहे।