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सुजानगंज में ‘एटमबम’ नहीं खाया तो क्या किया

Mon, 23 Nov 2020 11:50 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Mon, 23 Nov 2020 11:50 PM IST
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What did you do if you did not eat 'Atambum' in Sujanganj
सुजानगंज में बना एटम बम मिठाई। - फोटो : JAUNPUR
जौनपुर। सुजानगंज में आकर ‘एटमबम’ से आपका पाला न पड़े तो वहां जाना बेकार है। डरने वाली बात नहीं है यहां का एटम बम संहारक नहीं बल्कि रस से भरा है। सुजानगंज के ‘एटमबम’ का जिक्र होते ही मुंह में पानी आ जाता है। यहां के लोग इसे चाव से खाते तो हैं ही और रिश्तेदारों को भी भेजते हैं। दरअसल ‘एटमबम’ यहां की विशेष किस्म की मिठाई है, जिसकी रोजाना 300 किलो तक खपत हो जाती है।
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जौनपुर की मिठाई का जिक्र आते ही आमतौर पर लोग इमरती को याद करने लगते हैं लेकिन सुजानगंज में तो ‘एटमबम’ ही मशहूर है। यह खास तरह की मिठाई है, जिसे लोग बेहद चाव से खाते हैं। सुजानगंज बाजार के प्रवीण स्वीट मार्ट के संचालक गणेश प्रसाद जायसवाल बताते हैं कि करीब छह दशक पहले पुरानी बाजार स्थित लाला हरिहरनाथ टंडन ने इसे ईजाद किया था। फिर तो इसे जिसने चखा वह इसका कायल होता गया। उस समय इसकी कीमत 60 पैसे किलो थी। महंगाई बढ़ने के साथ इसकी कीमत बढ़ी तो कद्रदान भी। गंगा जमुना स्वीट मार्ट के रोहित उमरवैश्य बताते हैं कि खाने में यह‘एटमबम’ की तरह ही असर करती है। जो एक ‘एटमबम’ खा लेता है वह काफी देर तक कुछ नहीं खा पाता है। इसके आकार और अलग स्वाद के कारण ही इसका नाम ‘एटमबम’ रखा गया था। संगम स्वीट के सागर जायसवाल ने बताया कि 250 रुपये प्रति किलो की दर से यह मिठाई बाजार की हर दुकान पर उपलब्ध है और दूर-दूर से कद्रदान इसे लेने आते हैं। यात्री यहां बस रुकने पर ‘एटमबम’ खाना नहीं भूलते।
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ऐसे बनती है यह मिठाई
मधुर स्वीट मार्ट के संचालक प्रमोद कुमार मोदनवाल बताते हैं कि हम लोग खुद छेना फाड़ते हैं। कच्चे छेने में इलायची, किशमिश, काजू, चिरौंजी आदि का मिश्रण भरकर उसे चाशनी में पाग देते हैं। यह रस से भरा रसगुल्ले जैसा होता है लेकिन स्वाद में यह उससे बहुत अलग है। एक ‘एटमबम’ अब 125-150 ग्राम का होता है। पहले यह 200 ग्राम तक होता था। लागत बढ़ने के कारण आकार छोटा किया गया है।
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एटमबम नाम ऐसे पड़ा
करीब 50 वर्ष से दुकान चला रहे पवन स्वीट मार्ट के संचालक सुरेश चंद्र बताते हैं कि ‘एटमबम’ का नाम इसके आकार और लजीज स्वाद के कारण ही रखा गया था। बुजुर्ग बताते थे कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद एटमबम की खूब चर्चा होती थी। हिरोशिमा और नागासाकी को तो इसने बरबाद ही कर दिया। जब सुजानगंज में नए तरह की मिठाई बनी तो वह भी रसिकों पर व्यापक असर करने वाली थी। कोई एक मिठाई खा लेता था तो दूसरी खाने की इच्छा नहीं रह जाती थी। इससे लोगों ने इसका नाम ‘एटमबम’ रख दिया। वह एटमबम विनाशकारी था और यहां का मेवों से भरा स्वादिष्ट। राजनीतिक दौरे पर इंदिरा गांधी सुजानगंज आईं तो उन्हें ‘एटमबम’ मिठाई पेश की गई। नाम सुनते ही उन्होंने टिप्पणी की, क्या यहां के लोग ‘एटमबम’ भी खा जाते हैं? पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी इसका स्वाद ले चुके हैं।
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