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दम तोड़ रही धरोहरों को संरक्षण की दरकार
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विश्व धरोहर सप्ताह के दौरान शाही किले में घूमने जाते लोग।
- फोटो : JAUNPUR
जौनपुर। सिराज-ए-हिंद के नाम से मशहूर जौनपुर में ऐतिहासिक इमारतों की बड़ी तादाद है। जिले के गौरवशाली अतीत की पहचान पुरातात्विक महत्व के स्थल रखरखाव के अभाव में नष्ट हो रहे हैं। तमाम जगहों पर अतिक्रमण के चलते ऐसे स्थल नष्ट हो रहे हैं। पुरातत्व विभाग का सारा ध्यान बस शाही किले तक ही सिमटा हुआ है। उसके पास अन्य स्थलों की सुध लेने की फुर्सत नहीं है।
फिरोज शाह तुगलक ने अपने चचेरे भाई मुहम्मद बिन तुगलक उर्फ जौना खां की याद में 14वीं शताब्दी में जौनपुर शहर को बसाया था। पूर्वांचल का यह पहला शहर था जिसकी व्यवस्थित बसाहट लंबे समय तक शासकों का ध्यान खींचती रही। गोमती नदी के दोनों छोर पर बसे जौनपुर को शर्की शासकों ने राजधानी बनाई। उन्होंने यहां की कला, संस्कृति और साहित्य को पहचान दिलाई। शेरशाह सूरी ने यहां बचपन बिताया तो मुगल बादशाह अकबर ने भी लंबा समय यहां व्यतीत किया। मुगल काल में भी यहां कई निर्माण हुए। शाही किला, अटाला मस्जिद, लाल दरवाजा, बड़ी मस्जिद, झंझरी मस्जिद, चार अंगुल मस्जिद, इमामबाड़ा, मकबरा, शाही पुल आदि ऐसे स्थल हैं जो ऐतिहासिक महत्व तो बताते ही हैं। उनकी कलात्मक उत्कृष्टता भी गजब की है। इन धरोहरों को संरक्षित करने के लिए पुरातत्व विभाग ने अपने अधीन ले रखा है। हर स्थल के बाहर घेरेबंदी कर बड़े-बड़े बोर्ड तो लगा दिए गए हैं लेकिन उनके संरक्षण की कोई कोशिश नहीं हो रही। मुगल काल में बने अपने तरह के अनूठे शाही पुल की दीवारों पर पीपल गए हैं, जो उसे कमजोर कर रहे हैं। अटाला मस्जिद के बाहरी हिस्से में दुकानों में तोड़फोड़ अक्सर होती रहती है। पुरानी बाजार में एक कोने में बनी चार अंगुल मस्जिद तक अतिक्रमण के चलते पहुंचना भी मुश्किल भरा हो गया है। पुरातत्व महत्व के इन स्थलों के सौ मीटर के दायरे में किसी भी तरह का निर्माण पूरी तरह प्रतिबंधित है, मगर आसपास धड़ल्ले से नई इमारतें तनती जा रही हैं। अटाला और चार अंगुल मस्जिद वाले इलाके में तो दस मीटर की दूरी पर ही कई नए निर्माण कराए गए हैं। यही हाल सिपाह स्थित फिरोज शाह मकबरा, इमामबाड़ा, बड़ी मस्जिद और अन्य स्थलों का भी है।
नोटिस देने तक सिमटा विभाग
पुरातत्व महत्व वाले स्थलों के आसपास हो रहे निर्माण से विभागीय लोग भी भलीभांति वाकिफ हैं। उनकी कार्रवाई बस नोटिस देने तक ही सीमित रहती है। विभाग के स्थानीय प्रतिनिधि जूनियर आर्किटेक्ट जे राजू का कहना है कि संरक्षित स्मारक से सौ मीटर के दायरे में निर्माण करने पर दो साल में 50 से अधिक लोगों को नोटिस दिया गया है लेकिन उनके विरुद्ध कार्रवाई मंडलायुक्त स्तर से ही हो सकती है। शहर में किसी तरह का निर्माण होने से पहले मास्टर प्लान से अनुमति लेनी होती है। इसके लिए आवेदन प्रस्तुत भी किया जाता है, लेकिन बिना मौके पर गए ही आवेदनों पर निर्माण की अनुमति दे दी जाती है। यह भी ध्यान नहीं रखा जाता कि निर्माण किया जाने वाला स्थल प्रतिबंधित क्षेत्र के दायरे में है या नहीं।
