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मुजतबा हुसैन ने विदेशी जमीन पर तैयार की थी आंदोलन की नींव
ब्यूरो, अमर उजाला, जौनपुर
Updated Sun, 14 Aug 2016 01:08 AM IST
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चितरसारी गांव में स्थित स्वतंत्रता सेनानी मुजतबा हुसैन का स्मारक।
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स्वतंत्रता आंदोलन में कुर्बानी देने वाले तमाम वीर सपूत आज भी गुमनाम हैं। मुल्क की आजादी की खातिर आंदोलन की आग में कूदने वाले ऐसे ही सेनानियों में मुजतबा हुसैन का भी नाम शुमार है। उन्होंने न सिर्फ कोर्ट आफ वार्ड्स की नौकरी को ठोकर मार दी बल्कि विदेशों में जाकर वहां देश की खातिर आंदोलन की बुनियाद तैयार की।
उन्होंने सिंगापुर में सैनिक विद्रोह करवाया था। आरोप में पहले उन्हें फांसी की सजा हुई जो बाद में आजीवन कारावास में बदल गई। 29 साल तक जेल में गुजारने के बाद उन्होंने आजाद भारत में अंतिम सांस ली थी।
शहर के चितरसारी मोहल्ले में वर्ष 1883 के आसपास जन्में मुजतबा हुसैन की कुर्बानी की दास्तां किसी किताब में मिलने के बाद रिटायर्ड इंजीनियर एवं बक्शा विकास खंड के दरियावगंज निवासी प्रलय बहादुर यादव व अधिवक्ता जय प्रकाश सिंह ने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर क्त्रसंतिकारी मुजतबा हुसैन स्मारक समिति का गठन किया।
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समिति ने ही चितरसारी में जहां मुजतबा हुसैन का कभी घर था वहीं पर उनकी स्मृति में स्मारक का निर्माण करवाया है। 78 वर्षीय इंजीनियर प्रलय बहादुर कहते हैं कि मुजतबा हुसैन ने 1914 में कोर्ट आफ वार्ड्स की नौकरी से इस्तीफा देकर अमेरिका चले गए।
वहां गदर पार्टी की सदस्यता ली और प्रवासी भारतीयों की ओर से चलाए जा रहे आंदोलन में भाग लिया। इसके बाद उनकी मुलाकात गदर पार्टी के नेता लाल हरदयाल व अन्य क्रांतिकारी नेताओं से हुई। उन क्त्रसंतिकारी नेताओं ने अमेरिका, जर्मनी, कनाडा, जापान, इग्लैंड आदि देशों में करीब 40 केंद्र स्थापित कर लिए थे।
मुजतबा हुसैन को रंगून में केंद्र स्थापित करने की जिम्मेदारी दी गई। वह हांगकांग, मनीला होकर सिंगापुर पहुंचे और उन्होंने अपने सहयोगी साथी सोहनलाल पाठक के साथ वहां केंद्र स्थापित किया। वहां भारत के जो नौजवान सेना में थे उनसे सम्पर्क किया और कहा ब्रिटिश साम्राज्यवाद के लिए क्यूं गर्दन कटा रहे हो।
अगर गर्दन कटानी ही है तो अपने वतन को गुलामी से मुक्त कराने के लिए कटाओ। उनकी प्रेरणा से 15 फरवरी 1915 में सैनिक विद्रोह हुआ। माडले षडयंत्र केस में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उस केस में मुतजबा समेत आठ को फांसी की सजा सुनाई गई। जिसे बाद में आजीवन कारावास में बदल दिया गया।
1917 में उन्हें काला पानी अंडमान की सेल्युलर जेल में भेज दिया गया। 1922 में मुजतबा हुसैन को फैजाबाद की जेल में भेज दिया गया। 1930 में नमक आंदोलन चला तो जौनपुर के कई क्रांतिकारियों को फैजाबाद जेल भेजा गया था। 1934 में कुछ दिनों के लिए उन्हें जेल से छोड़ा गया।
