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जनहित नहीं, स्वहित के लिए वापस लिए प्रस्ताव
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जौनपुर। कोरोना के खिलाफ छिड़ी जंग में संसाधन उपलब्ध कराने के लिए विधायक निधि से प्रस्ताव देकर वापस लेने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। अमर उजाला में जिले के पांच विधायकों की ओर से प्रस्ताव वापस लेने की खबर प्रकाशित होने के बाद से लोग तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि जनता का हमदर्द बनने वाले जनप्रतिनिधियों के दावों की पोल खुल गई है। जिले में सरकारी सेवाओं की बदहाली के पीछे जनप्रतिनिधियों का यह रवैया ही जिम्मेदार है। वह ईमानदारी से अपनी निधि से काम कराते तो तमाम जनसमस्याएं स्वत: दूर हो जातीं।
मुंगराबादशाहपुर के दिनेश कुमार गुप्ता ने बताया कि धनराशि वापस लेना जनता के साथ धोखा है। लोग इसे हरगिज नहीं भूलेंगे। जिले की स्वास्थ्य सेवाएं इतनी बेहतर नहीं है कि वह इतनी जल्दी सही हो जाएं। जनप्रतिनिधियों के पास यह मौका था, जिससे वह अपने क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवा को सुदृढ़ करा सकते थे, मगर उन्हें जनहित से ज्यादा अपने हितों की चिंता थी। जब जनप्रतिनिधि ऐसा करेंगे तो दूसरों से क्या उम्मीद की जा सकती है।
मुंगराबादशाहपुर के अनिल तिवारी ने बताया विधायक निधि के प्रस्ताव वापस लेने के पीछे जो तर्क दिए जा रहे हैं, वह स्वीकार्य योग्य नहीं है। प्रदेश में अन्य विधायक भी हैं, उनमें से किसी ने प्रस्ताव वापस नहीं लिया तो क्या उन्हें अपने जनता के हितों की चिंता नहीं थी। अब सिर्फ बरगलाने वाली बातें की जा रही हैं। जनता उनकी हकीकत जान चुकी है। संकट की घड़ी में उनके इस कदम से पूरे जिले की छवि पर असर पड़ा है।
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वहीं अंचल तिवारी ने कहा कि लॉक डाउन के कारण लोगों के रोजगार, धंधे ठप हो चुके हैं। एक-दूसरे की मदद से जीवन यापन हो रहा है। जनता के प्रति संवेदना दिखाने की बजाए हमारे जनप्रतिनिधि जले पर नमक छिड़कने में लगे हैं। अगर कैबिनेट ने निधि स्थगित करने पर फैसला नहीं दिया होता तो संभवत: वह राशि भी देने को तैयार नहीं होगे। जनता का पैसा जनता को देकर ले लेना निंदनीय है।
उधर डोभी में शिक्षक संघ के पूर्व शिक्षक जंग बहादुर सिंह ने कहा कि अब यह कहना कि हम पूरा वेतन या निधि दे सकते हैं, बेमानी है। अगर उनमें इतनी संवेदनशीलता रहती तो वह दिया हुआ प्रस्ताव वापस ही क्यों लेते। जहां तक बात जनता की आकस्मिक आवश्यकताओं की है तो वह उसे अपने वेतन से भी पूरा कर सकते थे। अमूमन सभी विधायकों के पास आय के अन्य स्रोत भी हैं। आग्रह यही है कि यह धनराशि दोबारा प्रशासन को दे दी जाए, जिससे अन्य संसाधन जुटाए जा सकें।
वहीं के मुधसूदन सिंह ने कहा कि देश इस वक्त वित्तीय आपातकाल जैसे हालात से जूझ रहा है। इसमें हर तरह से मदद काम में आ सकती है। शिक्षक अपना वेतन, पेंशन दे रहबे हैं। अगर वह भी यह कहते हुए मदद देने से इंकार कर दें कि सरकार उनके हिस्से का पैसा दे ही रही है तो आपदा राहत के लिए पैसा कहां से आएगा। बेहतर होता सरकार विधायक निधि पर स्थाई रुप से रोक लगा दे। सीएम अपनी निगरानी में विधायकों से कार्य करवाएं।
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शिक्षक नेता रमेश सिंह ने बताया कि विधायक अपनी निधि से कुछ चिह्नित लोगों या चहेतों को भी लाभ पहुंचाता है, जबकि कोरोना फंड से सबको लाभ मिलता। निधि भ्रष्टाचार की जड़ बन चुकी है। बेहतर होता कि सरकार अन्य प्रदेशों की तरह निधि पर रोक लगा दे। विधायकों के प्रस्ताव पर जनहित के काम बिना भेदभाग के मुख्यमंत्री अपनी निगरानी में कराएं। इससे बिना हर वर्ग को लाभ मिलेगा।
