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अपनों ने ही तोड़ी लाठी, वृद्धाश्रम में कट रहा बुढ़ापा.
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जौनपुर। बच्चों को पाल-पोस कर बड़ा करने वाले माता-पिता यह उम्मीद करते हैं कि संतान उनके बुढ़ापे की लाठी बनेगा। शहर के प्रेमराजपुर में संचालित वृद्धाश्रम में रहने वाले बुजुर्गों ने भी कुछ ऐसी ही उम्मीदें अपने बच्चों से पाल रखी थीं, लेकिन जब उनको जरूरत हुई तो संतानों ने उन्हें अपने हाल पर छोड़ दिया।
मुहम्मदाबाद (गाजीपुर) के कृषक विकास समिति की ओर से संचालित वृद्धाश्रम की क्षमता 150 लोगों की है। फिलहाल यहां 35 बुजुर्ग रह रहे हैं। इनमें से कुछ ऐसे हैं, जिनके परिवार में कोई नहीं है। मगर तमाम ऐसे वृद्ध भी है, जिनका भरापूरा परिवार होने के बाद भी उन्हें उससे दूर वृद्धाश्रम में दिन गुजारने पड़ रहे हैं। उन्हें इसका मलाल हैं लेकिन कहें भी तो क्या और किससे कहें। बुजुर्ग नहीं चाहते कि कोई उनके बच्चों को कोसे। संतान की ओर से दूर किए जाने के बाद भी उन्हें कोई शिकवा-शिकायत नहीं है। वह अपने दर्द को भूलकर हर पल संतान की ही खुशहाली की दुआएं कर रहे हैं। उनका मानना है कि हमने अपना कर्म किया, बाकि ईश्वर के हाथ में हैं। उन्हें घर से बेहतर वृद्धाश्रम का माहौल ही भाता है, जहां शांति व सुकून है। वृद्धश्रम के अधीक्षक गोविंद नारायण तिवारी व केयर टेकर अटल बिहारी राय बताते हैं कि प्रत्येक वृद्ध के परिवार और उनके गांव का ब्योरा रखा गया है। समय-समय पर परिवार के लोग आकर मिलते रहते हैं। हर माह स्वास्थ्य जांच सहित अन्य कार्यक्रम होते हैं।
पति थे बैंककर्मी, वृद्धाश्रम में रह रहीं पत्नी
करीब 75 वर्षीय फूला देवी चंदौली जिले के चकिया की निवासी हैं। इनके पति बच्चन प्रसाद खत्री दी बनारस स्टेट बैंक (अब बैंक ऑफ बड़ौदा) में कार्यरत थे। चकिया कचहरी के पास उनका मकान था। प्रतिष्ठित परिवार में दो देवर सहित उनका भरा-पूरा परिवार था। पति की मौत के बाद ससुराल में स्थितियां प्रतिकूल हुईं तो वह शहर के ताड़तला स्थित मायके चली आई। बताते हैं कि जौनपुर आने के बाद कोई व्यक्ति फूला देवी को अपने घर में रखकर घरेलू काम करवाता था। बदले में उन्हें दो रोटी मिल जाती थी। जब अवस्था ज्यादा हुई तो उसने भी पल्ला झाड़ लिया। दो वर्ष से वृद्धाश्रम में रह रहीं फूला देवी का कहना है कि उन्हें यहां सुकून है।
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घर में तीन जवान बेटे, वृद्धाश्रम में कट रहा दिन
जिले के रसवदिया निवासी सीताराम सिलाई करके परिवार का भरण-पोषण करते थे। जब तक वह काम कर रहे थे, सब कुछ ठीक था। फिर उनके अंगों ने जवाब देना शुरू किया। आंख की रोशनी कम हुई। पैर कमजोर हो गए तो परिवार से भी दूर होना पड़ा। सीताराम को तीन जवान बेटे हैं। तीनों मजदूरी करते हैं, मगर पिता को उनसे दूर वृद्धाश्रम में रहना पड़ रहा है। परिवार का जिक्र होने पर सीताराम भावुक हो जाते हैं। उनकी जुबां तो कुछ नहीं बोलती, लेकिन चेहरे का भाव उनके अंदर के कष्ट को जाहिर कर रहा था। उनका कहना था कि इस आश्रम में शांति है। खाने को दो रोटी मिल जाए और बस क्या चाहिए। भगवान की मर्जी के आगे किसका चलता है।
