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पांचों बच्चों को पीएचडी कराई
अमर उजाला ब्यूरो/झांसी
Updated Mon, 05 Sep 2016 01:02 AM IST
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पांचों बच्चों को पीएचडी कराई
- फोटो : demo pic
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झांसी। बरुआसागर के पं. रामसहाय शर्मा इंटर कालेज से सहायक लिपिक पद से सेवानिवृत्त भगवान दास अहिरवार ने वह कर दिखाया, जिसकी तमन्ना हर कोई करता है। हर व्यक्ति चाहता है कि उसके बच्चे उच्च शिक्षा हासिल कर ऊंचे मुकाम पर पहुंचे, परंतु इसमें कभी पैसा बाधा बन जाता है, तो कभी पारिवारिक परिस्थितियां जकड़ लेती हैं। लेकिन, भगवानदास के दृढ़ संकल्प के आगे सभी अड़चनें बौनी साबित हुईं। अल्प आय में उन्होंने अपने पांचों बच्चों को पीएचडी कराई। सभी बच्चे देश विदेश के बड़े-बड़े संस्थानों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। उनकी इसी उपलब्धि पर अभी हाल ही में उनका नाम लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज किया गया है।
शिवाजी नगर निवासी भगवानदास स्वयं इंटरमीडिएट तक पढ़े हैं। जबकि, उनकी पत्नी रेखा हाईस्कूल फेल हैं। उनके पुत्र डा. मुकेश कुमार, पुत्री डा. रागिनी व डा. मोहिनी ने बुंदेलखंड विश्वविद्यालय से पीएचडी की डिग्री हासिल की। जबकि, डा. अनिल कुमार को जेएनयू दिल्ली व डा. सोहिनी को आईआईटी रुड़की ने पीएचडी की डिग्री दी। डा. मोहिनी सिंगापुर के वन विभाग में कार्यरत हैं। जबकि, अन्य सभी बच्चे देश के अन्य संस्थानों में उच्च पदों पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। भगवानदास कहते हैं कि तनख्वाह के अलावा उनके पास आमदनी का कभी कोई अन्य स्रोत नहीं रहा। परिवार भी बढ़ा था, लेकिन मन का संकल्प ऊंचा था। बाधाएं अपने आप हटती चली गईं। शुरुआत में परेशानी आई, परंतु बाद में बच्चों ने ही उनके संकल्प को संबल प्रदान किया। बच्चे अपनी पढ़ाई का खर्च ट्यूशन पढ़ाकर चलाते रहे। सभी बच्चे एक-दूसरे की प्रेरणा बनते रहे और आगे बढ़ते रहे।
पिता के दोस्त की बात छू गई मन को
भगवान दास अहिरवार ने बताया कि सन 1975 में वह डा. भीमराव अंबेडकर जयंती समारोह में शामिल हुए थे। इसी दरम्यान समारोह में उनके पिता के शिक्षक दोस्त चतुर्वेदी जी पहुंचे। उन्होंने वहां मौजूद लोगों को संदेश देते हुए कहा कि डा. अंबेडकर के प्रति सच्चा सम्मान उनके आदर्शों पर चलना होगा। बस उसी दिन से उन्होंने संकल्प ले लिया कि वह अपने बच्चों को बाबा साहब की तरह उच्च शिक्षित बनाएंगे।
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... ताकि दूसरे भी लें पढ़ाई की प्रेरणा
समाज व देश की प्रगति के लिए सभी का शिक्षित होना जरूरी है। शिक्षा ही किसी भी साधारण से व्यक्ति को उच्च मुकाम पर पहुंचा सकती है। विपरीत परिस्थितियों में भी सभी अपने बच्चों को ज्यादा से ज्यादा पढ़ाएं। लोगों को यही संदेश देने भर के लिए लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में नाम दर्ज कराया है।
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शिवाजी नगर निवासी भगवानदास स्वयं इंटरमीडिएट तक पढ़े हैं। जबकि, उनकी पत्नी रेखा हाईस्कूल फेल हैं। उनके पुत्र डा. मुकेश कुमार, पुत्री डा. रागिनी व डा. मोहिनी ने बुंदेलखंड विश्वविद्यालय से पीएचडी की डिग्री हासिल की। जबकि, डा. अनिल कुमार को जेएनयू दिल्ली व डा. सोहिनी को आईआईटी रुड़की ने पीएचडी की डिग्री दी। डा. मोहिनी सिंगापुर के वन विभाग में कार्यरत हैं। जबकि, अन्य सभी बच्चे देश के अन्य संस्थानों में उच्च पदों पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। भगवानदास कहते हैं कि तनख्वाह के अलावा उनके पास आमदनी का कभी कोई अन्य स्रोत नहीं रहा। परिवार भी बढ़ा था, लेकिन मन का संकल्प ऊंचा था। बाधाएं अपने आप हटती चली गईं। शुरुआत में परेशानी आई, परंतु बाद में बच्चों ने ही उनके संकल्प को संबल प्रदान किया। बच्चे अपनी पढ़ाई का खर्च ट्यूशन पढ़ाकर चलाते रहे। सभी बच्चे एक-दूसरे की प्रेरणा बनते रहे और आगे बढ़ते रहे।
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पिता के दोस्त की बात छू गई मन को
भगवान दास अहिरवार ने बताया कि सन 1975 में वह डा. भीमराव अंबेडकर जयंती समारोह में शामिल हुए थे। इसी दरम्यान समारोह में उनके पिता के शिक्षक दोस्त चतुर्वेदी जी पहुंचे। उन्होंने वहां मौजूद लोगों को संदेश देते हुए कहा कि डा. अंबेडकर के प्रति सच्चा सम्मान उनके आदर्शों पर चलना होगा। बस उसी दिन से उन्होंने संकल्प ले लिया कि वह अपने बच्चों को बाबा साहब की तरह उच्च शिक्षित बनाएंगे।
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समाज व देश की प्रगति के लिए सभी का शिक्षित होना जरूरी है। शिक्षा ही किसी भी साधारण से व्यक्ति को उच्च मुकाम पर पहुंचा सकती है। विपरीत परिस्थितियों में भी सभी अपने बच्चों को ज्यादा से ज्यादा पढ़ाएं। लोगों को यही संदेश देने भर के लिए लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में नाम दर्ज कराया है।