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Jhansi News: हालातों से नहीं मानी हार... मेहनत के दम पर मुश्किलों को दे रहे मात

Mon, 25 Mar 2024 02:34 AM IST
झांसी ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, झांसी
संवाद न्यूज एजेंसी, झांसी Updated Mon, 25 Mar 2024 02:34 AM IST
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Didn't give up on the circumstances...defeated the difficulties on the basis of hard work.
- लक्ष्मी व्यायाम मंदिर में अभ्यास करके अपने खेल को निखार रहे खिलाड़ी
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संवाद न्यूज एजेंसी
झांसी। हाथों में हॉकी और मन में सपनों का बड़ा संसार। ख्वाहिश है कि एक बार फिर ओलंपिक तक पहुंचकर मेजर ध्यानचंद का नाम रोशन करें। इसके लिए वे पूरी जी जान से जुटे हैं। परिवार के हालात ऐसे नहीं हैं कि महंगी हॉकी और जूते खरीद सकें मगर उनकी मेहनत और लगन हर मुश्किल को मात दे रही है। वे रोज मैदान पर हॉकी लेकर पहुंचते हैं और अपने अभ्यास के जरिए खेल को निखारकर आगे बढ़ने की कोशिश में जुटे हैं। मध्यमवर्गीय परिवार से आने वाले इन हाॅकी खिलाड़ियाें की कहानी उन लोगों के लिए प्रेरणा है जो हालात के आगे हार मान जाते हैं। उनका कहना है कि कभी तो ऐसा दिन आएगा जब उनकी हॉकी से गोल पोस्ट में जाने वाली गेंद भारत और उनके जीवन को संवार देगी।
हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद की कर्मस्थली झांसी में हॉकी खिलाड़ियों की बड़ी फौज है। यहां के कई हॉकी खिलाड़ी विदेशों में अपने देश का नाम रोशन कर रहे हैं। वहीं यहां कई खिलाड़ी ऐसे भी हैं जिनके लिए हॉकी के लिए जरूरी सुविधाएं जुटाना सपने जैसा है। इनके पास न तो अच्छी हॉकी है और न ही पैर में जूते है और किट। मगर मन की लगन और मेहनत के दम पर वे अपने जुनून को पूरा कर रहे हैं। यह खिलाड़ी लक्ष्मी व्यायाम मंदिर के खेल मैदान में पहुंचकर घंटों अभ्यास करते हैं। उनका कहना है कि वे अपने जुनून के जरिए खेल को निखारकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलकर देश का नाम रोशन करना चाहते हैं।
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फोटो
पहाड़ी चिरगांव के रहने वाले यश पांचाल बताते हैं कि उसके पिता कारपेंटर का काम करते हैं और हॉकी खिलाड़ी बनने के लिए वह यहां अपनी नानी के घर रहकर खेल का अभ्यास करता है। कई प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया। अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी बनने का सपना है।
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हॉकी खिलाड़ी अभिषेक खटीक बताते हैं कि वो राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय हॉकी प्रतियोगिता में प्रतिभाग कर चुके हैं। उनके पिता रेलवे स्टेशन पर चाय वेंडर का काम करते हैं। इससे परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं रहती है। लेकिन फिर भी देश के लिए खेलना चाहते हैं और मेडल जीतना चाहते हैं।
मनीषा कुशवाहा हॉकी भी खिलाड़ी हैं। उनके पिता कैटरिंग का काम करते है। लेकिन इसके बाद भी वो हॉकी का अभ्यास करने आती हैं। वह राज्य स्तरीय हॉकी प्रतियाेगिता में खेल चुकी हैं। वो भारत के लिए खेलना चाहतीं हैं।

आकांक्षा परिहार के पिता ऑटो चलाते हैं। इससे पैसों की तंगी रहती है, इसलिए मां भी घर में सिलाई मशीन चलाकर कपड़े सिलती हैं। लेकिन वो मुझे खेलने के लिए प्रोत्साहित करती हैं। वो चाहती हैं की उनकी बेटी देश के लिए खेले और अपना नाम रोशन करें।
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