तीन वर्ष से वृद्धाश्रम बना सहारा
सीताराम जैसी ही कहानी रामजस की है। मंझनपुर (गुतवन) निवासी रामजस के परिवार में एक बेटा और बहू हैं। मेहनत मजदूरी कर परिवार का भरण पोषण करने वाले रामजस की हड्डियां कमजोर हुई तो उनका भरण पोषण करने को कोई तैयार नहीं हुआ। लिहाजा वह भी ’शांति’ पाने के लिए वृद्धाश्रम में चले आए। करीब तीन वर्षों से यहीं रह रहे हैं। बीच-बीच में मन करता है तो बेटा-बहू और पोतों से भी मिलने भी जाते हैं, लेकिन उनका मिलन चंद घंटों का ही रहता है। रामजस के मुताबिक यहां मन लग चुका है। बेटा भी तो मजदूरी ही करता है। आमदनी कम है। यहां हमें कोई दिक्कत नहीं है।
अन्नदाता को भी भटकना पड़ा रोटी के लिए
शहर के रुहट्टा मोहल्ला निवासी बुद्धू मौर्य की अच्छी खेती थी। शहर के मध्य में तीन बीघा जमीन थी, जिस पर शाक-भाजी उगाकर वह अच्छी आमदनी कर लेते थे। दो बेटे और उनका भरा-पूरा परिवार है। बावजूद बुद्धू मौर्य को वृद्धाश्रम में दिन गुजारने पड़ रहे हैं। बुद्धू के मुताबिक कुछ लोगों ने जमीन पर कब्जा कर लिया। शासन-प्रशासन से गुहार लगाई, लेकिन प्रभावशाली लोगों के सामने उनकी कहीं सुनवाई नहीं हुई। एक बेटा मुंबई में ही रहकर मजदूरी करता है। दूसरे बेटे की भी तीन संतान हैं। उन्हें भी बड़े शहरों में रहना पड़ रहा है। घर-जमीन पर कब्जे के कारण वह वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर हैं।
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मुहम्मदाबाद (गाजीपुर) के कृषक विकास समिति की ओर से संचालित वृद्धाश्रम की क्षमता 150 लोगों की है। फिलहाल यहां 35 बुजुर्ग रह रहे हैं। इनमें से कुछ ऐसे हैं, जिनके परिवार में कोई नहीं है। मगर तमाम ऐसे वृद्ध भी है, जिनका भरापूरा परिवार होने के बाद भी उन्हें उससे दूर वृद्धाश्रम में दिन गुजारने पड़ रहे हैं। उन्हें इसका मलाल हैं लेकिन कहें भी तो क्या और किससे कहें। बुजुर्ग नहीं चाहते कि कोई उनके बच्चों को कोसे। संतान की ओर से दूर किए जाने के बाद भी उन्हें कोई शिकवा-शिकायत नहीं है। वह अपने दर्द को भूलकर हर पल संतान की ही खुशहाली की दुआएं कर रहे हैं। उनका मानना है कि हमने अपना कर्म किया, बाकि ईश्वर के हाथ में हैं। उन्हें घर से बेहतर वृद्धाश्रम का माहौल ही भाता है, जहां शांति व सुकून है। वृद्धश्रम के अधीक्षक गोविंद नारायण तिवारी व केयर टेकर अटल बिहारी राय बताते हैं कि प्रत्येक वृद्ध के परिवार और उनके गांव का ब्योरा रखा गया है। समय-समय पर परिवार के लोग आकर मिलते रहते हैं। हर माह स्वास्थ्य जांच सहित अन्य कार्यक्रम होते हैं।
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पति थे बैंककर्मी, वृद्धाश्रम में रह रहीं पत्नी