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शाही किला में बढ़ने लगी भीड़
जौनपुर। कोरोना काल में लंबे समय तक बंद रहने के बाद शाही किला पर्यटकों की रौनक से गुलजार है। धीरे-धीरे पर्यटकों की संख्या बढ़ रही है। विश्व धरोहर सप्ताह के पहले दिन सवा तीन सौ लोग पहुंचे थे। इसके बाद दो सौ से ढाई सौ की संख्या नियमित बनी हुई है। रविवार की दोपहर तक यहां डेढ़ सौ लोग भ्रमण कर चुके थे। हालांकि कोरोना काल से पहले यह संख्या सात सौ से आठ सौ तक होती थी। जिम्मेदारों की मानें तो किला परिसर में घूमने की अनुमति है, लेकिन वहां लंबे समय बैठने की मनाही है। इस कारण भी पर्यटक कुछ कम आ रहे हैं। टिकट वितरण से लेकर प्रवेश तक सामाजिक दूरी का पालन कराया जा रहा है।
पर्यटन बढ़ाने की योजना नहीं
महत्वपूर्ण ऐतिहासिक व पुरातत्व महत्व स्थल होने के बाद भी यहां पर्यटन को बढ़ावा देने की कोई योजना नहीं है। पर्यटन विभाग ने इन स्थलों को अपनी सूची में भी नहीं रखा है। लिहाजा यहां विकास के लिए कोई कार्य उनकी ओर से नहीं किया जा रहा। विभाग पिछले दो वर्ष से बजट का रोना रो रहा है। क्षेत्रीय पर्यटन अधिकारी कीर्तिमान श्रीवास्तव के मुताबिक पुरातत्व स्थलों पर पुरातत्व विभाग के माध्यम से ही कार्य हो सकते हैं। जिले के शीतला चौकिया धाम सहित धार्मिक महत्व के कुछ अन्य स्थलों पर पर्यटन के विकास की योजना बनाई जा रही है।
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फिरोज शाह तुगलक ने अपने चचेरे भाई मुहम्मद बिन तुगलक उर्फ जौना खां की याद में 14वीं शताब्दी में जौनपुर शहर को बसाया था। पूर्वांचल का यह पहला शहर था जिसकी व्यवस्थित बसाहट लंबे समय तक शासकों का ध्यान खींचती रही। गोमती नदी के दोनों छोर पर बसे जौनपुर को शर्की शासकों ने राजधानी बनाई। उन्होंने यहां की कला, संस्कृति और साहित्य को पहचान दिलाई। शेरशाह सूरी ने यहां बचपन बिताया तो मुगल बादशाह अकबर ने भी लंबा समय यहां व्यतीत किया। मुगल काल में भी यहां कई निर्माण हुए। शाही किला, अटाला मस्जिद, लाल दरवाजा, बड़ी मस्जिद, झंझरी मस्जिद, चार अंगुल मस्जिद, इमामबाड़ा, मकबरा, शाही पुल आदि ऐसे स्थल हैं जो ऐतिहासिक महत्व तो बताते ही हैं। उनकी कलात्मक उत्कृष्टता भी गजब की है। इन धरोहरों को संरक्षित करने के लिए पुरातत्व विभाग ने अपने अधीन ले रखा है। हर स्थल के बाहर घेरेबंदी कर बड़े-बड़े बोर्ड तो लगा दिए गए हैं लेकिन उनके संरक्षण की कोई कोशिश नहीं हो रही। मुगल काल में बने अपने तरह के अनूठे शाही पुल की दीवारों पर पीपल गए हैं, जो उसे कमजोर कर रहे