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Jaunpur News: ज्ञान, भक्ति व कर्म की अनूठी त्रिवेणी है श्रीमद्भागवत गीता
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जलालपुर। क्षेत्र के कुटीर पीजी काॅलेज चक्के परिसर में शनिवार को संस्थान का 87वां स्थापना दिवस व गीता जयंती समारोह सांस्कृतिक कार्यक्रमों के बीच धूमधाम से मनाया गया।
मुख्य अतिथि संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर बिहारी लाल शर्मा ने कहा कि श्रीमद्भागवत गीता ज्ञान, भक्ति व कर्म की अनूठी त्रिवेणी है। जिसमें अध्यात्म ज्ञान की बात निहित है। ज्ञान, भक्ति एवं कर्म को प्रधान मानकर मनुष्य को अपना कार्य करना चाहिए। कहा कि पांच हजार वर्ष पहले भगवान श्रीकृष्ण के मुख से निकली हुई यह वाणी समस्त मानवों के दुखों का हल है। इसमें भौतिक जगत के सभी प्रश्नों का उत्तर भी है। गीता केवल ग्रंथ मात्र ही नहीं है गीता ज्ञान है संस्कृति है, वैराग्य है जीवन जीने की शैली है।
डायरेक्टर विधि संस्थान पूविवि के प्रोफेसर देवराज ने कहा कि जीवन की नैया पार लगाने के लिए गीता का पाठ करना चाहिए। भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता को रेखांकित करते हुए धर्म के मार्ग को अपनाकर मोहग्रस्त अर्जुन ने युद्ध किया, वहीं सम्राट अशोक शांति के प्रतीक बने। प्रबंधक डाॅ.अज्येंद्र कुमार दुबे ने आए अतिथियों व सेवानिवृत्त कर्मचारियों को स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया।
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इस दौरान डाॅ.रमेशमणि त्रिपाठी, सुधाकर त्रिपाठी, धर्मेंद्र दुबे, पंडित श्रीभूषण मिश्र आदि रहे। अध्यक्षता पूर्व प्रभारी कुलपति प्रोफेसर धरणीधर दुबे ने की। प्राचार्य डाॅ.राघवेंद्र पांडेय ने आभार जताया जबकि संचालन छवि गुप्त ने किया।
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मुख्य अतिथि संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर बिहारी लाल शर्मा ने कहा कि श्रीमद्भागवत गीता ज्ञान, भक्ति व कर्म की अनूठी त्रिवेणी है। जिसमें अध्यात्म ज्ञान की बात निहित है। ज्ञान, भक्ति एवं कर्म को प्रधान मानकर मनुष्य को अपना कार्य करना चाहिए। कहा कि पांच हजार वर्ष पहले भगवान श्रीकृष्ण के मुख से निकली हुई यह वाणी समस्त मानवों के दुखों का हल है। इसमें भौतिक जगत के सभी प्रश्नों का उत्तर भी है। गीता केवल ग्रंथ मात्र ही नहीं है गीता ज्ञान है संस्कृति है, वैराग्य है जीवन जीने की शैली है।
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डायरेक्टर विधि संस्थान पूविवि के प्रोफेसर देवराज ने कहा कि जीवन की नैया पार लगाने के लिए गीता का पाठ करना चाहिए। भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता को रेखांकित करते हुए धर्म के मार्ग को अपनाकर मोहग्रस्त अर्जुन ने युद्ध किया, वहीं सम्राट अशोक शांति के प्रतीक बने। प्रबंधक डाॅ.अज्येंद्र कुमार दुबे ने आए अतिथियों व सेवानिवृत्त कर्मचारियों को स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया।
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इस दौरान डाॅ.रमेशमणि त्रिपाठी, सुधाकर त्रिपाठी, धर्मेंद्र दुबे, पंडित श्रीभूषण मिश्र आदि रहे। अध्यक्षता पूर्व प्रभारी कुलपति प्रोफेसर धरणीधर दुबे ने की। प्राचार्य डाॅ.राघवेंद्र पांडेय ने आभार जताया जबकि संचालन छवि गुप्त ने किया।