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निर्माला देवी फार्मेसी कॉलेज की प्रधानाचार्य किरन सिंह ने बताया कि देश इस समय कोरोना जैसी महामारी से जूझ रहा है। देश सेवा के संकल्पों को पूरा करने के लिए विधायकों के पास इससे अच्छा मौका कहां मिलेगा। वह निधि से दिए गए धन से काम कराते तो सरकार को ही सहूलियत मिलती। उस पर बोझ कम पड़ता। दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश सेवा के लिए दी गई धनराशि वापस ले ली गई। ऐसे वक्त में सभी जनप्रतिनिधियों को सहयोग देना चाहिए।
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आज जहा पूरे देश में लोग कोरोना से लड़ने के लिए सरकार की मदद कर रहे हैं, वही कुछ जनप्रतिनिधियों द्वारा अपनी निधि से गया पैसा पत्र लिखकर वापस लेना गलत है। जनता का पैसा जनता के बीच खर्च होना है। अगर जनप्रतिनिधियों की निधि का इस्तेमाल कोरोना से लड़ने के लिए होता है तो इससे अच्छी बात क्या हो सकती थी। जिन जनप्रतिनिधियों ने पैसा दिया है, उन्होंने अच्छा काम किया है। -सजल चक्रवर्ती, प्रिंसिपल स्टरलिंग स्कूल।
भाकियू जिलाध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा कि किसान, मजदूर, व्यापारी का पैसा टैक्स के रुप में कटकर जनप्रतिनिधियों को निधि के रुप मे मिलता है, जो जनता पर खर्च होना होता है। कोरोना संकट से बड़ी आपदा देश के लिए नहीं होगी। सरकार की ओर से दी जा रही मदद के अलावा भी अगर विधायक अपने स्तर से धनराशि देते तो अच्छा ही रहता है। यहां तो पहले वह निधि खर्च करने के लिए पत्र लिखकर जनता से वाहवाही लुटते हैं और फिर चुपके से पैसा वापस लेने का पत्र लिखते हैं।
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सिंगरामऊ के इम्तियाज हैदर ने कहा कि विधायकों की ओर से दी गई निधि का पैसा उनके क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च होता। इससे समूची आम जनता को लाभ मिलता और सरकार के लिए भी यह काफी मददगार होती। अगर जनहित के प्रति विधायक इतने ही सजग थे तो तमाम योजनाओं व अन्य मदों से भी वह आकस्मिक सेवाओं में पीड़ित वर्ग की मदद कर सकते थे। निधि से प्रस्ताव देकर वापस लेना, सिर्फ बेवकूफ बनाने की बात है।
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मुंगराबादशाहपुर के दिनेश कुमार गुप्ता ने बताया कि धनराशि वापस लेना जनता के साथ धोखा है। लोग इसे हरगिज नहीं भूलेंगे। जिले की स्वास्थ्य सेवाएं इतनी बेहतर नहीं है कि वह इतनी जल्दी सही हो जाएं। जनप्रतिनिधियों के पास यह मौका था, जिससे वह अपने क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवा को सुदृढ़ करा सकते थे, मगर उन्हें जनहित से ज्यादा अपने हितों की चिंता थी। जब जनप्रतिनिधि ऐसा करेंगे तो दूसरों से क्या उम्मीद की जा सकती है।
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मुंगराबादशाहपुर के अनिल तिवारी ने बताया विधायक निधि के प्रस्ताव वापस लेने के पीछे जो तर्क दिए जा रहे हैं, वह स्वीकार्य योग्य नहीं है। प्रदेश में अन्य विधायक भी हैं, उनमें से किसी ने प्रस्ताव वापस नहीं लिया तो क्या उन्हें अपने जनता के हितों की चिंता नहीं थी। अब सिर्फ बरगलाने वाली बातें की जा रही हैं। जनता उनकी हकीकत जान चुकी है। संकट की घड़ी में उनके इस कदम से पूरे जिले की छवि पर असर पड़ा है।
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वहीं अंचल तिवारी ने कहा कि लॉक डाउन के कारण लोगों के रोजगार, धंधे ठप हो चुके हैं। एक-दूसरे की मदद से जीवन यापन हो रहा है। जनता के प्रति संवेदना दिखाने की बजाए हमारे जनप्रतिनिधि जले पर नमक छिड़कने में लगे हैं। अगर कैबिनेट ने निधि स्थगित करने पर फैसला नहीं दिया होता तो संभवत: वह राशि भी देने को तैयार नहीं होगे। जनता का पैसा जनता को देकर ले लेना निंदनीय है।
