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व्यवसाय बदल रहे आढ़तिया, पलायन कर रहे पल्लेदार

Tue, 07 Jun 2016 01:42 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो Updated Tue, 07 Jun 2016 01:42 AM IST
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change work dealer, forgainig in laborour
dry pond - फोटो : amar ujala
झांसी। बुंदेलखंड में पिछले दो वर्ष से पड़ रहे सूखे ने महानगर की गल्ला मंडी के आढ़तियों की भी आर्थिक रूप से कमर तोड़ दी है। कभी मंडी में मूंगफली और दलहन के उत्पादों की प्रतिदिन आवक लगभग 20 से 25 हजार क्विंटल होती थी, लेकिन आज यह घटकर करीब एक हजार क्विंटल रह गई है। ऐेसे में कई आढ़तियों ने दूसरा व्यवसाय अपना लिया है। वहीं, मंडी में कार्यरत अधिकांश पल्लेदार भी पलायन कर चुके हैं।
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मध्यप्रदेश की सीमाओं से घिरा जनपद सदैव ही मूंगफली और दलहनी फसलों चना, मूंग, उड़द, मसूर के उत्पादन के लिए पहचाना जाता रहा है। महानगर की मंडी में न सिर्फ जिले के बल्कि मध्य प्रदेश के भी किसान अपने उत्पाद लाते हैं, लेकिन सीजन एवं आफ सीजन में हर वक्त गुलजार रहने वाली मंडी को पिछले दो वर्ष के सूखे ने काफी बड़ा झटका दिया है।
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आढ़ती रामेश्वर राय के मुताबिक बीते दो वर्ष पूर्व गुरसरांय, तालबेहट आदि क्षेत्रों से पांच हजार क्विंटल मूंगफली और लगभग पांच हजार क्विंटल दलहन रोजाना आता था। लेकिन, इस बार पूरी मंडी में डेढ़ से दो सौ क्विंटल की आवक है, यह भी मध्यप्रदेश के पिछोर, खनियाधाना, शिवपुरी से आ रही है। ऐसे में आढ़तियों के समक्ष आर्थिक संकट है। आढ़ती अशोक कुमार के अनुसार झांसी मंडी की पहचान मूंगफली को लेकर है, लेकिन सूखे से यह फसल बुरी तरह से प्रभावित हुई है।
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गत वर्ष की तुलना में इस वर्ष मूंगफली की आवक में लगभग तीन लाख क्विंटल की कमी आई है। पूर्व में लगभग 25 हजार बोरा प्रतिदिन मूंगफली मंडी में आती थी, लेकिन इस बार सीजन में रोजाना पांच हजार बोरे भी नहीं आए। इनके अनुसार झांसी की मंडी मध्यप्रदेश पर निर्भर हो गई है, ऐसे में कई आढ़तियों ने दूसरे व्यवसाय की ओर रुख कर लिया है। जबकि, पल्लेदार पलायन करने को मजबूर हैं।
--बाक्स--
ग्राम व्यापारी आते हैं ज्यादा
महानगर की गल्ला मंडी ए क्लास की मानी जाती है। कृषि उत्पादन समिति के मुताबिक इस मंडी में किसानों से ज्यादा ग्रामीण व्यापारी आते हैं, जो गांव में कृषकों से उत्पाद खरीद कर लाते हैं। वहीं, मऊरानीपुर, गुरसरांय, चिरगांव, मोंठ की मंडियां सी क्लास की हैं, जहां छोटे-छोटे किसान माल लाते हैं।

पल्लेदार भी पलायन क ो मजबूर
सूखे ने किसान, आढ़तियों के अलावा पल्लेदारों को भी पलायन करने पर मजबूर कर दिया है। पल्लेदार बाबूलाल के मुताबिक सिर्फ दो वर्ष पूर्व ही एक आढ़त पर लगभग 10 लोग काम करते थे, चैत्र माह में पानी पीने की भी फुर्सत नहीं होती थी, लेकिन वर्तमान में प्रत्येक आढ़त पर सिर्फ दो से तीन पल्लेदार ही शेष रह गए हैं।


मसूर हाथरस तो उड़द जाती है महाराष्ट्र
महानगर की मंडी से मसूर हाथरस व बरेली, उड़द महाराष्ट्र व कानपुर जाती है। वहीं, मूंगफली भी राजस्थान सहित कई अन्य क्षेत्रों में जाती है। लेकिन, अरहर की पैदावर बुंदेलखंड में नहीं होने से इसकी आवक मंडी में ज्यादा नहीं है।
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