हैं। अटाला मस्जिद के बाहरी हिस्से में दुकानों में तोड़फोड़ अक्सर होती रहती है। पुरानी बाजार में एक कोने में बनी चार अंगुल मस्जिद तक अतिक्रमण के चलते पहुंचना भी मुश्किल भरा हो गया है। पुरातत्व महत्व के इन स्थलों के सौ मीटर के दायरे में किसी भी तरह का निर्माण पूरी तरह प्रतिबंधित है, मगर आसपास धड़ल्ले से नई इमारतें तनती जा रही हैं। अटाला और चार अंगुल मस्जिद वाले इलाके में तो दस मीटर की दूरी पर ही कई नए निर्माण कराए गए हैं। यही हाल सिपाह स्थित फिरोज शाह मकबरा, इमामबाड़ा, बड़ी मस्जिद और अन्य स्थलों का भी है।
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नोटिस देने तक सिमटा विभाग
पुरातत्व महत्व वाले स्थलों के आसपास हो रहे निर्माण से विभागीय लोग भी भलीभांति वाकिफ हैं। उनकी कार्रवाई बस नोटिस देने तक ही सीमित रहती है। विभाग के स्थानीय प्रतिनिधि जूनियर आर्किटेक्ट जे राजू का कहना है कि संरक्षित स्मारक से सौ मीटर के दायरे में निर्माण करने पर दो साल में 50 से अधिक लोगों को नोटिस दिया गया है लेकिन उनके विरुद्ध कार्रवाई मंडलायुक्त स्तर से ही हो सकती है। शहर में किसी तरह का निर्माण होने से पहले मास्टर प्लान से अनुमति लेनी होती है। इसके लिए आवेदन प्रस्तुत भी किया जाता है, लेकिन बिना मौके पर गए ही आवेदनों पर निर्माण की अनुमति दे दी जाती है। यह भी ध्यान नहीं रखा जाता कि निर्माण किया जाने वाला स्थल प्रतिबंधित क्षेत्र के दायरे में है या नहीं।
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शाही किला में बढ़ने लगी भीड़
जौनपुर। कोरोना काल में लंबे समय तक बंद रहने के बाद शाही किला पर्यटकों की रौनक से गुलजार है। धीरे-धीरे पर्यटकों की संख्या बढ़ रही है। विश्व धरोहर सप्ताह के पहले दिन सवा तीन सौ लोग पहुंचे थे। इसके बाद दो सौ से ढाई सौ की संख्या नियमित बनी हुई है। रविवार की दोपहर तक यहां डेढ़ सौ लोग भ्रमण कर चुके थे। हालांकि कोरोना काल से पहले यह संख्या सात सौ से आठ सौ तक होती थी। जिम्मेदारों की मानें तो किला परिसर में घूमने की अनुमति है, लेकिन वहां लंबे समय बैठने की मनाही है। इस कारण भी पर्यटक कुछ कम आ रहे हैं। टिकट वितरण से लेकर प्रवेश तक सामाजिक दूरी का पालन कराया जा रहा है।
पर्यटन बढ़ाने की योजना नहीं
महत्वपूर्ण ऐतिहासिक व पुरातत्व महत्व स्थल होने के बाद भी यहां पर्यटन को बढ़ावा देने की कोई योजना नहीं है। पर्यटन विभाग ने इन स्थलों को अपनी सूची में भी नहीं रखा है। लिहाजा यहां विकास के लिए कोई कार्य उनकी ओर से नहीं किया जा रहा। विभाग पिछले दो वर्ष से बजट का रोना रो रहा है। क्षेत्रीय पर्यटन अधिकारी कीर्तिमान श्रीवास्तव के मुताबिक पुरातत्व स्थलों पर पुरातत्व विभाग के माध्यम से ही कार्य हो सकते हैं। जिले के शीतला चौकिया धाम सहित धार्मिक महत्व के कुछ अन्य स्थलों पर पर्यटन के विकास की योजना बनाई जा रही है।