घर आए तो मकान पर दूसरे लोगों का कब्जा हो चुका था। माता पिता घर छोड़कर पाकिस्तान जा चुके थे। जौनपुर सिविल कोर्ट में केस किया तो मकान वापस मिल गया। 1939 के द्वितीय विश्व युद्ध में उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया गया। 1946 में केंद्र में नेहरू जी के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी तो वह जेल से छूटे। 3 अगस्त 1953 को उन्होंने आजाद भारत में अंतिम सांस ली। बेगमपुर स्थित इमामबाड़ा स्थित कब्रिस्तान में उन्हें दफन किया गया है।
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उन्होंने सिंगापुर में सैनिक विद्रोह करवाया था। आरोप में पहले उन्हें फांसी की सजा हुई जो बाद में आजीवन कारावास में बदल गई। 29 साल तक जेल में गुजारने के बाद उन्होंने आजाद भारत में अंतिम सांस ली थी।
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शहर के चितरसारी मोहल्ले में वर्ष 1883 के आसपास जन्में मुजतबा हुसैन की कुर्बानी की दास्तां किसी किताब में मिलने के बाद रिटायर्ड इंजीनियर एवं बक्शा विकास खंड के दरियावगंज निवासी प्रलय बहादुर यादव व अधिवक्ता जय प्रकाश सिंह ने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर क्त्रसंतिकारी मुजतबा हुसैन स्मारक समिति का गठन किया।
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समिति ने ही चितरसारी में जहां मुजतबा हुसैन का कभी घर था वहीं पर उनकी स्मृति में स्मारक का निर्माण करवाया है। 78 वर्षीय इंजीनियर प्रलय बहादुर कहते हैं कि मुजतबा हुसैन ने 1914 में कोर्ट आफ वार्ड्स की नौकरी से इस्तीफा देकर अमेरिका चले गए।
वहां गदर पार्टी की सदस्यता ली और प्रवासी भारतीयों की ओर से चलाए जा रहे आंदोलन में भाग लिया। इसके बाद उनकी मुलाकात गदर पार्टी के नेता लाल हरदयाल व अन्य क्रांतिकारी नेताओं से हुई। उन क्त्रसंतिकारी नेताओं ने अमेरिका, जर्मनी, कनाडा, जापान, इग्लैंड आदि देशों में करीब 40 केंद्र स्थापित कर लिए थे।
मुजतबा हुसैन को रंगून में केंद्र स्थापित करने की जिम्मेदारी दी गई। वह हांगकांग, मनीला होकर सिंगापुर पहुंचे और उन्होंने अपने सहयोगी साथी सोहनलाल पाठक के साथ वहां केंद्र स्थापित किया। वहां भारत के जो नौजवान सेना में थे उनसे सम्पर्क किया और कहा ब्रिटिश साम्राज्यवाद के लिए क्यूं गर्दन कटा रहे हो।
अगर गर्दन कटानी ही है तो अपने वतन को गुलामी से मुक्त कराने के लिए कटाओ। उनकी प्रेरणा से 15 फरवरी 1915 में सैनिक विद्रोह हुआ। माडले षडयंत्र केस में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उस केस में मुतजबा समेत आठ को फांसी की सजा सुनाई गई। जिसे बाद में आजीवन कारावास में बदल दिया गया।
1917 में उन्हें काला पानी अंडमान की सेल्युलर जेल में भेज दिया गया। 1922 में मुजतबा हुसैन को फैजाबाद की जेल में भेज दिया गया। 1930 में नमक आंदोलन चला तो जौनपुर के कई क्रांतिकारियों को फैजाबाद जेल भेजा गया था। 1934 में कुछ दिनों के लिए उन्हें जेल से छोड़ा गया।
घर आए तो मकान पर दूसरे लोगों का कब्जा हो चुका था। माता पिता घर छोड़कर पाकिस्तान जा चुके थे। जौनपुर सिविल कोर्ट में केस किया तो मकान वापस मिल गया। 1939 के द्वितीय विश्व युद्ध में उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया गया। 1946 में केंद्र में नेहरू जी के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी तो वह जेल से छूटे। 3 अगस्त 1953 को उन्होंने आजाद भारत में अंतिम सांस ली। बेगमपुर स्थित इमामबाड़ा स्थित कब्रिस्तान में उन्हें दफन किया गया है।