फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Jhansi News ›   उम्मीदों के बोझ तले दब गए प्रदीप जैन

उम्मीदों के बोझ तले दब गए प्रदीप जैन

Sat, 17 May 2014 05:30 AM IST
Jhansi
Jhansi Updated Sat, 17 May 2014 05:30 AM IST
विज्ञापन
कुमार भवानंद
विज्ञापन

झांसी। झांसी- ललितपुर संसदीय क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्याशी कें द्रीय ग्रामीण विकास राज्य मंत्री प्रदीप जैन आदित्य के चौथे नमबर पर रपने के कारणों पर गौर करें तो इसमें सिर्फ मोदी लहर, कांग्रेस शासन में बढ़ती महंगाई और घोटालों की ही भूमिका नहीं रही, बल्कि 2009 के चुनाव में क्षेत्रीय जनता को उन्होंने जिस तरह उम्मीदों के पहाड़ पर चढ़ाया था, उस पर खरा नहीं उतरना भी उनकी हार का एक बड़ा कारण बना। दिल्ली की दूरी ने वोटर के दिल से उन्हें दूर कर दिया। अपने कार्यकाल में कराए गए विकास कार्यों को भी भुनाने में बुरी तरह से विफल रहे।
सहज मुलाकात सीधी बात के नारे के साथ चुनाव मैदान में उतरे जैन के लिए दूसरी बार जीत की राह पहले से ही मुश्किल दिख रही थी। दरअसल, दो बार के विधायक कार्यकाल में वह लोगों से सीधे जुड़े रहे थे। सुख- दुख के हर पल में उनकी उपस्थिति ने उन्हें आम जनमानस का नेता बना दिया था। कभी मोटर साइकिल तो कभी स्कूटर से शहर का भ्रमण कर वह यह भी बताते रहे थे कि वह अब भी ऊंची उड़ान नहीं भर रहे, बल्कि जमीन से जुड़े नेता हैं। यही वजह थी कि पिछले लोकसभा चुनाव में लोगों ने उन्हें 2,52,712 वोट देकर लोकसभा पहुंचा दिया था। राहुल गांधी के युवा ब्रिगेड में शामिल होने के कारण उन्हें मंत्री पद से भी नवाजा गया। मंत्री पद के दायित्व की वजह से दिल्ली में रहने की मजबूरी ने झांसी से उनकी दूरी बढ़ा दी। यह भी एक बड़ा कारण था कि जनता ने सहज मुलाकात के उनके नारे के साथ- साथ उन्हें भी खारिज कर दिया।
विज्ञापन

ऐसा नहीं है कि विकास के कार्यों में उन्होंने कोई ढील दिखाई। कें द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, मेडिकल कालेज का उच्चीकरण, ललितपुर में रेल नीर फैक्ट्री जैसे एक दर्जन से बड़े प्रोजेक्ट इस क्षेत्र के विकास के लिए लाए। लेकिन, उनके लिए बुरी बात यह रही कि इनमें से कई परियोजनाएं चुनाव तक मूर्त रूप नहीं ले सकीं। इतना ही नहीं इन परियोजनाओं के प्रचार- प्रसार के मसले पर भी वह पिछड़े नजर आए। संसदीय कार्यकाल के पांच वर्षों के दौरान जनता से जुड़े मामलों पर पारीछा आंदोलन को छोड़ दिया जाए तो उनके हाथ कोई ऐसा मुद्दा नहीं आया, जिसके सहारे वह जनता से सीधे जुड़ते। 24 घंटे बिजली देने की मांग को लेकर हुए उस आंदोलन का परिणाम भी शून्य ही रहा।
विज्ञापन
विज्ञापन

मोदी लहर के बीच भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष उमा भारती के मैदान में उतरने के बाद ही यह माना जारहा था कि इस बार दिल्ली के साथ- साथ आम जनता भी उनसे दूरी बढ़ाने के मूड में है। इस चुनाव में महज 84089 वोट पाकर चौथे स्थान पर उनके खिसकने को अप्रत्याशित नहीं माना जा सकता है।





विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed