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नृत्य कला की विविधता से समृद्ध है बुंदेलखंड
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 29 Apr 2016 01:36 AM IST
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bundelkhand, jhandi hindi news
- फोटो : amar ujala
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झांसी। बुंदेलखंड की लोक नृत्य कला शैली खासी समृद्ध है। यहां के राई व सेरा नृत्य ने दुनिया के कई देशों में अपनी पहचान बनाई है। इसके अलावा भी क्षेत्र में कई लोक नृत्य प्रचलित हैं, जो विभिन्न समाजों का प्रतिनिधित्व भी करते हैं। यह यहां के ग्रामीण क्षेत्रों में विवाह व त्योहारों के अवसर पर देखने को मिल जाते हैं।
बुंदेली नृत्य कला शैली को सबसे ज्यादा संरक्षण मराठा काल में मिला। नृत्य-संगीत के शौकीन राजा गंगाधर राव ने कला व कलाकारों को विशेष प्रोत्साहन दिया। इसके लिए उन्होंने नृत्य शालाओं की स्थापना कराई, जिनके अस्तित्व अब भी किले व राजा रघुनाथ राव महल में मौजूद हैं। इतना ही नहीं, राजा गंगाधर राव ने नृत्यों के प्रशिक्षण देने की व्यवस्था भी कराई थी।
इसके अलावा बुंदेलखंड की प्राचीन कला संस्कृति को भावी पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए भी गंगाधर राव ने महत्वपूर्ण कदम उठाए थे। इसके लिए उन्होंने नृत्य कला से जुड़े कलाकारों के इतिहास व कला की बारीकियों का संग्रह तैयार कराया था। लेकिन, 1857 के गदर में फिरंगियों ने इसे फूंक दिया गया था। अब इसका अस्तित्व भी बाकी नहीं है।
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बुंदेली संस्कृति के जानकार हरगोविंद कुशवाहा ने बताया कि प्राचीन काल से ही बुंदेलखंड की नृत्य संस्कृति खासी समृद्ध रही है। इसके संरक्षण में राजा गंगाधर राव का अहम योगदान रहा है।
मूर्तियों में भी है नृत्य कला का विकास
बुंदेलखंड की समृद्ध नृत्य कला शैली यहां की प्राचीन मूर्तियों में भी नजर आती है। राजकीय संग्रहालय में 10वीं शताब्दी की सीरोन खुर्द ललितपुर से प्राप्त चौदह भुजी गणेश की एक पैर पर नृत्य करती प्रतिमा सन 1986 में पेरिस में आयोजित भारत महोत्सव में शामिल हुई थी। प्रतिमा के दोनों ओर संगीतज्ञों की लघु प्रतिमाएं बांसुरी, तबला आदि वाद्य बजा रहे हैं। इसके अलावा 10वीं शताब्दी की ही 16 भुजी गणेश प्रतिमा एवं मृदंग पर नृत्य करती नृत्यांगना की मूर्ति भी विशेष है।
नगर की कत्थक नृत्यांगनाओं ने देश में कमाया नाम
उत्तर भारत के प्रमुख नृत्य कत्थक में नगर क ी नृत्यांगनाएं राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुकी हैं। इनमें आरती मुखर्जी, करुणा एवं मोहिनी के नाम प्रमुख हैं। प्रभु श्री राम लाल संगीत महाविद्यालय के प्राचार्य कृष्ण कांत झा के मुताबिक इन नृत्यांगनाओं ने दिल्ली में आयोजित भारत सेवक समाज के सातवें अधिवेशन में प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू, गुलजारी नंदा एवं लाल बहादुर शास्त्री की उपस्थिति कत्थक नृत्य की प्रस्तुति की थी, जिसे खूब सराहा गया था।
बुंदेलखंड के यह हैं प्रमुख नृत्य
- राई नृत्य - इस नृत्य ने सर्वाधिक लोकप्रियता हासिल की है। इसमें बुंदेली लोक कवि ईसुरी, गंगाधर व्यास आदि की फागों पर महिलाएं 72 गज का लहंगा पहनकर नृत्य करती हैं। राई नृत्य में कलाकार चंदा देवी का नाम अहम है। इस नृत्य को राई दामोदर नृत्य भी कहते है, जो भगवान कृष्ण एवं राधा से जोड़ा जाता है।
- सेरा नृत्य - यह राई नृत्य से मिलता जुलता है। यह नृत्य रबी एवं खरीफ की बुआई के समय किया जाता है।
- ढिमरयाई नृत्य - यह ढीमर समाज का नृत्य है। यह बुंदेली वाद्य यंत्र खंजडी, चमीटा, लोटा, घड़ा व ढपली की धुन पर किया जाता है।
- कछियाई नृत्य - यह कुशवाहा समाज के लोग झींगा, मंजीरा, सारंगी, अलगोजा वाद्य यंत्र पर करते हैं।
- मोनिया नृत्य - यह गोपालक समाज द्वारा मौन व्रत धारण का हाथों में लाठी लेकर किया जाता है।
यह भी हैं लोकप्रिय
