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अस्तित्व खो चुके ‘निगम’ में ‘बोर्ड’ फूंकेगा जान

Tue, 25 Dec 2018 01:40 AM IST
jhansi Published by: देवेंद्र कुमार Updated Tue, 25 Dec 2018 01:40 AM IST
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bundelkhand devopment bord consituted
bundelkhand vikas board - फोटो : demo
सोमवार को प्रदेश कैबिनेट द्वारा बुंदेलखंड विकास बोर्ड के गठन को मंजूरी दिए जाने के बाद अस्तित्व खो चुकी इस संस्था के एक फिर उठ खड़े होने की संभावना जग गई है। क्षेत्र के विकास के लिए 48 साल पहले बुंदेलखंड विकास निगम का गठन किया गया था। लेकिन, लगातार अनदेखी के चलते निगम का अस्तित्व खत्म हो गया था।
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बुंदेलखंड क्षेत्र के विकास के लिए 23 मार्च 1970 को 1.23 करोड़ के बजट के साथ बुंदेलखंड विकास निगम की स्थापना हुई थी। शुरुआती तीन दशकों तक निगम की क्षेत्र के सातों जनपदों में कई व्यावसायिक गतिविधियां चलती रहीं, जिनसे हजारों लोगों को रोजगार मिला था। लेकिन, बाद के वर्षों में यह अनदेखी का शिकार हो गया। न तो बजट मिला और न ही संसाधन दिए गए। एक-एक कर कर्मचारी सेवानिवृत्त होते गए या उन्हें अन्य विभागों में भेज दिया गया। हालांकि, अब भी निगम के नाम राठ और कवरई में नौ करोड़ रुपये कीमत की जमीनें दर्ज हैं।
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अतीत की यह है झलक
बुंदेलखंड विकास निगम की राठ और माधौगढ़ में शुगर मिल थीं। पांच ईंट भट्टे ललितपुर, उरई, हमीरपुर, व बांदा में संचालित थे। झांसी व चित्रकूट में चार स्टोन क्रशर थे। झांसी के एरच घाट तथा बांदा के बरौसा व खप्तिया घाट पर बालू खनन का निगम के पास ठेका था। इसके अलावा निगम द्वारा कालपी में कागज उद्योग संचालित किया जाता था तथा खाद-उर्वरक का काम भी होता था। इन व्यावसायिक गतिविधियों से भारी संख्या में शिक्षित व अशिक्षित लोगों को रोजगार मिला हुआ था। लेकिन, अब निगम के पास कुछ भी नहीं बचा है। सभी प्रापर्टी बिक गईं हैं। केवल दो स्थानों पर ही भूखंड बाकी हैं।
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बुंदेलखंड के विकास में निगम का महत्वपूर्ण योगदान रहा था। निगम के पास बजट भी होता था और अधिकार भी। लेकिन, बाद में ये अनदेखी की चपेट में आ गया, जिसका नतीजा है कि ये संस्था खत्म हो गई। अब प्रदेश सरकार द्वारा गठित किए जाने वाले नये बोर्ड को पर्याप्त अधिकार और बजट देना होगा। अन्यथा ये संस्था कागजी बनकर भर रह जाएगी।
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