उधर डोभी में शिक्षक संघ के पूर्व शिक्षक जंग बहादुर सिंह ने कहा कि अब यह कहना कि हम पूरा वेतन या निधि दे सकते हैं, बेमानी है। अगर उनमें इतनी संवेदनशीलता रहती तो वह दिया हुआ प्रस्ताव वापस ही क्यों लेते। जहां तक बात जनता की आकस्मिक आवश्यकताओं की है तो वह उसे अपने वेतन से भी पूरा कर सकते थे। अमूमन सभी विधायकों के पास आय के अन्य स्रोत भी हैं। आग्रह यही है कि यह धनराशि दोबारा प्रशासन को दे दी जाए, जिससे अन्य संसाधन जुटाए जा सकें।
वहीं के मुधसूदन सिंह ने कहा कि देश इस वक्त वित्तीय आपातकाल जैसे हालात से जूझ रहा है। इसमें हर तरह से मदद काम में आ सकती है। शिक्षक अपना वेतन, पेंशन दे रहबे हैं। अगर वह भी यह कहते हुए मदद देने से इंकार कर दें कि सरकार उनके हिस्से का पैसा दे ही रही है तो आपदा राहत के लिए पैसा कहां से आएगा। बेहतर होता सरकार विधायक निधि पर स्थाई रुप से रोक लगा दे। सीएम अपनी निगरानी में विधायकों से कार्य करवाएं।
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शिक्षक नेता रमेश सिंह ने बताया कि विधायक अपनी निधि से कुछ चिह्नित लोगों या चहेतों को भी लाभ पहुंचाता है, जबकि कोरोना फंड से सबको लाभ मिलता। निधि भ्रष्टाचार की जड़ बन चुकी है। बेहतर होता कि सरकार अन्य प्रदेशों की तरह निधि पर रोक लगा दे। विधायकों के प्रस्ताव पर जनहित के काम बिना भेदभाग के मुख्यमंत्री अपनी निगरानी में कराएं। इससे बिना हर वर्ग को लाभ मिलेगा।
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निर्माला देवी फार्मेसी कॉलेज की प्रधानाचार्य किरन सिंह ने बताया कि देश इस समय कोरोना जैसी महामारी से जूझ रहा है। देश सेवा के संकल्पों को पूरा करने के लिए विधायकों के पास इससे अच्छा मौका कहां मिलेगा। वह निधि से दिए गए धन से काम कराते तो सरकार को ही सहूलियत मिलती। उस पर बोझ कम पड़ता। दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश सेवा के लिए दी गई धनराशि वापस ले ली गई। ऐसे वक्त में सभी जनप्रतिनिधियों को सहयोग देना चाहिए।
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आज जहा पूरे देश में लोग कोरोना से लड़ने के लिए सरकार की मदद कर रहे हैं, वही कुछ जनप्रतिनिधियों द्वारा अपनी निधि से गया पैसा पत्र लिखकर वापस लेना गलत है। जनता का पैसा जनता के बीच खर्च होना है। अगर जनप्रतिनिधियों की निधि का इस्तेमाल कोरोना से लड़ने के लिए होता है तो इससे अच्छी बात क्या हो सकती थी। जिन जनप्रतिनिधियों ने पैसा दिया है, उन्होंने अच्छा काम किया है। -सजल चक्रवर्ती, प्रिंसिपल स्टरलिंग स्कूल।
भाकियू जिलाध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा कि किसान, मजदूर, व्यापारी का पैसा टैक्स के रुप में कटकर जनप्रतिनिधियों को निधि के रुप मे मिलता है, जो जनता पर खर्च होना होता है। कोरोना संकट से बड़ी आपदा देश के लिए नहीं होगी। सरकार की ओर से दी जा रही मदद के अलावा भी अगर विधायक अपने स्तर से धनराशि देते तो अच्छा ही रहता है। यहां तो पहले वह निधि खर्च करने के लिए पत्र लिखकर जनता से वाहवाही लुटते हैं और फिर चुपके से पैसा वापस लेने का पत्र लिखते हैं।
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सिंगरामऊ के इम्तियाज हैदर ने कहा कि विधायकों की ओर से दी गई निधि का पैसा उनके क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च होता। इससे समूची आम जनता को लाभ मिलता और सरकार के लिए भी यह काफी मददगार होती। अगर जनहित के प्रति विधायक इतने ही सजग थे तो तमाम योजनाओं व अन्य मदों से भी वह आकस्मिक सेवाओं में पीड़ित वर्ग की मदद कर सकते थे। निधि से प्रस्ताव देकर वापस लेना, सिर्फ बेवकूफ बनाने की बात है।