करीब 75 वर्षीय फूला देवी चंदौली जिले के चकिया की निवासी हैं। इनके पति बच्चन प्रसाद खत्री दी बनारस स्टेट बैंक (अब बैंक ऑफ बड़ौदा) में कार्यरत थे। चकिया कचहरी के पास उनका मकान था। प्रतिष्ठित परिवार में दो देवर सहित उनका भरा-पूरा परिवार था। पति की मौत के बाद ससुराल में स्थितियां प्रतिकूल हुईं तो वह शहर के ताड़तला स्थित मायके चली आई। बताते हैं कि जौनपुर आने के बाद कोई व्यक्ति फूला देवी को अपने घर में रखकर घरेलू काम करवाता था। बदले में उन्हें दो रोटी मिल जाती थी। जब अवस्था ज्यादा हुई तो उसने भी पल्ला झाड़ लिया। दो वर्ष से वृद्धाश्रम में रह रहीं फूला देवी का कहना है कि उन्हें यहां सुकून है।
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घर में तीन जवान बेटे, वृद्धाश्रम में कट रहा दिन
जिले के रसवदिया निवासी सीताराम सिलाई करके परिवार का भरण-पोषण करते थे। जब तक वह काम कर रहे थे, सब कुछ ठीक था। फिर उनके अंगों ने जवाब देना शुरू किया। आंख की रोशनी कम हुई। पैर कमजोर हो गए तो परिवार से भी दूर होना पड़ा। सीताराम को तीन जवान बेटे हैं। तीनों मजदूरी करते हैं, मगर पिता को उनसे दूर वृद्धाश्रम में रहना पड़ रहा है। परिवार का जिक्र होने पर सीताराम भावुक हो जाते हैं। उनकी जुबां तो कुछ नहीं बोलती, लेकिन चेहरे का भाव उनके अंदर के कष्ट को जाहिर कर रहा था। उनका कहना था कि इस आश्रम में शांति है। खाने को दो रोटी मिल जाए और बस क्या चाहिए। भगवान की मर्जी के आगे किसका चलता है।
तीन वर्ष से वृद्धाश्रम बना सहारा
सीताराम जैसी ही कहानी रामजस की है। मंझनपुर (गुतवन) निवासी रामजस के परिवार में एक बेटा और बहू हैं। मेहनत मजदूरी कर परिवार का भरण पोषण करने वाले रामजस की हड्डियां कमजोर हुई तो उनका भरण पोषण करने को कोई तैयार नहीं हुआ। लिहाजा वह भी ’शांति’ पाने के लिए वृद्धाश्रम में चले आए। करीब तीन वर्षों से यहीं रह रहे हैं। बीच-बीच में मन करता है तो बेटा-बहू और पोतों से भी मिलने भी जाते हैं, लेकिन उनका मिलन चंद घंटों का ही रहता है। रामजस के मुताबिक यहां मन लग चुका है। बेटा भी तो मजदूरी ही करता है। आमदनी कम है। यहां हमें कोई दिक्कत नहीं है।
अन्नदाता को भी भटकना पड़ा रोटी के लिए
शहर के रुहट्टा मोहल्ला निवासी बुद्धू मौर्य की अच्छी खेती थी। शहर के मध्य में तीन बीघा जमीन थी, जिस पर शाक-भाजी उगाकर वह अच्छी आमदनी कर लेते थे। दो बेटे और उनका भरा-पूरा परिवार है। बावजूद बुद्धू मौर्य को वृद्धाश्रम में दिन गुजारने पड़ रहे हैं। बुद्धू के मुताबिक कुछ लोगों ने जमीन पर कब्जा कर लिया। शासन-प्रशासन से गुहार लगाई, लेकिन प्रभावशाली लोगों के सामने उनकी कहीं सुनवाई नहीं हुई। एक बेटा मुंबई में ही रहकर मजदूरी करता है। दूसरे बेटे की भी तीन संतान हैं। उन्हें भी बड़े शहरों में रहना पड़ रहा है। घर-जमीन पर कब्जे के कारण वह वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर हैं।