झांसी। बुंदेलखंड में जुलाहा समाज द्वारा किया जाने वाला कबीर पंथी नृत्य, शादी में बारात जाने के बाद महिलाओं द्वारा किया जाने वाला जुगिया नृत्य, नवरात्र में जवारों की बुवाई पर होने वाला जवारा नृत्य, धोबी समाज के रावला नृत्य के साथ ढोला मारू नृत्य, दिलदिल घोडी नृत्य, सपेरा नृत्य आदि भी क्षेत्र में लोकप्रिय हैं।
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बुंदेली नृत्य कला शैली को सबसे ज्यादा संरक्षण मराठा काल में मिला। नृत्य-संगीत के शौकीन राजा गंगाधर राव ने कला व कलाकारों को विशेष प्रोत्साहन दिया। इसके लिए उन्होंने नृत्य शालाओं की स्थापना कराई, जिनके अस्तित्व अब भी किले व राजा रघुनाथ राव महल में मौजूद हैं। इतना ही नहीं, राजा गंगाधर राव ने नृत्यों के प्रशिक्षण देने की व्यवस्था भी कराई थी।
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इसके अलावा बुंदेलखंड की प्राचीन कला संस्कृति को भावी पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए भी गंगाधर राव ने महत्वपूर्ण कदम उठाए थे। इसके लिए उन्होंने नृत्य कला से जुड़े कलाकारों के इतिहास व कला की बारीकियों का संग्रह तैयार कराया था। लेकिन, 1857 के गदर में फिरंगियों ने इसे फूंक दिया गया था। अब इसका अस्तित्व भी बाकी नहीं है।
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बुंदेली संस्कृति के जानकार हरगोविंद कुशवाहा ने बताया कि प्राचीन काल से ही बुंदेलखंड की नृत्य संस्कृति खासी समृद्ध रही है। इसके संरक्षण में राजा गंगाधर राव का अहम योगदान रहा है।
मूर्तियों में भी है नृत्य कला का विकास
बुंदेलखंड की समृद्ध नृत्य कला शैली यहां की प्राचीन मूर्तियों में भी नजर आती है। राजकीय संग्रहालय में 10वीं शताब्दी की सीरोन खुर्द ललितपुर से प्राप्त चौदह भुजी गणेश की एक पैर पर नृत्य करती प्रतिमा सन 1986 में पेरिस में आयोजित भारत महोत्सव में शामिल हुई थी। प्रतिमा के दोनों ओर संगीतज्ञों की लघु प्रतिमाएं बांसुरी, तबला आदि वाद्य बजा रहे हैं। इसके अलावा 10वीं शताब्दी की ही 16 भुजी गणेश प्रतिमा एवं मृदंग पर नृत्य करती नृत्यांगना की मूर्ति भी विशेष है।
नगर की कत्थक नृत्यांगनाओं ने देश में कमाया नाम
उत्तर भारत के प्रमुख नृत्य कत्थक में नगर क ी नृत्यांगनाएं राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुकी हैं। इनमें आरती मुखर्जी, करुणा एवं मोहिनी के नाम प्रमुख हैं। प्रभु श्री राम लाल संगीत महाविद्यालय के प्राचार्य कृष्ण कांत झा के मुताबिक इन नृत्यांगनाओं ने दिल्ली में आयोजित भारत सेवक समाज के सातवें अधिवेशन में प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू, गुलजारी नंदा एवं लाल बहादुर शास्त्री की उपस्थिति कत्थक नृत्य की प्रस्तुति की थी, जिसे खूब सराहा गया था।
बुंदेलखंड के यह हैं प्रमुख नृत्य
- राई नृत्य - इस नृत्य ने सर्वाधिक लोकप्रियता हासिल की है। इसमें बुंदेली लोक कवि ईसुरी, गंगाधर व्यास आदि की फागों पर महिलाएं 72 गज का लहंगा पहनकर नृत्य करती हैं। राई नृत्य में कलाकार चंदा देवी का नाम अहम है। इस नृत्य को राई दामोदर नृत्य भी कहते है, जो भगवान कृष्ण एवं राधा से जोड़ा जाता है।
- सेरा नृत्य - यह राई नृत्य से मिलता जुलता है। यह नृत्य रबी एवं खरीफ की बुआई के समय किया जाता है।
- ढिमरयाई नृत्य - यह ढीमर समाज का नृत्य है। यह बुंदेली वाद्य यंत्र खंजडी, चमीटा, लोटा, घड़ा व ढपली की धुन पर किया जाता है।
- कछियाई नृत्य - यह कुशवाहा समाज के लोग झींगा, मंजीरा, सारंगी, अलगोजा वाद्य यंत्र पर करते हैं।
- मोनिया नृत्य - यह गोपालक समाज द्वारा मौन व्रत धारण का हाथों में लाठी लेकर किया जाता है।
यह भी हैं लोकप्रिय
झांसी। बुंदेलखंड में जुलाहा समाज द्वारा किया जाने वाला कबीर पंथी नृत्य, शादी में बारात जाने के बाद महिलाओं द्वारा किया जाने वाला जुगिया नृत्य, नवरात्र में जवारों की बुवाई पर होने वाला जवारा नृत्य, धोबी समाज के रावला नृत्य के साथ ढोला मारू नृत्य, दिलदिल घोडी नृत्य, सपेरा नृत्य आदि भी क्षेत्र में लोकप्रिय हैं।