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आदिवासी बच्चों के लिए ज्ञान ज्योति बनी अर्चना

Mon, 02 May 2016 12:04 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो Updated Mon, 02 May 2016 12:04 AM IST
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Aboriginal children made sense Archana Jyoti
sikcha, jhansi news - फोटो : demo
झांसी। वैसे तो अर्चना गुप्ता का नाम शहर में किसी पहचान का मोहताज नहीं है। शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने अपनी एक अलग जगह बना रखी है, लेकिन बहुत कम लोग ही जानते हैं कि अर्चना ने अपने सफर की शुरूआत आदिवासी बच्चों को शिक्षित करने से की। पिछले 18 सालों से वह अनवरत यह कार्य करती आ रही हैं। उनके पढ़ाए कई बच्चे आज स्कूलों में शिक्षण कार्य तक कर रहे हैं।
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सखी के हनुमान मंदिर के पास सखीपुरा मुहल्ले में पिछले कई दशकों से पचास से अधिक आदिवासी परिवार रहते आ रहे हैं। इन परिवारों के ज्यादातर वयस्क महिला-पुरुष ईंट-भट्ठों  पर काम करते हैं, जबकि बच्चे होटल-ढाबों पर काम करते हैं। त्योहार के दिनों में मंदिरों में भीड़ जुटने पर बच्चे वहां भीख मांगने पहुंच जाते हैं। कमोबेश यही स्थिति पिछोर, करगुवां में रहने वाले आदिवासी परिवारों की है, लेकिन इन सब में एक बात अच्छी है कि उक्त परिवारों के सभी बच्चे पढ़ना-लिखना जानते हैं और सभी का स्कूल से नाता है।
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यह अलख जगाई है अर्चना गुप्ता ने। उन्होंने 1998 में सखीपुरा में आदिवासी बच्चों को नि:शुल्क पढ़ाना शुरू किया था। इसके बाद गुमनावारा में एक मकान में कक्षाएं लगाने लगीं थीं। शुरुआत में उन्हें आदिवासी परिवारों को बच्चों की शिक्षा के लिए प्रेरित करने में परेशानी उठानी पड़ी। क्योंकि, ये बच्चे परिवार के लिए कमाकर भी लाते थे। लेकिन, बाद में ज्यादातर परिवार अपने बच्चों को पढ़ने के लिए भेजने लगे। अर्चना का यह क्रम आज भी जारी है।
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गुमनावारा में उनके गुरुकुल स्कूल में इन दिनों पैंतालिस बच्चे पढ़ने आ रहे हैं। यह संख्या लगातार घटती-बढ़ती रहती है। आदिवासी परिवारों की कई लड़कियां अर्चना के स्कूल में शिक्षण कार्य कर रही हैं। पढ़ाने के साथ अर्चना बच्चों के लिए स्टेशनरी, यूनिफार्म आदि का भी बंदोबस्त करती हैं। इसके लिए वह जन सहयोग लेने से भी हिचकती नहीं हैं। अर्चना कहती हैं कि बच्चे स्कूल में पढ़ाई करते हैं तथा बाकी समय में अन्य काम करते हैं। पढ़कर बच्चे भिक्षावृत्ति से परहेज करने लगे हैं।

परिवार के लोगों में भी बच्चों को पढ़ाने की लालसा पैदा होने लगी है। इसमें उन्हें सुकून मिलता है। अर्चना गुप्ता शहर में पांच स्कूल संचालित कर रही हैं। बावजूद, वह रोजाना आदिवासी बच्चों को पढ़ाना नहीं भूलतीं।

अब पढ़ा रही हैं गीता
सखीपुरा आदिवासी मुहल्ले की गीता सहारिया को अर्चना गुप्ता ने शुरुआती दिनों में पढ़ाना शुरू किया था। वह अपनी बस्ती में सबसे ज्यादा पढ़ी लिखी हैं। गीता बीए कर चुकी हैं और वह गुरुकुल इंटर कॉलेज में शिक्षिका हैं। गीता कहती हैं कि उन्हें देखकर बस्ती के अन्य बच्चे भी पढ़ाई के प्रति प्रेरित हो रहे हैं। हालांकि, गरीबी की वजह से बच्चों को काम भी करना होता है। लेकिन, अब वह नियमित रूप से पढ़ते भी हैं।


स्कूल के बाद सब्जी बेचता है दिनेश
आदिवासी बस्ती का दस साल का दिनेश दोपहर तक स्कूल में रहता है। उसके बाद वह सब्जी बेचता है। दिनेश ने बताया कि उसके पिता कोई काम नहीं करते हैं। घर में आमदनी का कोई अन्य जरिया न होने से उसे सब्जी बेचनी पड़ती है। लेकिन, वह अच्छे से हिंदी लिखना व पढ़ना सीख गया है। वह आगे भी पढ़ना चाहता हैं। अभी उसे कक्षा दो में प्रवेश दिया गया है।
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